ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 642, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सत्स्वपि पुरातनकविप्रबन्धेषु यदि स्यात्प्रतिभागुणः, तस्मिंस्त्व- सति न किञ्चिदेव कवेर्वस्त्वस्ति । बन्धच्छायाप्यर्थद्वयानुरूपशब्द- सन्निवेशोऽर्थप्रतिभानाभावे कथमुपपद्यते । अनपेक्षितार्थविशेषाक्षररचनैव बन्धच्छायेति नेदं नेदीयः सहृदयानाम् । एवं हि सत्यर्थानपेक्षचतुर- मधुरवचनरचनायामपि काव्यव्यपदेशः प्रवर्तेत । शब्दार्थयोः साहित्येन पुराने कवियों के प्रबन्धों के होने पर भी, यदि प्रतिभा रूप गुण हो; उसके न होने पर कवि के लिए कोई वस्तु नहीं है । दोनों अर्थों (ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य) के अनुरूप शब्द का संनिवेश रूप बन्धच्छाया भी अर्थ के प्रतिभान के अभाव में कैसे बन (सकती) है ? अर्थ की अपेक्षा न करके अक्षररचना ही बन्धच्छाया है, यह सहृदयों के नेदीयस् (निकटतर) नहीं है । क्योंकि ऐसा होने पर अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले चतुर (और) मधुर वचन की रचना में भी काव्य का व्यवहार चल पड़ेगा । शब्द और अर्थ के साहित्य से काव्यत्व के होने पर कैसे उस प्रकार के विषय में लोचनम् सत्स्वपीत्यादि कारिकाया उपस्कारः । त्रीन् पादान् स्पष्टान्मत्वा तुर्यं पादं व्याख्यातुं पठति—यदीति । विद्यमानो ह्यसौ प्रतिभागुण उक्तरीत्या भूयान् भवति, न त्वत्यन्तासन्नेवेत्यर्थः । तस्मिन्निति । अनन्तीभूते प्रतिभागुणे । न किञ्चिदेवेति । सर्वं हि पुराणकविनैव स्पृष्टमिति किमिदानीं वर्ण्यं, यत्र कवेर्व- र्णनाव्यापारस्स्यात् । ननु यद्यपि वर्ण्यमपूर्वन्नास्ति, तथाप्युक्तिपरिपकगुम्फ- घटनाद्यपरपर्यायबन्धच्छाया नवनवा भविष्यति । यन्निवेशने काव्यातन्तराणां संरम्भ इत्याशङ्क्याह—बन्धच्छायापीति । अर्थद्वयं गुणीभूतव्यंग्यं प्रधानभूतं व्यंग्यं च । नेदीय इति । निकटतरं हृदयाननुप्रवेशि न भवतीत्यर्थः । अत्र हेतु- माह—एवं हि सतीति । चतुरत्वं समाससङ्घटना । मधुरत्वमपारुष्यम् । होने पर भी—। यह कारिका का उपस्कार (प्रतिपादन) है ! तीन पादों को स्पष्ट मान कर चौथे पाद का व्याख्यान करने के लिए पढ़ते हैं—यदि—। अर्थात् क्योंकि विद्यमान वह प्रतिभा रूप गुण उक्त रीति से बहुत हो जाता है, न कि अत्यन्त न विद्यमान ही । उसके—। अनन्त प्रतिभारूप गुण के । नहीं कोई ही—। सब तो पुराने कवि ने ही स्पर्शकर लिया तो अब वर्णनीय क्या है ? जहां कवि का वर्णना- व्यापार हो ? यद्यपि वर्णनीय अपूर्व नहीं है, तथापि उक्ति के परिपाक के गूंथने की घटना, दूसरे शब्द में छाया, नई-नई हो जायगी । जिसके निवेशन में दूसरे काव्यों का संरम्भ (उपक्रम) है, यह आशङ्का करके कहते हैं—बन्धच्छाया भी—। दो अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य और प्रधानभूत व्यङ्ग्य । नेदीयस्—। निकटतर, अर्थात् हृदय में प्रवेश कर जाने वाला, नहीं होता है । यहां हेतु कहते हैं—क्योंकि ऐसा होने पर—।