भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 680 में से

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पृष्ठ 85

प्रथम उद्योतः २५ लोचनम् काव्यरूपतया जानन्ति, त एव सहृदयाः । तदभिमतत्वं च नाम काव्यलक्षण- मुक्तप्रस्थानातिरेकिण एव भविष्यतीत्याशङ्कयाह - न चेति । यथा हि खड्गलक्षणं करोमीत्युक्त्वा आतानवितानात्मा प्राव्रियमाणः सकलदेहाच्छादकः सुकुमार- श्चित्रतन्तुविरचितः संवर्तनविवर्तनसहिष्णुरच्छेदकः सुच्छेद्य उत्कृष्टः खड्ग इति ब्रुवाणः, परैः पटः खल्वेवंविधो भवति न खड्ग इत्ययुक्ततया पर्यनुयुज्यमान एवं ब्रूयात्—ईदृश एव खड्गो ममाभिमत इति तादृगेवैतत् । प्रसिद्धं हि लक्ष्यं भवति न कल्पितमिति भावः । तदाह - सकलविद्वदिति । विद्वांसोऽपि हि तत्समयज्ञा एव भविष्यन्तीति शङ्कां सकलशब्देन निराकरोति । एवं हि कृतेऽपि न किञ्चि- त्कृतं स्यादुन्मत्तता परं प्रकटितेति भावः । यस्त्वत्राभिप्रायं व्याचष्टे - जीवितभूतो ध्वनिस्तावत्तवाभिमतः, जीवितं च नाम प्रसिद्धप्रस्थानातिरिक्तमलंकारकारैरनुक्तत्वाच्च न काव्यमिति लोके प्रकार के अपूर्व को काव्य के रूप से जानते हैं, वे ही- 'सहृदय' हैं और उन (सहृदयों) का जो अभिमत है वह काव्यलक्षण कहे हुए प्रस्थानों के अतिरिक्त का ही होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—उस ध्वनि-। क्योंकि जैसे, 'खड्ग का लक्षण करता हूँ' यह कह कर, 'आतान-वितान के स्वभाव वाला, प्रावरण किया जाता हुआ, सकल शरीर को ढँक देने वाला, सुकुमार, रंग-बिरंगे तन्तुओं से बना हुआ, संकोच और विकास को सह लेने वाला, सुख से छेदन के योग्य उत्कृष्ट खड्ग है' यह कहता हुआ, दूसरों के द्वारा 'ऐसा तो कपड़ा होता है खड्ग नहीं' इस प्रकार अयुक्त होने के कारण, पूछा गया (वह व्यक्ति) इस प्रकार कहे ऐसा ही खड्ग मेरा अभिमत है उसी तरह का यह है। भाव यह कि लक्ष्य प्रसिद्ध होता है, कल्पित नहीं। उसे कहते हैं—सकल विद्वानों के—। विद्वान् भी उस (ध्वनि) के समय (सङ्केत) के जानने वाले ही होंगे, इस शङ्का को 'सकल' शब्द से (वृत्तिकार) निराकरण करते हैं। मतलब यह कि ऐसा करने पर भी कुछ नहीं किया, केवल पागलपन¹ ही प्रकट किया। जो व्यक्ति यह (इस) अभिप्राय की व्याख्या² करता है—'तुम्हारा अभिमत है कि ध्वनि (काव्य का) जीवितभूत (अनुप्राणक) तत्त्व है और जीवित रूप (ध्वनि) प्रसिद्ध प्रस्थानों से अतिरिक्त है और इसे आलङ्कारिकों ने नहीं कहा है अतः वह १. ध्वन्यभाववादी का दूसरा विकल्प संक्षेप में यह है कि ध्वनि चूंकि परम्परा से व्यवहृत मार्गों में नहीं आता, अतः काव्य के आत्मा या प्रकार के रूप में उसे स्वीकृत नहीं किया जा सकता। दूसरे 'सहृदयाह्लादकारिशब्दार्थमयत्व' रूप काव्य-लक्षण उसमें संघटित भी नहीं होता। अगर कुछ सहृदय एकवाक्य होकर ध्वनि को हृदयाह्लादी मान कर 'काव्य' नाम दे भी दें तब भी यह सकल विद्वज्जन-मनोग्राह्य तत्त्व नहीं हो सकता। इस प्रकार ध्वनि के सम्बन्ध में यह सब कुछ 'पागलपन' के अतिरिक्त कुछ नहीं । २. लोचनकार ने द्वितीय अभाववादी के अभिप्राय को कुछ भिन्न रीति से बताने वाले का यह खण्डन किया है। उसके अनुसार अभिप्राय यह है कि पहले आलङ्कारिकों ने ध्वनि को आत्मा या जीवित रूप में स्वीकार नहीं किया है और यह 'जीवित'भूत ध्वनि तत्त्व प्रसिद्ध प्रस्थानों से

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