भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 645, कुल 680 में से

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पृष्ठ 645

चतुर्थ उद्योतः ५८५ ध्वन्यालोकः तरूपसौष्ठवा । न च ते तस्य कवेरेकत्रैवासकृत्कृता वर्णनप्रकारा अपुन- रुक्तत्वेन वा नवनवार्थनिर्भरत्वेन वा प्रतिभासन्ते । दर्शितमेव चैतद्वि- षमबाणलीलायाम्— ण अ ताण घडइ ओही ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता । जे विब्भमा पिआणं अत्था वा सुकइवाणीणम् ॥ अयमपरश्चावस्थाभेदप्रकारो यदचेतनानां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपमभिमानित्वप्रसिद्धं हिमवद्गङ्गादीनाम् । तच्चोचितचेतनविषयस्वरूप- ‘उस कृश शरीर वाली को पूर्व की ओर मुँह करके बैठाकर’ इत्यादि उक्तियों से नये ही प्रकार से रूप के सौष्ठव का निरूपण है । उस कवि के, एक जगह ही वार- बार किए गए वे वर्णन-प्रकार फिर नहीं कहे गए (अपुनरुक्त) रूप से अथवा नये नये अर्थों से भरे (नवनवार्थनिर्भर) रूप से प्रतिभासित नहीं होते हैं । इसे ‘विषम- बाणलीला’ में दिखाया ही है— ‘जो प्रियाओं के विभाव (हाव-भाव) अथवा सुकवि की वाणियों के अर्थ हैं उनकी अवधि (समाप्ति) नहीं होती है, किसी प्रकार वे पुनरुक्त नहीं प्रतीत होते हैं।’ और यह दूसरा अवस्थाभेद का प्रकार है जो हिमवान् और गङ्गा आदि समस्त अचेतनों का चेतन दूसरा रूप अभिमानी रूप से प्रसिद्ध है । और वह उचित चेतन- सम्बन्धी स्वरूप की योजना से उपनिबध्यमान होकर अन्य हो जाता है । जैसे, लोचनम् न च तेषां घटतेऽवधिः, न च ते दृश्यन्ते कथमपि पुनरुक्ताः । ये विभ्रमाः प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ॥ चकाराभ्यामतिविस्मयस्सूच्यते । कथमपीति । प्रयत्नेनापि विचार्यमाणं पौनरुक्त्यं न लभ्यमिति यावत् । प्रियाणामिति । बहुवल्लभो हि सुभगो राधाव- ल्लभप्रायस्तास्ताः कामिनीः परिभोगसुभगमुपभुञ्जानोऽपि न विभ्रमपौनरुक्त्यं पश्यति तदा । एतदेव प्रियात्वमुच्यते, यदाह— दो चकारों (‘और’ के प्रयोगों) से अत्यन्त विस्मय सूचित होता है । किसी प्रकार—। प्रयत्न से भी विचार किया जाय (तो भी) पौनरुक्त्य नहीं मिलेगा, यह भाव है । प्रियाओं का—। बहुत वल्लभाओं वाला सुभग (नायक) राधा के प्रिय (कृष्ण) के सदृश, उन उन कामिनियों का परिभोग के सुभग प्रकार से उपभोग करता हुआ भी विभ्रम के पौनरुक्त्य को तब नहीं देखता । यही ‘प्रियात्व’ कहा जाता है, जो कहा है—

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