ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः २३ ध्वन्यालोकः अन्ये ब्रूयुः—नास्त्येव ध्वनिः । प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणः काव्यप्रकारस्य काव्यत्वहानेः सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम् । न चोक्तप्रस्थानातिरेकिणो मार्गस्य तत्सम्भवति । न च तत्समतान्तःपातिनः सहृदयान् कांश्चित्परिकल्प्य तत्प्रसिद्ध्या ध्वनौ काव्यव्यपदेशः प्रवर्तितोऽपि सकलविद्वन्मनोग्राहितामवलम्बते । अन्य लोग कहें—नहीं है ध्वनि, क्योंकि प्रसिद्ध प्रस्थान से व्यतिरिक्त काव्य के प्रकार (भेद) में काव्यत्व की हानि है । सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्व ही काव्य का लक्षण है । उक्त प्रस्थानों से अतिरिक्त मार्ग का वह सम्भव नहीं है । और उस सम्प्रदाय के (मानने वालों के) अन्तर्गत ही कुछ सहृदयों को तैयार करके उनके द्वारा प्रसिद्ध कर दिए जाने से ध्वनि में काव्य का व्यवहार प्रवृत्त किया भी जाय तब भी सभी विद्वानों का मनोग्राही नहीं हो सकता । लोचनम् एवासौ व्यतिरेकी हेतुः । तदाह—तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति । नैष चारु- त्वस्थानं शब्दार्थरूपत्वाभावात् । नापि चारुत्वहेतुः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्त- त्वादिति । तेनाखण्डबुद्धिसमास्वाद्यमपि काव्यमपोद्धारबुद्ध्या यदि विभज्यते, तथाप्यत्र ध्वनिशब्दवाच्यो न कश्चिदतिरिक्तोऽर्थो लभ्यत इति नामशब्देनाह । ननु मा भूदसौ शब्दार्थस्वभावः, मा च भूत्तच्चारुत्वहेतुः, तेन गुणालङ्कार- व्यतिरिक्तोऽसौ स्यादित्याशङ्क्य द्वितीयमभाववादप्रकारमाह—अन्य इति । उसे कहते हैं—उनसे व्यतिरिक्त कौन यह अतिरिक्त ध्वनि नाम १ का (नया) पदार्थ है ? —। यह (ध्वनि) चारुत्व का स्थान नहीं हो सकता, क्योंकि न तो यह शब्द रूप है और न अर्थरूप । और यह चारुत्व का हेतु भी नहीं है, क्योंकि यह गुण तथा अलङ्कार से व्यतिरिक्त है (उनकी सीमा में नहीं आता) । इसलिए अखण्ड बुद्धि द्वारा समास्वादन के योग्य भी काव्य का विभाग (-अपोद्धार) बुद्धि से यदि विभाग (खण्ड) करते हैं तथापि यहां 'ध्वनि' शब्द का वाच्य कोई अतिरिक्त अर्थ उपलब्ध नहीं होता, वह (वृत्ति ग्रन्थ में) 'नाम' शब्द से कहा है । यह (ध्वनि) शब्द-अर्थ के स्वभाव का न हो और चारुत्व का हेतु भी न हो, १. कोऽयं ध्वनिर्नामेति—यह पंक्ति अभाववाद के प्रथम विकल्प का निर्णीतार्थ व्यक्त करती है । इस पक्ष में ध्वनि को चारुत्व का स्थान या चारुत्व का हेतु मान कर ध्वनि के अस्तित्व को स्वीकार करने की बात उठी थी, परन्तु इसके विरुद्ध इस पक्ष ने सबल तर्क यह उपस्थित किया कि ध्वनि चारुत्व-स्थान तभी हो सकता था जब कि यह शब्द रूप या अर्थ रूप होता और दूसरे, यह चारुत्वहेतु भी तभी हो सकता था जब कि गुण अथवा अलङ्कार से व्यतिरिक्त होता । न तो यह शब्दार्थ रूप है और न तो यह गुणालङ्कार व्यतिरिक्त है, इस कारण यह स्पष्ट है कि 'ध्वनि' कोई पदार्थ या तत्त्व नहीं । इतना तात्पर्य उपर्युक्त 'किं' शब्द से द्योतित होता है ।