ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः योजनयोपनिबध्यमानमन्यदेव सम्पद्यते । यथा कुमारसम्भवे एव पर्वतस्वरूपस्य हिमवतो वर्णनं, पुनः सप्तर्षिप्रयोक्तिषु चेतनतत्स्वरूपा- पेक्षया प्रदर्शितं तदपूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धश्चायं सत्कवीनां मार्गः । इदं च प्रस्थानं कविव्युत्पत्तये विषमबाणलीलायां सप्रपञ्चं दर्शितम् । चेतनानां च बाल्याद्यवस्थाभिरन्यत्वं सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतना- नामवस्थाभेदेऽप्यवान्तरावस्थाभेदान्नानात्वम् । यथा कुमारीणां कुसुम- शरभिन्नहृदयानामन्यासां च । तत्रापि विनीतानामविनीतानां च । अचेतनानां च भावानामारम्भाद्यवस्थाभेदभिन्नानामेकैकशः स्वरूपमुप- निबध्यमानमानन्त्यमेवोपयाति । यथा— हंसानां निनदेषु यैः कवलितैरासज्यते कूजता- 'कुमारसम्भव' में ही पर्वत स्वरूप हिमवान् का वर्णन है, फिर सप्तर्षियों की प्रिय उक्तियों में चेतन उसके स्वरूप की अपेक्षा से दिखाया गया है, वह अपूर्व ही मालूम पड़ता है । और यह सत्कवियों का मार्ग प्रसिद्ध है । और यह प्रस्थान कवियों की व्युत्पत्ति के लिए 'विषमबाणलीला' में प्रपञ्च के साथ दिखाया है । और चेतनों का बाल्य आदि अवस्थाओं से अन्य होना सत्कवियों के प्रसिद्ध ही है । चेतनों का अवस्थाभेद में भी अवान्तर अवस्थाभेद से नानात्व है, जैसे कामदेव के बाणों से बिंधे हृदय वाली कुमारियों का, और दूसरी (नायिकाओं) का । वहाँ भी विनीतों का और अविनीतों का । और आरम्भ आदि अवस्थाओं के भेद से भिन्न अचेतन भावों का एक-एक करके स्वरूप उपनिबध्यमान होकर आनन्त्य को ही प्राप्त करता है । जैसे— 'कूंजते हुए हंसों की आवाजों में जो कोई दूसरा कसैले कंठ में लोटने से घर- लोचनम् क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया इति । प्रियाणामिति चासंसारं प्रवृद्धरूपो योऽयं कान्तानां विभ्रमविशेषः स नवनव एव दृश्यते । न ह्यसावग्निचयनादिवदन्यतशिक्षितः, येन तत्सादृश्या- त्पुनरुक्ततां गच्छेत् । अपि तु निसर्गोद्भिद्यमानमदनाङ्कुरविकासमात्रान्तदिति 'क्षण-क्षण में जो नवत्व प्राप्त करता है रमणीयता का वही रूप है।' प्रियाओं का—। संसार के अस्तित्व से लेकर प्रवाहित होता हुआ जो यह कान्ताओं का विभ्रम विशेष है वह नया-नया ही दिखाता है । न कि वह 'अग्निचयनादि' (यज्ञक्रियाओं) की तरह अन्य से सीखा गया है, जिससे उसके समान होने से पुनरुक्तता को प्राप्त करता । अपि तु यह स्वभाव से उकसते हुए मदनाङ्कुर का विकासमात्र है, इसलिए