ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सरस्वत्येवैषा घटयति यथेष्टं भगवती ॥ १७ ॥ परस्वादानेच्छाविरतमनसः सुकवेः सरस्वत्येषा भगवती यथेष्टं घटयति वस्तु । येषां सुकवीनां प्राक्तनपुण्याभ्यासपरिपाकवशेन प्रवृत्तिस्तेषां परोपरचितार्थपरिग्रहनिःस्पृहाणां स्वव्यापारो न क्वचिदु- पयुज्यते । सैव भगवती सरस्वती स्वयमभिमतमर्थमाविर्भावयति । एतदेव हि महाकवित्वं महाकवीनामित्योम् । इत्यक्लिष्टरसाश्रयोचितगुणालङ्कारशोभाभृतो भगवती ही यथेष्ट वस्तु को घटित करती है ॥ १७ ॥ दूसरे के स्व ( विषय ) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह भगवती सरस्वती यथेष्ट वस्तु घटित कर देती है। जिन सुकवियों की प्रवृत्ति पूर्व जन्म के पुण्य और अभ्यास के परिपाक के कारण होती है। दूसरों द्वारा रचित अर्थ के ग्रहण में निःस्पृह सुकवियों को अपना व्यापार कहीं नहीं करना पड़ता । वही भगवती स्वयं अभिमत अर्थ को आविर्भूत करती है। यही महाकवियों का महाकवित्व है। ओम्। इस प्रकार अक्लिष्ट, रसके आश्रय से उचित गुण और अलङ्कार की शोभा वाले लोचनम् सुकवेरिति तृतीयः पादः । कुतः खल्वपूर्वमानयामीत्याशयेन निरुद्योगः परोप- निबद्धवस्तूपजीवको वा स्यादित्याशङ्क्याह—सरस्वत्येवेति । कारिकायां सुकवेरिति जातावेकवचनमित्यभिप्रायेण व्याचष्टे—सुकवीनामिति । एतदेव स्पष्टयति—प्राक्तनेत्यादि न तेषामित्यन्तेन । आविर्भावयतीति । नूतनमेव सृजतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ इतीति । कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः । अक्लिष्टा रसाश्रयेण उचिता ये गुणालङ्कारास्ततो या शोभा तां बिभर्ति काव्यम् । उद्यानमध्यक्लिष्टः 'परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः' यह तृतीय पाद है। 'अपूर्व (वस्तु) को कहाँ से लाऊँ ?' इस आशय से निरुद्योग होकर दूसरों द्वारा उपनिबद्ध वस्तु का उपजीवक होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—सरस्वती—। कारिका में 'सुकवि' यह जाति में एकवचन है, इस अभिप्राय से व्याख्या करते हैं—सुकवियों की। इसे ही स्पष्ट करते हैं—पूर्वजन्म से लेकर उन (सुकवियों) को तक द्वारा। आविर्भूत करता है—अर्थात् नूतन ही सृजन करता है ॥ १७ ॥ इस प्रकार—। अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। अक्लिष्ट, रस के आश्रय से उचित जो गुण-अलङ्कार उससे जो शोभा उसे धारण करता है काव्य । उद्यान भी अक्लिष्ट, कालोचित सेकादिकृत जो रस उसका आश्रय अर्थात् तत्कृत