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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 680 में से

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पृष्ठ 92

३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मित्युक्तं भवति । काव्यात्मानं गुणवृत्तिरिति । सामानाधिकरण्यस्यायं भावः— यद्यप्यविवक्षितवाच्ये ध्वनिभेदे 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादावुपचारोऽस्ति, कही गई। काव्यात्मा (ध्वनि) को 'गुणवृत्ति' (कहते हैं) - । सामानाधिकरण्य¹ का भाव यह है—यद्यपि 'अविवक्षितवाच्य' नामक ध्वनि के एक भेद 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' (ग) 'मुख्यार्थबाध' परक व्युत्पत्ति—मुख्यार्थस्य भङ्गो भक्तिः। इन तीनों की हिन्दी 'लोचन' के प्रस्तुत हिन्दी-अनुवाद में अक्षरशः कर दी गई है। साथ ही लोचनकार ने मीमांसकों के अनुसार अलग से 'गौणी' के लिए भी 'भक्ति' की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है— गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः । इस प्रकार 'भक्ति' शब्द से 'लक्षणा' और 'गौणी' दोनों वृत्तियाँ ग्राह्य हैं। और, 'तत आगतः' इस पाणिनीय नियम के अनुसार इस प्रकार की लक्षणारूप या गौणीरूप 'भक्ति' से प्रतीत होने वाला लाक्षणिक या गौण अर्थ प्रस्तुत में 'भाक्त' कहा गया है। यही है 'भाक्तमाहुस्तमन्ये', अर्थात् अन्य लोग उस ध्वनि को भाक्त अर्थात् लाक्षणिक या गौण अर्थ कहते हैं। शुद्ध लक्षणा का प्रचलित उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है तथा 'गौणी' का प्रसिद्ध उदाहरण है 'अग्निर्मााणवकः'। कहा जा चुका है 'उपचार' वहीं होता है जहाँ उपर्युक्त 'बीज' हों। गङ्गा में घोष इसलिए सम्भव नहीं कि गङ्गा एक जल का प्रवाह है, नदी है, इसलिए प्रवाह में घोष (गाँव या बथान) नहीं रह सकता, यह मुख्यार्थ की बाधा है। चूंकि गङ्गा के समीप गङ्गा का तट है और उस पर घोष रह सकता है इसलिए 'गङ्गा' का सामीप्यरूप निमित्त से तट अर्थ ग्रहण किया गया इस 'तट' रूप अर्थ के ग्रहण से वक्ता के 'प्रयोजन' रूप शैत्य और पावनत्व की सिद्धि होती है अर्थात् 'गङ्गायां घोषः' इसके वक्ता का प्रयोजन यह प्रतीत होता है कि गङ्गा के बिलकुल किनारे घोष है जिससे गङ्गा के सभी शैत्य, पावनत्व आदि गुण 'तट' में ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यहाँ लाक्षणिक या लक्ष्य अर्थ 'तट' माना गया। यही स्थिति 'गौणी' में भी होती है। उदाहरण है—'अग्निर्मााणवकः' अर्थात् बालक अग्नि है। यहाँ मुख्यार्थबाध होता है कि बालक अग्नि कैसे है ? तब 'गौणी' द्वारा 'तीक्ष्णतारूप गुण' 'अग्नि' के अर्थभाग के रूप में माना गया (यहाँ यह स्वीकार करना पड़ता है कि अग्नि का गुणरूप अर्थ 'आक्षेप' से नहीं बल्कि 'गौणी' शक्ति से प्रतीत होता है। यहाँ 'तैक्ष्ण्य' रूप गुण 'प्रयोजन' है, जिसकी सिद्धि के लिए 'अग्नि' यह प्रयोग किया गया है। साहित्य-शास्त्र में प्रसिद्ध 'मुखं चन्द्रः' यह रूपक अलङ्कार का उदाहरण भी इस 'गौणी' का ही विषय है। ऊपर कहा जा चुका है कि यह मीमांसकों के अनुसार ही भिन्न वृत्ति है, अन्यथा इसे 'लक्षणा' का ही एक भेद साहित्य में माना गया है। [ ] इस चिह्न से अङ्कित 'सामीप्य' शब्द 'लोचन' के विचारकों के अनुसार 'प्रामाणिक' पाठ है। यह लेखक-प्रमाद के कारण सर्वत्र मुद्रित मिलता है। पण्डितों का कहना है कि 'सामीप्य' लक्षणा के प्रसिद्ध स्थल 'गङ्गायां घोषः' में किसी प्रकार 'प्रतिपाद्य' या प्रयोजन नहीं हो सकता। क्योंकि उपर्युक्त कारिका को उद्धृत करते हुए लोचनकार ने स्वयं 'सामीप्य' आदि को 'निमित्त' ही माना है। कुछ लोगों ने इस 'सामीप्य' को भी 'पावनत्व' के अर्थ में घसीटने का प्रयत्न किया है जो अस्वाभाविक लगता है। इसके साथ का दूसरा प्रयोग 'तैक्ष्ण्य' गौणी के उदाहरण 'अग्निर्मााणवकः' का प्रयोजन बन जाता है, अतः ठीक है। १. 'भाक्तमाहुस्तमन्ये' इस मूल ग्रन्थ का व्याख्यान वृत्तिग्रन्थ में 'अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्या-