ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ उद्योतः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनिं सप्रपञ्चं विप्रतिपत्तिनिरासार्थं व्युत्पाद्य तद्व्युत्पादने प्रयोजनान्तरमुच्यते— ध्वनेर्यः सगुणीभूतव्यङ्ग्यस्याध्वा प्रदर्शितः । अनेनानन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुणः ॥ १ ॥ य एष ध्वनेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च मार्गः प्रकाशितस्तस्य फला- न्तरं कविप्रतिभानन्त्यम् । इस प्रकार ध्वनि का प्रपञ्च विस्तार के साथ विरुद्ध शङ्का के निवारण के लिए व्युत्पादन करके उस ( ध्वनि ) के व्युत्पादन में दूसरा प्रयोजन कहते हैं— गुणीभूतव्यङ्ग्य के सहित ध्वनि का जो मार्ग दिखाया जा चुका है, इससे कवियों का प्रतिभागुण अनन्त ( अनेकानेक ) हो जाता है ॥ १ ॥ जो यह ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग ( पूर्व उद्योतों में ) प्रकाशित किया है उसका दूसरा फल ( प्रयोजन ) कवि की प्रतिभा का आनन्त्य है । लोचनम् कृत्यपञ्चकनिर्वाह्ययोगेऽपि परमेश्वरः । नान्योकरणापेक्षो यया तां नौमि शाङ्करीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं विरचयितुं वृत्तिकार आह—एवमिति । प्रयोजनान्तरमिति । यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इत्यनेन प्रयोजनं प्रागेवोक्तं, तृतीयोद्योतावधौ च सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वेति तदेवेषत्स्फुटीकृतं, तथापि स्फुटतरीकर्तुमिदानीं यत्नः । यतस्सुस्पष्टरूपत्वेन विज्ञायते, अतोऽस्पष्टनिरूपितात्स्पष्टनिरूपणमन्यथैव प्रतिभातीति प्रयोजनान्तरमित्युक्तम् । अथवा पूर्वोक्तयोः प्रयोजनयोरन्तरं विशे- मैं उस शाङ्करी ( शङ्कर की माया शक्ति ) को नमन करता हूँ जिसके कारण परमेश्वर ( सृष्टि आदि ) पाँच प्रकार के कार्यों को पूरा करने में भी दूसरे उपकरण की अपेक्षा नहीं रखते । अन्य उद्योत की सङ्गति बैठाने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—इस प्रकार—। दूसरा प्रयोजन—। यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इसके द्वारा प्रयोजन पहले ही कहा जा चुका है, और तृतीय उद्योत के अन्त में 'सत्काव्यं कर्तुं ज्ञातुं वा' से उसे ही कुछ स्फुट किया है तथापि और अधिक स्फुट ( स्फुटतर ) करने के लिए अब यत्न है । जिससे सुस्पष्ट रूप से जाना जाता है, अतः अस्पष्ट रूप से निरूपण किए गए (प्रयोजन से) स्पष्ट निरूपण अन्यथा ही मालूम पड़ता है, सो दूसरा प्रयोजन यह कहा । अथवा,