ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सर्वलङ्काराभाव उक्त इति केचित् । तैः पुनरुक्तत्वं न परिहृतमेवेत्यलम् । प्रीत्येति । गतानुगतिकानुरागेणेत्यर्थः । सुमतिनेति । जडेन पृष्टो भ्रूभङ्गकटा- क्षादिभिरेवोत्तरं ददत्तत्स्वरूपं काममाचक्षीतेति भावः । एवमेतेऽभावविकल्पाः शृङ्खलाक्रमेणागताः, न त्वन्योन्यासम्बद्धा एव । तथा हि तृतीयाभावप्रकारनिरूपणोपक्रमे पुनःशब्दस्यायमेवाभिप्रायः, उपसं- हारैक्यं च सङ्गच्छते । अभाववादस्य सम्भावनाप्राणत्वेन भूतत्वमुक्तम् । भाक्तवादस्त्वविच्छिन्नः पुस्तकेष्वित्यभिप्रायेण भाक्तमाहुरिति । नित्यप्रवृत्तवर्त- मानापेक्षयाभिधानम् । भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति सामान्य लक्षण के न होने के कारण समस्त अलङ्कारों का अभाव कहा है । उन (व्याख्याकारों ने) पुनरुक्ति का परिहार नहीं किया है, अतः (उनका कथन) ठीक नहीं। बड़े प्रेम से—। अर्थात् गतानुगतिक (लकीर के फकीर होने के प्रति) अनुराग के कारण । सुलझी बुद्धि वालों द्वारा—। अगर कोई मूर्ख उनसे प्रश्न करता तो वे भौं हिला कर और आंख मटका कर ही उस (ध्वनि) के स्वरूप को पूरा कह डालते— यह मतलब है । इस प्रकार ये अभाव-वाद के विकल्प शृङ्खला के क्रम से प्राप्त हैं, न कि परस्पर असम्बद्ध¹ हैं, जैसा कि तीसरे अभाव-प्रकार के निरूपण के उपक्रम में 'पुनः' (फिर) शब्द का यही अभिप्राय है, और उपसंहार का एकत्व (साधारण्य) भी संगत होता है । अभाववाद के सम्भावना पर आधारित होने के कारण (उसमें) भूतकाल का प्रयोग किया है। किन्तु भाक्तवाद पुस्तकों में अविच्छिन्न रूप से चला आ रहा है, इस अभिप्राय से 'भाक्तमाहुः'² ('भाक्त' कहते हैं) यह नित्य-प्रवृत्त वर्तमान की अपेक्षा से अभिधान है । भज्यते = सेव्यते, अर्थात् प्रसिद्ध होने के कारण उत्प्रेक्षित होता है जो कोई ग्रन्थ का पता चलता है और न कोई सङ्केत ही मिलता है । 'राजतरङ्गिणी' में कश्मीर के राजा जयापीड (अष्टम शताब्दी) के सभापण्डितों में 'मनोरथ' का उल्लेख है । और मनोरथ के कुछ श्लोकों को आचार्य क्षेमेन्द्र ने 'औचित्य-विचार-चर्चा' में उद्धृत किया है । सम्भव है तीनों 'मनोरथ' किसी एक 'कवि' से सम्बद्ध हों । १. अभाववाद के उपर्युक्त तीन विकल्प परस्पर असम्बद्ध नहीं, बल्कि एक शृङ्खलित रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, इसी लिए सभी अभाववादियों के मतों का साधारण उपसंहार करते हुए वृत्तिग्रन्थ में आचार्य लिखते हैं—'इसलिए ध्वनि प्रवादमात्र है।' इस प्रकार तीनों विकल्पों की परस्पर सम्बद्धता का संकेत तृतीय अभाव-विकल्प के आरम्भ में 'पुनः' शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से देता है । २. अभाववाद चूंकि सम्भावना पर आधारित था इस लिए ग्रन्थकार ने 'जगदुः' यह भूतार्थक प्रयोग किया था किन्तु प्रस्तुत भाक्तवाद अलङ्कार-शास्त्र के ग्रन्थों में अविच्छिन्न रूप से स्मरण किया गया है इसलिए उसके लिए 'आहुः' इस नित्यप्रवृत्त वर्तमान के अर्थ में आचार्य ने प्रयोग किया है। भाक्तवाद को प्राचीनों ने विशेष रूप से 'गुणवृत्ति' शब्द से अभिहित किया है, जो