ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्मचिरप्रसुप्त- कल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकरोत्सहृदयोदयलाभहेतो- रानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके चतुर्थ उद्योतः । सत्काव्य के तत्त्व का नीतिमार्ग जो परिपक्व बुद्धि वालों के मन में चिरप्रसुप्तकल्प था उसे 'आनन्दवर्धन' इस प्रथित अभिधान वाले ने सहृदयजनों के उदयलाभ के लिए व्याख्यान किया । श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में चतुर्थ उद्योत समाप्त हुआ । लोचनम् सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्म चिरप्रसुप्त- कल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकरोत्सहृदयोदयलाभहेतोः इति सम्बन्धाभिधेयप्रयोजनोपसंहारः । इह बाहुल्येन लोको लोकप्रसिद्ध्या सम्भावनाप्रत्ययबलेन प्रवर्तते । स च सम्भावनाप्रत्ययो नामश्रवणवशात्प्रसि- द्धान्यतदीयसमाचारकवित्वविद्वत्तादिसमनुस्मरणेन भवति । तथाहि—भर्तृह- रिणेदं कृतम्—यस्यायमौदार्यमहिमा यस्यास्मिञ्छास्त्रे एवंविधस्सारो दृश्यते ( अन्तिम श्लोक के तीन पादों में ) ( ध्वनित्वरूप और इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य- प्रतिपादक भाव ) सम्बन्ध, अभिधेय ( ध्वनिस्वरूप ) और प्रयोजन ( ध्वनिस्वरूप के ज्ञान से प्रीति ) का उपसंहार है । यहाँ लोग बहुततया लोकप्रसिद्धि द्वारा सम्भावना- प्रत्यय के बल से ( अर्थात् लोगों में ख्याति देखकर गौरव की भावना के बल से ) प्रवृत्त होते हैं । और सम्भावनाप्रत्यय नाम सुनने के कारण उसके अन्य प्रसिद्ध समाचार, कवित्व और विद्वत्ता आदि के सम्यक् अनुसरण से होता है । जैसा कि—'भर्तृहरि ने इसे रचा है', जिसकी यह औदार्यमहिमा है, जिसके इस शास्त्र में इस प्रकार का सार