ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कथमिति चेत् — अतो ह्यन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नवत्वमायाति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥ अतो ध्वनेरुक्तप्रभेदमध्यादन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता सती वह कैसे ? तो— इसमें से एक भी प्रकार से विभूषित वाणी प्राचीन अर्थ के साथ सम्बन्ध रखती हुई भी नवत्व प्राप्त कर लेती है ॥ २ ॥ इस ध्वनि के कहे गए प्रभेदों के बीच से एक भी प्रकार से विभूषित होती हुई लोचनम् षोऽभिधीयते; केन विशेषेण सत्काव्यकरणमस्य प्रयोजनं, केन च सत्काव्य- बोध इति विशेषो निरूप्यते । तत्र सत्काव्यकरणे कथमस्य व्यापार इति पूर्वं वक्तव्यं निष्पादितस्य ज्ञेयत्वादिति तदुच्यते—ध्वनेर्य इति ॥ १ ॥ ननु ध्वनिभेदात् प्रतिभानामानन्त्यमिति व्यधिकरणमेतदित्यभिप्रायेणा- शङ्कते—कथमितीति । अत्रोत्तरम्—अतो हीति । आसन्तातावद् बहवः प्रकाराः, एकेनाप्येवं भव- पहले कहे गए दोनों प्रयोजनों का अन्तर अर्थात् विशेष कहते हैं—किस विशेष से सत्काव्य का निर्माण इसका प्रयोजन है और किससे सत्काव्य बोध ( इसका प्रयोजन है ! ) इस प्रकार विशेष का निरूपण करते हैं। वहाँ सत्काव्य के निर्माण में कैसे इसका ( व्युत्पादन का ) व्यापार है ? यह पहले वक्तव्य है क्योंकि जो निष्पादित ( व्युत्पादित ) होता है वही ज्ञेय या ज्ञान का विषय होता है, अतः उसे कहते हैं—जो यह— । ध्वनि के भेद से प्रतिभा का आनन्त्य, यह व्यधिकरण¹ है, इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—कैसे— । यहाँ उत्तर है—इसमें से— । हों बहुत से प्रकार ( प्रभेद ), एक ( प्रकार या १. प्रस्तुत शङ्का का तात्पर्य है कि ध्वनि का भेद काव्यनिष्ठ है और प्रतिभा का आनन्त्य कविनिष्ठ है, और जैसा कि कार्यकारणभाव का नियम है कि वह समानाधिकरण में होता है, यहाँ दोनों का अधिकरण समान नहीं है, ऐसी स्थिति में ध्वनि के भेद और प्रतिभा के आनन्त्य का कार्य-करण-भाव कैसे बन सकता ? इसका समाधान यह है कि ध्वनि के भेद का ज्ञान प्रतिभा के आनन्त्य का कारण है, यह आचार्य का वक्तव्य है। इसी बात को दूसरे प्रकार से द्वितीय कारिका में कहा गया है। कवि ध्वनि के भेदों का ज्ञान करके अनन्त प्राचीन कवियों के वर्णित भी विषय के वर्णन में प्रतिभान प्राप्त करके अपनी वाणी में नवत्व उत्पन्न कर लेता है। ध्वनि के ज्ञान का फल प्रतिभा का आनन्त्य है तो प्रतिभा के आनन्त्य का फल वाणी का नवत्व है।