भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 619

चतुर्थ उद्योतः ५५९ ध्वन्यालोकः वाणी पुरातनकविनिबद्धार्थसंस्पर्शवत्यपि नवत्वमायाति । तथाह्यविव- क्षितवाच्यस्य ध्वनेः प्रकारद्वयसमाश्रयणेन नवत्वं पूर्वार्थानुगमेऽपि यथा— स्मितं किञ्चिन्मुग्धं तरलमधुरो दृष्टिविभवः वाणी पुराने जमाने के कवि द्वारा बांधे गए अर्थ का संस्पर्श रखती हुई भी नवत्व प्राप्त कर लेती है ( नई बन जाती है ) । जैसा कि अविवक्षित वाच्यध्वनि के दो प्रकारों के समाश्रयण से प्राचीन अर्थ का अनुगम ( सम्बन्ध ) होने पर भी नवत्व है, जैसे— 'कुछ स्मित मुग्ध ( बन जाता है ), आँखों का विभव ( ऐश्वर्य ) तरल एवं लोचनम् तीत्यपिशब्दार्थः । एतदुक्तं भवति—वर्णनीयवस्तुनिष्ठः प्रज्ञाविशेषः प्रतिभानं, तत्र वर्णनीयस्य पारिमित्यादाद्यकविनैव स्पृष्टत्वात् सर्वस्य तद्विषयं प्रतिभानं तज्जातीयमेव स्यात् । ततश्च काव्यमपि तज्जातीयमेवेति भ्रष्ट इदानीं कविप्र- योगः, उक्तवैचित्र्येण तु त एवार्था निरवधयो भवन्तीति तद्विषयाणां प्रतिभा- नामानानन्त्यमुपपन्नमिति । ननु प्रतिभानन्त्यस्य किं फलमिति निर्णेतुं वाणी नवत्वमायातीत्युक्तं, तेन वाणीनां काव्यवाक्यानां तावन्नवत्वमायाति । तच्च प्रतिभानन्त्ये सत्युपपद्यते, तच्चार्थानन्त्ये, तच्च ध्वनिप्रभेदादिति । तत्र प्रथममत्यन्ततिरस्कृतवाच्यान्वयमाह—स्मितमिति । मुग्धमधुरविभ- प्रभेद ) से भी इस प्रकार ( प्रतिभा का आनन्त्य ) हो जाता है, यह 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ है । बात यह हुई--वर्णनीय वस्तु में रहने वाला ( कवि का ) प्रज्ञा- विशेष प्रतिभान ( कहलाता है ), वहाँ वर्णनीय ( वस्तु ) के परिमित होने से पूर्व के कवि द्वारा ही स्पर्श कर लिए जाने के कारण सबका उस ( वर्णनीय वस्तु ) को विषय ( करने वाला ) प्रतिभान उसी जाति का ही होगा । और तब काव्य भी उसी जाति का ही ( हो जायगा, ऐसी स्थिति में ) इस समय कवि का प्रयोग बेकार ( भ्रष्ट ) है, किन्तु उक्त ( ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के ) वैचित्र्य से वे ही वर्णनीय अर्थ अवधिरहित ( अनन्त ) हो जाते हैं, इस प्रकार तद्विषयक ( वर्णनीय अर्थविषयक ) प्रतिभानों का आनन्त्य बन जाता है । शङ्का - प्रतिभा के आनन्त्य का क्या फल है ? इसका निर्णय करने के लिए 'वाणी नवत्व को प्राप्त करती है' यह कहा । उससे वाणियों अर्थात् काव्य वाक्यों का नवत्व आ जाता है । वह ( वाणी का नवत्व ) प्रतिभा के आनन्त्य होने पर ही बनता है, और वह ( प्रतिभा का आनन्त्य ) अर्थ ( वर्णनीय वस्तु ) के आनन्त्य होने पर ( बनता है ) और वह ( अर्थ का आनन्त्य ) ध्वनि के प्रभेद से ( बनता है ) । वहाँ, पहले अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ( ध्वनि ) का अन्वय कहते हैं-कुछ