ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनाख्येयांशभासित्वं निर्वाच्यार्थतया ध्वनेः । न लक्षणं, लक्षणं तु साधीयोऽस्य यथोदितम् ॥ इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥ ध्वनि के निर्वाच्यार्थ होने के कारण अनाख्येय अंश का भासित होना लक्षण नहीं है, जैसा कि लक्षण कहा है ( वह ) ठीक है । श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य विरचित ध्वन्यालोक में तीसरा उद्योत समाप्त । लोचनम् हेतुः—निर्वाच्यार्थतयेति । निर्विभज्य वक्तुं शक्यत्वादित्यर्थः । अन्यस्तु ‘निर्वा- च्यार्थतया’ इत्यत्र निसोनञर्थत्वं परिकल्प्यानाख्येयांशभासित्वेऽयं हेतुरिति व्याचष्टे, तत्त क्लिष्टम् । हेतुश्च साध्याविशिष्ट इत्युक्तव्याख्यानमेवेति शिवम् । काव्यालोके प्रथां नीतान् ध्वनिभेदान् परामृशत् । इदानीं लोचनं लोकान् कृतार्थान्संविधास्यति ॥ आसूत्रितानां भेदानां स्फुटतापत्तिदायिनीम् । त्रिलोचनप्रियां वन्दे मध्यमां परमेश्वरीम् ॥ इति श्रीमहामाहेश्वराचार्यवर्याभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोक- लोचने ध्वनिसङ्केते तृतीय उद्योतः ॥ यहाँ हेतु है—निर्वाच्यार्थ होने के कारण— । अर्थात् विभाग करके कहे जा सकने के कारण । किन्तु अन्य ने 'निर्वाच्यार्थतया' में 'निर्' को नञर्थ समझकर अनाख्येयांशभासी होने में यह हेतु है' यह व्याख्यान किया है, किन्तु वह क्लिष्ट है । और हेतु साध्य से विशिष्ट है यह व्याख्यान उक्त है । शिवम् । काव्यालोक में फैले हुए ध्वनिभेदों का परामर्श करता हुआ यह लोचन लोगों को कृतार्थ करेगा । आसूचित भेदों को स्फुटता प्राप्त कराने वाली त्रिलोचन (शिव) की प्रिया परमेश्वरी मध्यमा की वन्दना करता हूँ । श्री महामाहेश्वराचार्यवर्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित ध्वनिसङ्केत सहृदयालोकलोचन में तृतीय उद्योत समाप्त हुआ ।