ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ५६९ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्र- निष्पन्नशरीरत्वेन नवत्वम् । यथा—'वाणिअअ हत्थिदन्ता' इत्यादिगा- थार्थस्य । करिणीवेहव्वअरो मह पुत्तो एक्ककाण्डविणिवाइ । हअसोण्हाएँ तह कहो जह कण्डकरण्डअं वहइ ॥ [ करिणीवैधव्यकरो मम पुत्र एककाण्डविनिपाती । हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहति ॥ इतिच्छाया ] एवमादिष्वर्थेषु सत्स्वप्यनालीढतैव । यथा व्यङ्ग्यभेदसमाश्रयेण ध्वनेः काव्यार्थानां नवत्वमुत्पद्यते, तथा व्यञ्जकभेदसमाश्रयेणापि । तत्तु ग्रन्थविस्तरभयान्न लिख्यते, स्वयमेव सहृदयैरभ्यूह्यम् । अत्र च पुनःपुनरुक्तमपि सारतयेदमुच्यते— व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽस्मिन्विविधे सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन् कविः स्यादवधानवान् ॥ ५ ॥ अस्मिन्नर्थानन्त्यहेतौ व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावे विचित्रे शब्दानां सम्भव- अर्थशक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप व्यङ्ग्य का, कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढोक्ति मात्र से निष्पन्नशरीर होने के कारण नवत्व है जैसे—'ओ व्यापारी, हाथी के दांत' इत्यादि गाथा के अर्थ का । इत्यादि अर्थों के होने पर भी अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व ) है ॥ ४ ॥ जैसे ध्वनि के व्यङ्ग्य भेद के समाश्रयण से काव्यार्थों का नवत्व उत्पन्न होता है, उसी प्रकार व्यञ्जक भेद के समाश्रयण से भी । किन्तु उसे ग्रन्थ के विस्तृत हो जाने के भय से नहीं लिखते हैं, स्वयं ही सहृदय लोग ऊह कर लेंगे । और यहाँ, बार-बार भी उक्त इसे सार रूप से यह कहते हैं— इस व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव के बहुत प्रकार के सम्भव होने पर भी कवि रसादि रूप अर्थ में सावधान हो । अर्थ के आनन्त्य के हेतु, व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव के विचित्र होने पर भी अपूर्व अर्थ के लोचनम् पातनसमर्थः हतस्नुषया तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहतीत्युत्तान एवाय- मर्थः, गाथार्थस्यानालीढतैवेति सम्बन्धः ॥ ४ ॥ है कि बाणों का करण्ड ( तरकस ) लिए रहता है । यह सीधा ही अर्थ है । सम्बन्ध यह कि गाथा के अर्थ का अस्पृष्टत्व ( अनालीढत्व है ) ॥ ४ ॥