ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: प्रथम उद्योतः ३३ लोचनम् तथापि न तदात्मैव ध्वनिः, तद्व्यतिरेकेणापि भावात्, विवक्षितान्यपरवाच्य- प्रभेदादौ । अविवक्षितवाच्येऽप्युपचार एव न ध्वनिरिति वक्ष्यामः । तथा च वक्ष्यति— भक्त्या बिभर्ति नैकत्वं रूपभेदादयं ध्वनिः । अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तथा ॥ इति ॥ कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । इति च । गुणाः सामीप्यादयो धर्मास्तैक्ष्ण्यादयश्च । तैरुपायैर्वृत्तिरर्थान्तरे यस्य; तैरुपायैर्वृत्तिर्वा शब्दस्य यत्र स गुणवृत्तिः शब्दोऽर्थो वा । गुणद्वारेण वा वर्तनं गुणवृत्तिरमुख्योऽभिधाव्यापारः । एतदुक्तं भवति—ध्वनतीति वा, ध्वन्यत इति वा, ध्वननमिति वा यदि ध्वनिः, तथाप्युपचरितशब्दार्थव्यापा- इत्यादि स्थल में 'उपचार' है, तथापि ध्वनि उपचारात्मा ही नहीं है, क्योंकि उपचार के अभाव में भी ( ध्वनि ) होता है । और विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि के प्रभेद आदि में । अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी उपचार ही होता है ध्वनि नहीं, यह हम कहेंगे । और उस प्रकार ( मूलकार ) कहेंगे— 'यह ध्वनि रूपभेद के कारण भक्ति के साथ एकत्व प्राप्त नहीं करता । अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण उस प्रकार यह लक्षित नहीं होता । हां, ध्वनि के किसी भेद का वह ( भक्ति ) उपलक्षण हो सकती है ।' सामीप्यादि धर्म और तैक्ष्ण्यादि धर्म गुण हैं । उन निमित्त रूप उपायों द्वारा अर्थान्तर में जिसकी वृत्ति हो, अथवा उन उपायों द्वारा वृत्ति हो, शब्द की जहाँ, वह 'गुणवृत्ति' शब्द अथवा अर्थ है । गुण के द्वारा वर्तन गुणवृत्ति, अमुख्य अभिधा व्यापार है । यह बात कही गई—यदि ध्वनन करता है ( ध्वनतीति ), अथवा ध्वनित होता है ( ध्वन्यत इति ), अथवा ध्वनन, यह ध्वनि है तथापि उपचरित शब्द, अर्थ और व्यापार के अतिरिक्त वह कुछ नहीं है । मुख्यार्थ में तो अभिधा ही होती है और अन्त में त्मानं गुणवृत्तिरित्याहुः' इन शब्दों में किया गया है । यहाँ प्रश्न उठता है कि 'ध्वनि' और गुण- वृत्ति दोनों का सामानाधिकरण्य बताया गया है । इसका यह तात्पर्य समझना चाहिए कि जहाँ गुणवृत्ति होती है वहाँ ध्वनि होता है, इसका यह तात्पर्य नहीं कि गुणवृत्ति रूप ही ध्वनि है अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति है वहाँ ध्वनि है । प्रस्तुत ग्रन्थ में आगे चल कर ध्वनि के दो भेद बताये गये हैं—अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य । अविवक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण दिया गया है—'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि । यहाँ तो उपचार या गुणवृत्ति है, अर्थात् यहाँ ध्वनि के साथ गुणवृत्ति का सामानाधिकरण्य ( एक ही अधिकरण में उपस्थिति ) बन जाता है किन्तु इस सामानाधिकरण्य का यह अर्थ नहीं कि ध्वनि को कोई उपचारात्मा ही कह डाले । कारण कि ध्वनि वहाँ भी होता है जहाँ उपचार बिलकुल नहीं होता, जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के प्रभेद आदि में । इस प्रकार ध्वनि का गुणवृत्ति के साथ सामानाधिकरण्य तो बन सकता है तादात्म्य या एकरूपता नहीं बन सकती । इसी बात को 'भक्त्या बिभर्ति०' इत्यादि कारिका ग्रन्थ से भी निर्देश किया है । यह विषय आगे और भी स्पष्ट होगा । ३ ध्व०