भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

प्रथम उद्योतः ३१ लोचनम् भक्तिर्धर्मोऽभिधेयेन सामीप्यादिः, तत आगतो भाक्तो लाक्षणिकोऽर्थः । यदाहुः— अभिधेयेन सामीप्यात्सारूप्यात्समवायतः । वैपरीत्यात्क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इति ॥ गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः, तत आगतो गौणोऽर्थो भाक्तः । भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः, तां प्रयोजनत्वेनो- द्दिश्य तत आगतो भाक्त इति गौणो लाक्षणिकश्च । मुख्यस्य चार्थस्य भङ्गो भक्तिरित्येवं मुख्यार्थबाधा, निमित्तं, प्रयोजनमिति त्रयसद्भाव उपचारबीज- वह 'भक्ति' है; अभिधेय के द्वारा (तटादि का) सामीप्यादि धर्म (उत्प्रेक्षित होता है), उस (सामीप्यादि निमित्त) से आगत (प्रतीत) लाक्षणिक अर्थ (लक्ष्य अर्थ) 'भाक्त' है। जैसा कि कहते हैं— 'अभिधेय के द्वारा सामीप्य, सारूप्य, समवाय, वैपरीत्य और क्रियायोग रूप सम्बन्ध से लक्षणा पांच प्रकार की मानी गई है।' गुणों के समुदाय में वृत्ति वाले शब्द का अर्थांश तैक्ष्ण्यादि ('सिंहो माणवकः' इस स्थल में) 'भक्ति' है उससे आगत (प्रतीत) गौण अर्थ 'भाक्त' है [सामीप्य] और तैक्ष्ण्य आदि प्रतिपाद्य अर्थ में श्रद्धातिशय 'भक्ति' है। उस (श्रद्धातिशय रूप भक्ति) को प्रयोजन के रूप में उद्देश्य करके उससे आगत 'भाक्त' है, इस प्रकार (भाक्त) गौण और लाक्षणिक है। मुख्य अर्थ का भङ्ग 'भक्ति' है। इस प्रकार मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन इन तीनों का सद्भाव उपचार का बीज' है, यह बात 'लक्षणा' ही है। प्राचीनों में विवरणकार उद्भट लिखते हैं—'शब्दानामभिधानं अभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च।' आचार्य वामन लिखते हैं—'सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः।' इस प्रकार आचार्य ने नित्य प्रवृत्त वर्तमान के अर्थ को सूचित करने वाला 'आहुः' इस लट् लकार का सार्थक प्रयोग किया है। १. 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ—यहाँ 'भक्ति' शब्द से आलंकारिकों की 'लक्षणा' (शुद्धा और गौणी) दोनों ग्राह्य हैं। जिस 'लक्षणा' को आलंकारिकों ने सादृश्येतर सम्बन्ध से शुद्धा और सादृश्य सम्बन्ध से गौणी माना है उसमें मीमांसकों ने केवल 'गौणी' को लक्षणा से भिन्न वृत्ति स्वीकार किया है। मीमांसक लोग 'गौणी' को एक अलग वृत्ति ही मानते हैं जो 'लक्षणा' से अतिरिक्त है। इस लिए 'भक्ति' शब्द से दोनों लक्षणा और गौणी (अर्थात् शुद्धा लक्षणा और गौणी) दोनों अभिहित होते हैं। लक्षणा या गौणी के लिए एक दूसरा शास्त्रीय शब्द 'उपचार' भी प्रसिद्ध है। जब कि उपचार 'लक्षणा' के ये तीन बीज-मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन—जहाँ होंगे वहीं लक्षणा होगी, और प्रस्तुत 'भक्ति' भी चूंकि 'लक्षणा' ही है तो सामान्यतः 'भक्ति' शब्द भी 'लक्षणा' के उक्त बीजों में संगत होना चाहिए, इस अभिप्राय से लोचनकार ने 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ लक्षणा-बीज के अनुकूल की हैं। (क) 'निमित्त' परक व्युत्पत्ति—भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति भक्तिः । (ख) 'प्रयोजन' परक व्युत्पत्ति—भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः ।