भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 680 में से

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पृष्ठ 84

२४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भवत्वेवम् ; तथापि नास्त्येव ध्वनिर्यादृशस्तव लिलक्षयिषितः । काव्यस्य ह्यसौ कश्चिदुक्तव्यः । न चासौ नृत्तगीतवाद्यादिस्थानीयः काव्यस्य कश्चित् । कवनीयं काव्यं, तस्य भावश्च काव्यत्वम् । न च नृत्तगीतादि कवनीयमित्युच्यते । प्रसिद्धेति । प्रसिद्धं प्रस्थानं शब्दार्थौ तद्गुणालङ्काराश्चेति, प्रतिष्ठन्ते परम्परया व्यवहरन्ति येन मार्गेण तत्प्रस्थानम् । काव्यप्रकारस्येति । काव्य- प्रकारत्वेन तव स मार्गोऽभिप्रेतः, 'काव्यस्यात्मा' इत्युक्तत्वात् । ननु कस्मात्त- त्काव्यं न भवतीत्याह—सहृदयेति । मार्गस्येति । नृत्तगीताक्षिनिकोचनादिप्राय- स्येत्यर्थः । तदिति । सहृदयेत्यादिकाव्यलक्षणमित्यर्थः । ननु ये तादृशमपूर्वं इससे वह गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त तो होगा ! यह आशङ्का करके अभाव-वाद के दूसरे प्रकार¹ को कहते हैं—अन्य—। हो ऐसा; तथापि जैसा कि तुम्हें लक्षणयुक्त बनाना अभिलषित है वैसा ध्वनि तो है ही नहीं (क्योंकि) वह (ध्वनि) काव्य का कोई कहा जायगा । और, वह नृत्त, गीत, वाद्य आदि स्थानीय कुछ तो नहीं है ! कवनीय काव्य होता है, उसका भाव काव्यत्व है। नृत्त, गीत आदि 'कवनीय' नहीं कहे जाते । प्रसिद्ध—। प्रसिद्ध प्रस्थान, अर्थात् शब्द और अर्थ एवं उनके गुण और अलङ्कार । प्रतिष्ठित होते हैं, परम्परा से जिस मार्ग से व्यवहार करते हैं वह 'प्रस्थान' है। काव्य के प्रकार में—। काव्य के प्रकार के रूप में वह मार्ग तुम्हें अभिप्रेत है, क्योंकि 'काव्य का आत्मा' यह कहा है । शङ्का है कि कैसे वह काव्य नहीं हो सकता, इस पर कहते हैं—सहृदय०—। मार्ग का—। अर्थात् नृत्त, गीत, आँखों का मींचना आदि के सदृश (मार्ग का) । वह—। अर्थात् सहृदय० इत्यादि काव्य का लक्षण । जो उस अब लोचनकार ने मूल वृत्तिग्रन्थ के 'नाम' शब्द का तात्पर्य इस प्रकार निकाला है—ध्वनि तत्त्व किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता, अग्रत्या अखण्ड बुद्धि द्वारा समास्वाद्य भी काव्य को अपोद्धार या विभाग की बुद्धि से विभक्त करते हैं तब भी 'ध्वनि' शब्द का वाच्य कोई अतिरिक्त अर्थ नहीं प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में ध्वनि का अभाव ही मानना चाहिए। १. अभाववाद के प्रथम विकल्प में यही निर्णय हुआ कि ध्वनि न तो शब्द अथवा अर्थ के रूप में माना जा सकता और न तो चारुत्व के हेतु के रूप में स्वीकार किया जा सकता, इस लिए ध्वनि है ही नहीं। इस पर प्रतिपक्षी की ओर से यह शङ्का होती है कि क्यों न ध्वनि को गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त कोई तत्त्व स्वीकार किया जाय । इस पर अभाववाद के दूसरे विकल्प में जोर देकर यह खण्डन उपस्थित किया गया है कि माना कि गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त ही कोई ध्वनि है, लेकिन ऐसे 'ध्वनि' को मानने से लाभ क्या होगा ? क्यों कि 'ध्वनि' को काव्य का ही तत्त्व होना चाहिए, वहीं प्रस्तुत में लक्षणीय हो सकता है। और जब काव्य के रूप शब्द-अर्थ और चारुत्वहेतु गुण और अलङ्कार से ध्वनि को पृथक् कर देते हैं तब तो निश्चय ही ध्वनि काव्य का कोई तत्त्व नहीं हो सकता, नृत्त, गीत, वाद्य आदि के समान ही कोई तत्त्व हो सकता है जिसका काव्य से कोई सम्बन्ध नहीं। काव्य 'कवनीय' (कवि के प्रयत्न का साध्य) होता है और नृत्त-गीतादि कवनीय नहीं, उसी प्रकार ध्वनि की स्थिति है।