भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनरपरे तस्याभावमन्यथा कथयेयुः—न सम्भवत्येव ध्वनिनार्- मापूर्वः कश्चित् । कामनीयकमनतिवर्तमानस्य तस्योक्तेष्वेव चारुत्वहेतु- ष्वन्तर्भावात् । तेषामन्यतमस्यैव वा अपूर्वसमाख्यामात्रकरणे यत्कि- ञ्चन कथनं स्यात् । फिर अन्य लोग उस (ध्वनि) का अभाव अन्य प्रकार से कहें—'ध्वनि नाम का कोई अपूर्व सम्भव ही नहीं हैं, क्योंकि वह कामनीयक का अतिवर्तन नहीं करता, (इसलिए) उसका कहे गए चारुत्व के हेतुओं में ही अन्तर्भाव है । अथवा उन्हीं में से एक की अपूर्व समाख्या (नामकरण) की जाय तो जो-कुछ (तुच्छ) कथन होगा । लोचनम् प्रसिद्धमिति । तस्येदं सर्वं स्ववचनविरुद्धम् । यदि हि तत्काव्यस्यानुप्राणकं तेनाङ्गीकृतं पूर्वपक्षवादिना तच्चिरन्तनैरनुक्तमिति प्रत्युत लक्षणार्हमेव भवति । तस्मात्प्राक्तन एवात्राभिप्रायः । ननु भवत्वसौ चारुत्वहेतुः शब्दार्थगुणालङ्कारान्तर्भूतश्च, तथापि ध्वनिरि- त्यमुया भाषया जीवितमित्यसौ न केनचिदुक्त इत्यभिप्रायमाशङ्क्य तृतीयम- भाववादमुपन्यस्यति-पुनरपर इति । कामनीयकमिति कमनीयस्य कर्म । चारुत्व- धीहेतुतेति यावत् । (जीवितभूत ध्वनि) काव्य नहीं है, 'लोक में प्रसिद्ध है।' यह सब कथन उस (व्यक्ति) के अपने ही कथन के विरुद्ध ठहरता है, क्योंकि यदि उस पूर्वपक्षवादी ने यह स्वीकार कर लिया कि (ध्वनि) काव्य का अनुप्राणक (जीवितभूत) है तो प्राचीनों द्वारा उक्त न होने के कारण प्रत्युत वह लक्षणार्ह ही होगा । इस लिए पहला ही यहाँ अभिप्राय (ठीक) है। माना कि वह (ध्वनि चारुत्व का हेतु है और शब्द-अर्थ के गुण और अलङ्कारों के अन्तर्भूत (भी) है; तथापि 'ध्वनि' इस भाषा के द्वारा (अर्थात् यह कहकर) 'जीवित' ऐसा वह किसी के द्वारा नहीं कहा गया है इस अभिप्राय की आशङ्का करके तीसरे अतिरिक्त है। अतः यह काव्य की श्रेणी में नहीं आ सकता । इसे अभाववादी के अनुसार लोक में प्रसिद्ध होना चाहिए, जैसे शब्द, अर्थ, गुण, अलङ्कार लोक में प्रसिद्ध हैं। लोचनकार का कहना है कि इस व्याख्याकार का यह सब कथन 'स्ववचनविरुद्ध' है। क्योंकि, जबकि यह स्वयं पूर्वपक्षवादी (ध्वन्यभाववादी) ने स्वीकार कर लिया कि ध्वनि काव्य का जीवित या अनुप्राणक तत्त्व है तब तो उसे 'काव्य' होना ही चाहिए। उसे इस कारण न मानना कि प्राचीन किसी आलङ्कारिक ने उसे नहीं कहा है, यह कहाँ की दलील है। बल्कि, वह तो सर्वथा 'लक्षणार्ह' अर्थात् लक्ष बनाने के योग्य (लक्षयितव्य) है। अतः उपर्युक्त व्याख्यान स्वीकार्य नहीं। पूर्व व्याख्यान ही द्वितीय अभाववादी के अभिप्राय को ठीक व्यक्त करता है।