भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 680 में से

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३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यपि च ध्वनिशब्दसंकीर्तनेन काव्यलक्षणविधायिभिर्गुणवृत्ति- रन्यो वा न कश्चित्प्रकारः प्रकाशितः, तथापि अमुख्यवृत्त्या काव्येषु व्यवहारं दर्शयता ध्वनिमार्गो मनाक्स्पृष्टोऽपि न लक्षित इति परि- कल्प्यैवमुक्तम्—'भाक्तमाहुस्तमन्ये' इति । यद्यपि 'ध्वनि' शब्द का उल्लेख करके काव्य के लक्षण बनाने वालों ने गुणवृत्ति अथवा दूसरे किसी अन्य प्रकार को प्रकाशित नहीं किया है, तथापि अमुख्य वृत्ति (व्यापार) के द्वारा काव्य से व्यवहार दिखाते हुए (प्राचीन ने) ध्वनि-मार्ग को थोड़ा स्पर्श करके भी लक्षित नहीं किया है, ऐसी परिकल्पना करके इस प्रकार कहा—'अन्य लोग उसे भाक्त कहते हैं।' लोचनम् रातिरिक्तो नासौ कश्चित्। मुख्यार्थे ह्यभिधैवेति पारिशेष्यादमुख्य एव ध्वनिः, तृतीयराश्यभावात् । ननु केनैतदुक्तं ध्वनिर्गुणवृत्तिरित्याशङ्क्याह—यद्यपि चेति । अन्यो वेति । गुणालङ्कारप्रकार इति यावत् । दर्शयतेति । भट्टोद्भटवामनादिना । भामहेनोक्तं— 'शब्दाश्छन्दोऽभिधानार्थाः' इति अभिधानस्य शब्दाद् भेदं व्याख्यातुं भट्टोद्भटो बभाषे—'शब्दानामभिधानमभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च' इति । वामनोऽपि 'सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः' इति । मनाक्स्पृष्ट इति । तैस्तावद् ध्वनिदिगुन्मीलिता, यथालिखितपाठकैस्तु स्वरूपविवेकं कर्तुमशक्नुवद्भिस्तत्स्वरूपविवेको न कृतः- प्रत्युतोपालभ्यते, अभ्रमन्नारिकेलवद् यथाश्रुततद्ग्रन्थोद्ग्रहणमात्रेणेति । अत एवाह—परिकल्प्यैवमुक्तमिति । यद्येवं न योज्यते तदा ध्वनिमार्गः स्पृष्ट इति पूर्वपक्षाभिधानं विरुध्यते । केवल बच जाने से (पारिशेष्यात्) अमुख्य ही ध्वनि है, क्योंकि (मुख्य और अमुख्य इन दोनों के अतिरिक्त) तीसरी राशि का सर्वथा अभाव¹ है । यह शङ्का करके कि किसने 'ध्वनि' को 'गुणवृत्ति' कहा है, कहते हैं—यद्यपि—। दूसरे किसी अन्य प्रकार—। गुण या अलङ्कार का कोई प्रकार । दर्शाते हुए—। भट्ट उद्भट और वामन आदि ने । भामह ने कहा है—'शब्दाश्छन्दोऽभिधानार्थाः० ।' यहाँ अभिधान का शब्द से भेद व्याख्यान करते हुए उद्भट ने कहा है—'शब्दों का अभिधान अभिधा व्यापार मुख्य और गुणवृत्ति है ।' वामन ने भी कहा है—'सादृश्य से जो लक्षणा होती है वह 'वक्रोक्ति' कहलाती है । थोड़ा स्पर्श करके—। उन काव्य- लक्षणकारों ने ध्वनि की दिशा का उन्मीलन किया है । जैसा जो लिख दिया गया है उसे ही पढ़ लेने वाले, अतः स्वरूप का विवेक करने में असमर्थ उन्होंने स्वरूप का विवेक १. 'भाक्त' शब्द का व्याख्यान वृत्ति ग्रन्थ में 'गुणवृत्ति' शब्द से किया गया है । 'गुणवृत्ति' शब्द भी 'ध्वनि' शब्द की भाँति शब्द, अर्थ एवं व्यापार इन तीनों में इस प्रकार सङ्गत हो