भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 659

चतुर्थ उद्योतः ५९९ ध्वन्यालोकः अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ १६ ॥ तदनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् तादृशं सुकविर्विवक्षितव्य- ङ्ग्यवाच्यार्थसमर्पणसमर्थशब्दरचनारूपया बन्धच्छाययोपनिबध्नन्निन्द्यतां नैव याति । तदित्थं स्थितम्— प्रतायन्तां वाचो निमितविविधार्थामृतरसा न सादः कर्तव्यः कविभिरनवद्ये स्वविषये । सन्ति नवाः काव्यार्थाः परोपनिबद्धार्थविरचने न कश्चित्कवेर्गुण इति भावयित्वा । परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु सुकवेः पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि उपनिबन्धन करता हुआ निन्दा का पात्र नहीं बनता ॥ १६ ॥ वह पूर्व की छाया से अनुगत भी वस्तु को उस प्रकार सुकवि विवक्षितव्यङ्ग्य और वाच्य अर्थ के समर्पण में समर्थ शब्द की रचना रूप बन्धच्छाया से उपनिबन्धन करता हुआ सुकवि निन्दा का पात्र नहीं बनता । तो ऐसा ठहरा— (कवि लोग) अमृत रस के तुल्य विविध अर्थोंवाली वाणियों का प्रसार करें, कवियों को अनवद्य अपने विषय के प्रति विषाद् नहीं करना चाहिए । नये अर्थ हैं, दूसरे द्वारा उपनिबद्ध अर्थ की रचना में कवि का कोई गुण नहीं यह सोच कर । दूसरे के स्व (विषय) के ग्रहण से विरत मन वाले सुकवि के यह सरस्वती लोचनम् अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकविरुपनिबध्नन्निन्द्यतां नोपयाति ॥ इति कारिका खण्डीकृत्य पठिता ॥ १६ ॥ स्वविषय इति । स्वयन्तात्कालिकत्वेनास्फुरित इत्यर्थः । परस्वादानेच्छेत्यादि- द्वितीयं श्लोकार्धं पूर्वोपस्कारेण सह पठति—परस्वादानेच्छाविरतमनसो वस्तु उदित होता है । बुद्धि का ही आकार दिखाते हैं—‘कोई (अपूर्व) स्फुरण’—। (१६वीं) कारिका को खण्ड करके पढ़ा है । अपने विषय के प्रति—। अर्थात् स्वयं तात्कालिक रूप से स्फुरित न हुए । ‘परस्वादानेच्छा’ इत्यादि द्वितीय श्लोकार्ध को पहले उपस्कार के साथ पढ़ते हैं—