ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् उद्भटादिभिः प्रयुक्तेऽपि तस्मिन्नार्थः कश्चिदधिको हृदयपथमवतीर्ण इत्यभि- प्रायेणाह—गताः श्रवणगोचरमिति । रीतयश्चेति । तदनतिरिक्तवृत्तयोऽपि गताः श्रवणगोचरमिति सम्बन्धः । तच्छब्देनात्र माधुर्यादयो गुणाः, तेषां च समु- चितवृत्त्यर्पणे यदन्योन्यमेलनक्षमत्वेन पानक इव गुडमरिचादिरसानां सङ्घात- रूपतागमनं दीप्तललितमध्यमवर्णनीयविषयं गौडीयवैदर्भपाञ्चालदेशहेवाकप्रा- चुर्यदृशा तदेव त्रिविधं रीतिरित्युक्तम् । जातिर्जातिमतो नान्या, समुदायश्च समुदायिनो नान्य इति वृत्तिरीतयो न गुणालङ्कारव्यतिरिक्ता इति स्थित आचार्यों द्वारा प्रयुक्त होने पर भी कोई अधिक अर्थ हृदयपथ पर अवतीर्ण नहीं होता, इस अभिप्राय से कहते हैं—सुनने में आई हैं—। और रीतियाँ—। उससे अतिरिक्त होकर न रहने वाली ( रीतियाँ ) भी सुनने में आई हैं, यह सम्बन्ध है । यहाँ 'उस' ( तत् ) शब्द से माधुर्यादि गुण अभिप्रेत हैं; और उन¹ ( माधुर्यादि गुणों ) का समुचित वृत्ति में अर्पण होने पर, जो परस्पर मिलाने की क्षमता होने के कारण, पानक रस की भांति, गुड़, मरिचादि रसों का संघात ( मिलित ) रूप में आना है, दीप्त, ललित और मध्यम वर्णनीय विषय रूप, गौडीय, वैदर्भ और पाञ्चाल देश के स्वभाव ( हेवाक ) की प्रचुरता की दृष्टि से वही त्रिविध होकर 'रीति' कहा गया है । जाति जातिमान् से अन्य नहीं है और समुदाय समुदायी से अन्य नहीं है; इस प्रकार वृत्ति-रीतियाँ गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त नहीं हैं; इस लिए वह व्यतिरेकी² हेतु तदवस्थ ही रहा ।
१. जिस प्रकार ऊपर वृत्तियों की गतार्थता अनुप्रासों से बताई गई, उसी प्रकार अब रीतियों की गतार्थता को माधुर्य आदि गुणों से अभिहित करते हैं । आचार्य वामन, जो रीति-सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक आचार्य हैं, के अनुसार 'विशिष्ट पदरचना' ही 'रीति' है, यहाँ 'वैशिष्ट्य' गुणों के द्वारा आहित होता है (विशिष्टा पदरचना रीतिः, विशेषो गुणात्मा-वामन) इसी 'रीति' को लोचन- कार ने 'समुचित वृत्ति में गुणों का अर्पण अर्थात् संघातरूपतागमन' कहा है और गुड-मरिचादि के रसों का संघात होने पर पानक रस का उदाहरण दिया है । 'समुचित वृत्ति' से तात्पर्य है दीप्त आदि वर्णनीय के औचित्य से युक्त वर्णरचना' (जैसा कि 'बालप्रिया' में निर्देश है )। ऐसी वर्णरचना में 'गुण' आकर 'रीति' का रूप धारण कर लेते हैं । प्राचीन आचार्यों ने दीप्त, ललित और मध्यम वर्णनीय विषयों के अनुसार 'रीति' के गौडीय, वैदर्भ और पाञ्चाल, ये तीन दैशिक भेद किए हैं । माधुर्य आदि गुण समुचित वर्णरचना के साथ संहत या समूहताप्राप्त हो जाते हैं तब उनकी स्थिति 'रीति' के रूप में हो जाती है । इस प्रकार यह भी निश्चय हुआ कि रीतियाँ गुणों से व्यतिरिक्त तत्त्व नहीं हैं । २. व्यतिरेकी हेतु—पहले जो यह कह चुके हैं कि निर्दिष्ट गुण और अलङ्कारों के अतिरिक्त कोई तत्त्व नहीं जो चारुत्वहेतु है, इसी प्रसंग में चारुत्वहेतु के रूप में प्राप्त वृत्ति और रीति की गतार्थता अलङ्कार और गुण में बताई गई । इस प्रकार 'ध्वनिः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान्, चारुत्वहेतुत्वात्, यो हि गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति' यह केवलव्यतिरेकी हेतु अपने रूप में अखण्डित रहा । और फिर वह बात अभाव वादी पक्ष के अनुसार फिर सामने आई कि आखिर यह 'ध्वनि' क्या है ?