ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः २९ ध्वन्यालोकः यस्मिन्नस्ति न वस्तु किञ्चन मनः प्रह्लादि सालंकृति व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैर्वक्रोक्तिशून्यं च यत् । काव्यं तद्ध्वनिना समन्वितमिति प्रीत्या प्रशंसञ्जडो नो विद्मोऽभिदधाति किं सुमतिना पृष्टः स्वरूपं ध्वनेः ॥ भाक्तमाहुस्तमन्ये । अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्यात्मानं गुण- वृत्तिरित्याहुः । जिसमें अलङ्कारयुक्त, मन को आह्लादित करने वाला कोई अर्थ (वस्तु) नहीं है, जिसे व्युत्पन्न वचनों से नहीं रचा गया है और जो वक्रोक्ति से शून्य है, उस काव्य की 'ध्वनि से समन्वित' यह (मानकर) प्रेम से प्रशंसा करता हुआ जड़ (मूर्ख ध्वनिवादी) सुमति जन द्वारा ध्वनि का स्वरूप पूछे जाने पर, क्या कहता है, हम नहीं जानते । अन्य लोग उसे 'भाक्त' कहते हैं; अन्य लोग उस 'ध्वनि' नामक काव्यात्मा को 'गुणवृत्ति' कहते हैं । लोचनम् न व्यतिरिक्तः, यतश्च व्यतिरिक्तत्वे न शोभाहेतुः, यतश्च शोभाहेतुत्वेऽपि नादरास्पदं तस्मादित्यर्थः । न चेयमभावसम्भावना निर्मूलैव दूषितेत्याह— तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना । यतो न सालङ्कृति, अतो न मनःप्रह्लादि । अनेनार्थालङ्काराणामभाव उक्तः । व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैरिति शब्दालङ्काराणाम् । वक्रोक्तिः उत्कृष्टा संघटना, तच्छून्यमिति शब्दार्थगुणानाम् । वक्रोक्तिशून्यशब्देन सामान्यलक्षणाभावेन क्योंकि (यदि ध्वनि) शोभा का हेतु है (तो) गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त नहीं है, और क्योंकि (यदि) वह गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है तो वह शोभा का हेतु नहीं है, और क्योंकि (यदि वह शोभा का हेतु है (तो भी) आदरास्पद नहीं है, इस कारण । यह नहीं कि बिना किसी मूल के (यहाँ) अभाव की सम्भावना है, कहते हैं—जैसा कि दूसरे ने—। अर्थात् ग्रन्थकार के समसामयिक 'मनोरथ' नाम के कवि ने । क्योंकि (वह) अलङ्कारयुक्त नहीं, अतः (वह) मन को आह्लादित करने वाला नहीं है, इससे अर्थालङ्कारों का अभाव कहा है। और व्युत्पन्न वचनों द्वारा रचित भी नहीं—इससे शब्दालङ्कारों का (अभाव कहा है) । वक्रोक्ति अर्थात् उत्कृष्ट सङ्घटना, उससे शून्य—इससे शब्द और अर्थ के गुणों का (अभाव कहा है)। कुछ लोग कहते हैं कि 'वक्रोक्तिशून्य' शब्द से (अलङ्कारों के इस 'वक्रोक्ति' रूप) १. मनोरथ कवि—लोचनकार ने वृत्ति ग्रन्थ में उद्धृत अभाववाद के अनुकूल श्लोक को किसी 'मनोरथ' कवि, जो ग्रन्थकार का समसामयिक था, का कहा है । 'मनोरथ' के नाम से न