भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्

उच्यतेऽनयेति वागभिधाव्यापारः । तत्र शब्दार्थवैचित्र्यप्रकारोऽनन्तः । अभि- धावैचित्र्यप्रकारोऽनन्तः । अभिधावैचित्र्यप्रकारोऽप्यसंख्येयः । प्रकारलेश इति । स हि चारुत्वहेतुर्गुणो वालङ्कारो वा । स च सामान्यलक्षणेन संगृहीत एव । यदाहुः—‘काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः’ इति । तथा ‘वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कृतिः’ इति । ध्वनिर्ध्वनिरिति वीप्सया सम्भ्रमं सूचयन्नादरं दर्शयति—नृत्यत इति । तल्लक्षणकृद्भिस्तद्युक्तका- व्यविधायिभिस्तच्छ्रवणोद्भूतचमत्कारैश्च प्रतिपत्तृभिरिति शेषः । ध्वनिशब्दे कोऽत्यादर इति भावः । एषा दशेति । स्वयं दर्पः परैश्च स्तूयमानतेत्यर्थः । वाग्विकल्पाः वाक्प्रवृत्तिहेतुप्रतिभाव्यापारप्रकारा इति वा । तस्मात्प्रवादमात्रमिति । सर्वेषामभाववादिनां साधारण उपसंहारः । यतः शोभाहेतुत्वे गुणालङ्कारेभ्यो करते हुए ) परिहार¹ करते हैं—वाग्विकल्पों के—। ( 'वाक्' की तीन व्युत्पत्तियों के अनुसार ) 'वक्तीति वाक्', जिसे कहता है वह वाक्, अर्थात् शब्द, 'उच्यत इति वाक्' जो कहा जाता है, अर्थात् अर्थ और 'उच्यतेऽनया', जिससे कहा जाता है अर्थात् अभिधा व्यापार ( ये तीन अर्थ गृहीत होते हैं ) । उनमें शब्द और अर्थ के वैचित्र्य का प्रकार अनन्त है । अभिधा के वैचित्र्य प्रकारों की भी कोई संख्या नहीं । प्रकारलेश—। वह चारुत्व का हेतु गुण हो अथवा अलङ्कार हो, वह सामान्य लक्षण के द्वारा संगृहीत ही ( हो जायगा ) । जैसा कि ( वामन ) कहते हैं—'काव्य के शोभाकारी धर्म गुण हैं, और उस ( काव्य की शोभा ) के अतिशयकारी हेतु अलङ्कार हैं' । तथा 'वक्र ( विचित्र ) अभिधेय ( अर्थ ) और शब्द की उक्ति वाणियों की अलङ्कृति है ।' 'ध्वनि-ध्वनि' इस दो बार ( वीप्सा ) के कथन से ( ध्वनिवादियों का ) सम्भ्रम ( हड़बड़ी ) सूचित करते हुए ( उनका ध्वनि में ) आदर दर्शाते हैं—नाचते हैं—। शेष यह कि ( ध्वनि ) का लक्षण करने वाले; उससे युक्त काव्य का निर्माण करने वाले; उसके सुनने मात्र से उत्पन्न चमत्कार वाले प्रतिपत्तृजन । भाव यह कि 'ध्वनि' इस शब्द मात्र में आदर का क्या मतलब ? ऐसी दशा—। अर्थात् स्वयं तो दर्प तथा दूसरों से स्तूयमान होना । वाग्विकल्प अर्थात् अथवा वाक्प्रवृत्ति के हेतुभूत प्रतिभा व्यापार के प्रकार । इसलिए प्रवाद मात्र—। समस्त अभाव-वादियों का यह सामान्य रूप से उपसंहार है । अर्थात् आपने एक अपूर्व नाम से 'ध्वनि' के नाम से अभिहित कर दिया तो यह कोई महत्त्व का कथन नहीं कहा जा सकता । १. ऐसा भी सम्भव है 'ध्वनि' कोई ऐसी विच्छित्ति या वैचित्र्य को लेकर कहा गया है जिसका अन्तर्भाव न किसी गुण में होता है और न किसी अलङ्कार में । ऐसी स्थिति में 'ध्वनि' को स्वीकार करना आवश्यक हो जाता है । यह पूर्वपक्षी की आशङ्का को सर्वथा अभाववादी मान लेता है और अपने पक्ष का समर्थन करते हुए कहता है कि पूर्वाचार्यों द्वारा अनन्त प्रकारों में से किसी अप्रदर्शित प्रकार को लेकर इतना प्रपञ्च खड़ा नहीं किया जा सकता । यह सर्वथा उपहसनीय बात होगी ।