भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 680 में से

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पृष्ठ 661

चतुर्थ उद्योतः ६०१ ध्वन्यालोकः यस्माद्वस्तु समीहितं सुकृतिभिः सर्वं समासाद्यते । काव्याख्येऽखिलसौख्यधाम्नि विबुधोद्याने ध्वनिदर्शितः सोऽयं कल्पतरूपमानमहिमा भोग्योऽस्तु भव्यात्मनाम् ॥ जिस ( काव्य नामक उद्यान ) से सुकृती लोग समस्त सभी वस्तु को प्राप्त करते हैं, अखिल सौख्य के धाम काव्य नामक विबुधोद्यान में कल्पतरु की भांति महिमा वाला वह यह ध्वनि दिखाया गया भाग्यशाली लोगों का भोग्य बने । लोचनम् कालोचितो यो रसः सेकादिकृतः तदाश्रयस्तत्कृतो यो गुणानां सौकुमार्य- च्छायावत्वसौगन्ध्यप्रभृतीनामलङ्कारः पर्याप्ताकारणं तेन च या शोभा तां बिभ्रति । यस्मादिति काव्याख्यादुद्यानात् । सर्वं समीहितमिति । व्युत्पत्ति- कीर्तिप्रीतिलक्षणमित्यर्थः । एतच्च पूर्वमेव वितत्योक्तमिति श्लोकार्थमात्रं व्याख्यातम् । सुकृतिभिरिति । ये कष्टोपदेशेनापि विना तथाविधफलभाजः तैरित्यर्थः । अखिलसौख्यधाम्नीति । अखिलं दुःखलेशेनाप्यननुविद्धं यत्सौख्यं तस्य धाम्नि एकायतन इत्यर्थः । सर्वथा प्रियं सर्वथा च हितं दुर्लभं जगतीति भावः । विबुधोद्यानं नन्दनम् । सुकृतीनां कृतज्योतिष्टोमादीनामेव समीहिता- सादननिमित्तम् । विबुधाश्च काव्यतत्त्वविदः । दर्शित इति । स्थित एव सन् प्रकाशितः, अप्रकाशितस्य हि कथं भोग्यत्वम् । कल्पतरुणा उपमानं यस्य तादृङ्महिमा यस्येति बहुव्रीहिगर्भो बहुव्रीहिः । सर्वसमीहितप्राप्तिर्हि काव्ये तदेकायत्ता । एतच्चोक्तं विस्तरतः ॥ जो सौकुमार्य, छायावत्त्व, सौगन्ध्य प्रभृति गुणों का ( जो ) अलङ्कार अर्थात् पर्याप्तता का कारण उससे जो शोभा उसे धारण करता है । जिससे अर्थात् काव्य नामक उद्यान से । समस्त समीहित - । अर्थात् व्युत्पत्ति, कीर्ति, प्रीति रूप । यह सब पहले ही विस्तार करके कह चुके हैं इसलिए श्लोक अर्थमात्र का व्याख्यान किया है । सुकृती लोग - । अर्थात् जो कष्टकर उपदेश के बिना भी उस प्रकार के फल प्राप्त कर चुके हैं वे । अखिल सौख्य के धाम- । अर्थात् अखिल, दुःखलेश से भी जो अननुविद्ध सौख्य है उसके धाम अर्थात् एक आयतन । भाव यह कि जगत् में सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित दुर्लभ है । विबुधोद्यान अर्थात् नन्दन । सुकृती अर्थात् ज्योतिष्टोम आदि किए हुए लोगों का ही समीहित के आसादन का निमित्त । और विबुध अर्थात् काव्यतत्त्वविद् लोग । दिखाया गया है- । स्थित होता हुआ ही प्रकाशित है, क्योंकि अप्रकाशित भोग्य कैसे हो सकता है ? कल्पतरु से उपमान है जिसका, उस प्रकार की महिमा है जिसकी यह बहुव्रीहिगर्भ बहुव्रीहि है । काव्य में सभी समीहितों की प्राप्ति एकमात्र उस ( ध्वनि ) के अधीन है । और इसे विस्तारपूर्वक कह चुके हैं ।

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