ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः २७ ध्वन्यालोकः किञ्च वाग्विकल्पानामानन्त्यात् सम्भवत्यपि वा कस्मिंश्चित् काव्य- लक्षणविधायिभिः प्रसिद्धैरप्रदर्शिते प्रकारलेशे ध्वनिध्वनिरिति यदेत- दलीकसहृदयत्वभावनामुकुलितलोचनैर्नृत्यते, तत्र हेतुं न विद्मः। सहस्रशो हि महात्मभिरन्यैरलङ्कारप्रकाराः प्रकाशिताः प्रकाश्यन्ते च। न च तेषामेषा दशा श्रूयते। तस्मात् प्रवादमात्रं ध्वनिः। न त्वस्य क्षोदक्षमं तत्त्वं किञ्चिदपि प्रकाशयितुं शक्यम्। तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोकः— और भी, वाग्विकल्पों के अनन्त होने के कारण प्रसिद्ध काव्य-लक्षणकारों द्वारा अप्रदर्शित किसी प्रकार लेश के सम्भव होने पर भी, ‘ध्वनि-ध्वनि’ यह जो, सहृदयता की भावना से आंखें मूंद कर (ध्वनिवादी) नाच रहे हैं उसमें हेतु हम नहीं जानते। अन्य महात्माओं (विद्वानों) ने हजारों अलङ्कारों के भेद बताए हैं और बताते हैं उनको यह स्थिति नहीं सुनाई पड़ती। अतः ध्वनि प्रवादमात्र है। इसका कुछ भी विचारयोग्य तत्त्व प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। जैसा कि अन्य ने यहाँ श्लोक बनाया ही है— लोचनम् ननु विच्छित्तीनामसंख्यत्वात्काचित्तादृशी विच्छित्तिरस्माभिर्दृष्टा, या नानुप्रासादौ, नापि माधुर्यादावुक्तलक्षणेऽन्तर्भवेदित्याशङ्कयाभ्युपगमपूर्वकं परिहरति—वाग्विकल्पानामिति। वक्तीति वाक् शब्दः। उच्यत इति वागर्थः। अभाववाद का उपन्यास करते हैं—फिर अन्य लोग—। 'कामनीयक' १ अर्थात् कमनीय का कर्म, मतलब कि चारुत्व बुद्धि का हेतुत्व। विच्छित्तियों (वैचित्र्यों) के असंख्य होने के कारण कोई उस प्रकार की विच्छित्ति हमने देखी है जो न अनुप्रास आदि अलङ्कारों में और न माधुर्य आदि गुणों में, जैसा कि उसके लक्षण कहे गए हैं, अन्तर्भूत हो, यह आशङ्का करके अभ्युपगमपूर्वक (इसे स्वीकार १. तृतीय अभाववाद के अवतरण में लोचनकार का कहना है कि ध्वनिवादी का यहाँ यह पक्ष होगा कि ध्वनि को चारुत्व का हेतु मान कर गुण और अलङ्कार के अन्तर्भूत मान लेते हैं, किन्तु इतना तो मानना ही होगा कि अब तक किसी ने ‘ध्वनि’ का नाम लेकर उसे 'काव्य का जीवित' (काव्यस्यात्मा) बनाने का प्रयास किया हो अतः यह एक अभूतपूर्व बात है, इस प्रकार ध्वनि को स्वीकार करना चाहिए। इस पर अभाववाद के पक्ष से यह कहना है कि किसी प्रकार ध्वनि उस सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकता जिसमें कमनीयता या चारुता को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् ध्वनि चारुत्वहेतु ही अन्ततः सिद्ध होकर रह जाता है। ऐसी स्थिति में उन्हीं चारुत्वहेतुओं में अन्तर्भूत एक तत्त्व को