ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न हि वाचस्पतिनाप्यक्षराणि पदानि वा कानिचिदपूर्वाणि घट- यितुं शक्यन्ते। तानि तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिषु नवतां विरुध्यन्ति। तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादिमयान्यर्थतत्त्वानि। तस्मात्- यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित्- स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। स्फुरणेयं काचिदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते। वाचस्पति भी कुछ अपूर्व अक्षरों अथवा पदों को बना नहीं सकते। वे तो वे ही उपनिबद्ध होकर काव्य आदि में नवीनता का विरोध नहीं करते। उसी प्रकार पदार्थ रूप श्लेषादिभव अर्थतत्त्व भी। इसलिए जहाँ लोगों की 'यह नई सूझ (स्फुरण) है' यह बुद्धि उत्पन्न होती है वह जो भी हैं 'रम्य' (कहलाता) है। यह कोई (अपूर्व) स्फुरण है यह सहृदयों के चमत्कार उत्पन्न होता है। लोचनम् एवमक्षरादिरचनैवेति दृष्टान्तभागं व्याख्याय दार्ष्टान्तिके योजयति-तथैवेति। श्लेषादिमयानीति। श्लेषादिस्वभावानीत्यर्थः। सद्वृत्ततेजस्विगुणद्विजादयो हि शब्दाः पूर्वपूर्वैंरपि कविसहस्रैः श्लेषच्छायया निबध्यन्ते, निबद्धाश्चन्द्रादयश्चो पमानत्वेन। तथैव पदार्थरूपाणीत्यत्र नापूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते इत्यादि विरुध्यन्तीत्येवमन्तं प्राक्तनं वाक्यमभिसन्धानीयम्॥ १५॥ 'लोकस्ये'ति व्याचष्टे-सहृदयानामिति। चमत्कृतिरिति। आस्वादप्रधाना बुद्धिरित्यर्थः। 'अभ्युज्जिहीत' इति व्याचष्टे-उत्पद्यत इति। उदेतीत्यर्थः। बुद्धेरेवाकारं दर्शयति-स्फुरणेयं काचिदिति। यदपि तदपि रम्यं यत्र लोकस्य किञ्चित् स्फुरितमिदमितीयं बुद्धिरभ्युज्जिहीते। 'अक्षर आदि की रचना की भांति' इस दृष्टान्त भाग की व्याख्या करके दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं-उसी प्रकार-। श्लेषादिमय-। अर्थात् श्लेष आदि के स्वभाव वाले। 'सद्वृत्त' 'तेजस्वी' 'गुण' 'द्विज' आदि शब्दों को पहले के हजारों कवियों ने श्लेष की छाया से निबन्धन किया है, और चन्द्र आदि को उपमान रूप से निबन्धन किया है। उसी प्रकार 'पदार्थ रूप' इसमें 'अपूर्व की घटना नहीं की जा सकती 'विरोध नहीं करते' इत्यादि पूर्व वाक्यों को लगा लेना चाहिए। 'लोगों की' इसकी व्याख्या करते हैं-सहृदयों के-। चमत्कार-। अर्थात् आस्वाद प्रधान बुद्धि। ('अभ्युज्जिहीते') इसकी व्याख्या करते हैं-उत्पन्न होता है-। अर्थात्