ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
प्रथम उद्योतः २९ ध्वन्यालोकः यस्मिन्नस्ति न वस्तु किञ्चन मनः प्रह्लादि सालंकृति व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैर्वक्रोक्तिशून्यं च यत् । काव्यं तद्ध्वनिना समन्वितमिति प्रीत्या प्रशंसञ्जडो नो विद्मोऽभिदधाति किं सुमतिना पृष्टः स्वरूपं ध्वनेः ॥ भाक्तमाहुस्तमन्ये । अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्यात्मानं गुण- वृत्तिरित्याहुः । जिसमें अलङ्कारयुक्त, मन को आह्लादित करने वाला कोई अर्थ (वस्तु) नहीं है, जिसे व्युत्पन्न वचनों से नहीं रचा गया है और जो वक्रोक्ति से शून्य है, उस काव्य की 'ध्वनि से समन्वित' यह (मानकर) प्रेम से प्रशंसा करता हुआ जड़ (मूर्ख ध्वनिवादी) सुमति जन द्वारा ध्वनि का स्वरूप पूछे जाने पर, क्या कहता है, हम नहीं जानते । अन्य लोग उसे 'भाक्त' कहते हैं; अन्य लोग उस 'ध्वनि' नामक काव्यात्मा को 'गुणवृत्ति' कहते हैं । लोचनम् न व्यतिरिक्तः, यतश्च व्यतिरिक्तत्वे न शोभाहेतुः, यतश्च शोभाहेतुत्वेऽपि नादरास्पदं तस्मादित्यर्थः । न चेयमभावसम्भावना निर्मूलैव दूषितेत्याह— तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना । यतो न सालङ्कृति, अतो न मनःप्रह्लादि । अनेनार्थालङ्काराणामभाव उक्तः । व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैरिति शब्दालङ्काराणाम् । वक्रोक्तिः उत्कृष्टा संघटना, तच्छून्यमिति शब्दार्थगुणानाम् । वक्रोक्तिशून्यशब्देन सामान्यलक्षणाभावेन क्योंकि (यदि ध्वनि) शोभा का हेतु है (तो) गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त नहीं है, और क्योंकि (यदि) वह गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है तो वह शोभा का हेतु नहीं है, और क्योंकि (यदि वह शोभा का हेतु है (तो भी) आदरास्पद नहीं है, इस कारण । यह नहीं कि बिना किसी मूल के (यहाँ) अभाव की सम्भावना है, कहते हैं—जैसा कि दूसरे ने—। अर्थात् ग्रन्थकार के समसामयिक 'मनोरथ' नाम के कवि ने । क्योंकि (वह) अलङ्कारयुक्त नहीं, अतः (वह) मन को आह्लादित करने वाला नहीं है, इससे अर्थालङ्कारों का अभाव कहा है। और व्युत्पन्न वचनों द्वारा रचित भी नहीं—इससे शब्दालङ्कारों का (अभाव कहा है) । वक्रोक्ति अर्थात् उत्कृष्ट सङ्घटना, उससे शून्य—इससे शब्द और अर्थ के गुणों का (अभाव कहा है)। कुछ लोग कहते हैं कि 'वक्रोक्तिशून्य' शब्द से (अलङ्कारों के इस 'वक्रोक्ति' रूप) १. मनोरथ कवि—लोचनकार ने वृत्ति ग्रन्थ में उद्धृत अभाववाद के अनुकूल श्लोक को किसी 'मनोरथ' कवि, जो ग्रन्थकार का समसामयिक था, का कहा है । 'मनोरथ' के नाम से न
३० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सर्वलङ्काराभाव उक्त इति केचित् । तैः पुनरुक्तत्वं न परिहृतमेवेत्यलम् । प्रीत्येति । गतानुगतिकानुरागेणेत्यर्थः । सुमतिनेति । जडेन पृष्टो भ्रूभङ्गकटा- क्षादिभिरेवोत्तरं ददत्तत्स्वरूपं काममाचक्षीतेति भावः । एवमेतेऽभावविकल्पाः शृङ्खलाक्रमेणागताः, न त्वन्योन्यासम्बद्धा एव । तथा हि तृतीयाभावप्रकारनिरूपणोपक्रमे पुनःशब्दस्यायमेवाभिप्रायः, उपसं- हारैक्यं च सङ्गच्छते । अभाववादस्य सम्भावनाप्राणत्वेन भूतत्वमुक्तम् । भाक्तवादस्त्वविच्छिन्नः पुस्तकेष्वित्यभिप्रायेण भाक्तमाहुरिति । नित्यप्रवृत्तवर्त- मानापेक्षयाभिधानम् । भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति सामान्य लक्षण के न होने के कारण समस्त अलङ्कारों का अभाव कहा है । उन (व्याख्याकारों ने) पुनरुक्ति का परिहार नहीं किया है, अतः (उनका कथन) ठीक नहीं। बड़े प्रेम से—। अर्थात् गतानुगतिक (लकीर के फकीर होने के प्रति) अनुराग के कारण । सुलझी बुद्धि वालों द्वारा—। अगर कोई मूर्ख उनसे प्रश्न करता तो वे भौं हिला कर और आंख मटका कर ही उस (ध्वनि) के स्वरूप को पूरा कह डालते— यह मतलब है । इस प्रकार ये अभाव-वाद के विकल्प शृङ्खला के क्रम से प्राप्त हैं, न कि परस्पर असम्बद्ध¹ हैं, जैसा कि तीसरे अभाव-प्रकार के निरूपण के उपक्रम में 'पुनः' (फिर) शब्द का यही अभिप्राय है, और उपसंहार का एकत्व (साधारण्य) भी संगत होता है । अभाववाद के सम्भावना पर आधारित होने के कारण (उसमें) भूतकाल का प्रयोग किया है। किन्तु भाक्तवाद पुस्तकों में अविच्छिन्न रूप से चला आ रहा है, इस अभिप्राय से 'भाक्तमाहुः'² ('भाक्त' कहते हैं) यह नित्य-प्रवृत्त वर्तमान की अपेक्षा से अभिधान है । भज्यते = सेव्यते, अर्थात् प्रसिद्ध होने के कारण उत्प्रेक्षित होता है जो कोई ग्रन्थ का पता चलता है और न कोई सङ्केत ही मिलता है । 'राजतरङ्गिणी' में कश्मीर के राजा जयापीड (अष्टम शताब्दी) के सभापण्डितों में 'मनोरथ' का उल्लेख है । और मनोरथ के कुछ श्लोकों को आचार्य क्षेमेन्द्र ने 'औचित्य-विचार-चर्चा' में उद्धृत किया है । सम्भव है तीनों 'मनोरथ' किसी एक 'कवि' से सम्बद्ध हों । १. अभाववाद के उपर्युक्त तीन विकल्प परस्पर असम्बद्ध नहीं, बल्कि एक शृङ्खलित रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, इसी लिए सभी अभाववादियों के मतों का साधारण उपसंहार करते हुए वृत्तिग्रन्थ में आचार्य लिखते हैं—'इसलिए ध्वनि प्रवादमात्र है।' इस प्रकार तीनों विकल्पों की परस्पर सम्बद्धता का संकेत तृतीय अभाव-विकल्प के आरम्भ में 'पुनः' शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से देता है । २. अभाववाद चूंकि सम्भावना पर आधारित था इस लिए ग्रन्थकार ने 'जगदुः' यह भूतार्थक प्रयोग किया था किन्तु प्रस्तुत भाक्तवाद अलङ्कार-शास्त्र के ग्रन्थों में अविच्छिन्न रूप से स्मरण किया गया है इसलिए उसके लिए 'आहुः' इस नित्यप्रवृत्त वर्तमान के अर्थ में आचार्य ने प्रयोग किया है। भाक्तवाद को प्राचीनों ने विशेष रूप से 'गुणवृत्ति' शब्द से अभिहित किया है, जो
प्रथम उद्योतः ३१ लोचनम् भक्तिर्धर्मोऽभिधेयेन सामीप्यादिः, तत आगतो भाक्तो लाक्षणिकोऽर्थः । यदाहुः— अभिधेयेन सामीप्यात्सारूप्यात्समवायतः । वैपरीत्यात्क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इति ॥ गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः, तत आगतो गौणोऽर्थो भाक्तः । भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः, तां प्रयोजनत्वेनो- द्दिश्य तत आगतो भाक्त इति गौणो लाक्षणिकश्च । मुख्यस्य चार्थस्य भङ्गो भक्तिरित्येवं मुख्यार्थबाधा, निमित्तं, प्रयोजनमिति त्रयसद्भाव उपचारबीज- वह 'भक्ति' है; अभिधेय के द्वारा (तटादि का) सामीप्यादि धर्म (उत्प्रेक्षित होता है), उस (सामीप्यादि निमित्त) से आगत (प्रतीत) लाक्षणिक अर्थ (लक्ष्य अर्थ) 'भाक्त' है। जैसा कि कहते हैं— 'अभिधेय के द्वारा सामीप्य, सारूप्य, समवाय, वैपरीत्य और क्रियायोग रूप सम्बन्ध से लक्षणा पांच प्रकार की मानी गई है।' गुणों के समुदाय में वृत्ति वाले शब्द का अर्थांश तैक्ष्ण्यादि ('सिंहो माणवकः' इस स्थल में) 'भक्ति' है उससे आगत (प्रतीत) गौण अर्थ 'भाक्त' है [सामीप्य] और तैक्ष्ण्य आदि प्रतिपाद्य अर्थ में श्रद्धातिशय 'भक्ति' है। उस (श्रद्धातिशय रूप भक्ति) को प्रयोजन के रूप में उद्देश्य करके उससे आगत 'भाक्त' है, इस प्रकार (भाक्त) गौण और लाक्षणिक है। मुख्य अर्थ का भङ्ग 'भक्ति' है। इस प्रकार मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन इन तीनों का सद्भाव उपचार का बीज' है, यह बात 'लक्षणा' ही है। प्राचीनों में विवरणकार उद्भट लिखते हैं—'शब्दानामभिधानं अभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च।' आचार्य वामन लिखते हैं—'सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः।' इस प्रकार आचार्य ने नित्य प्रवृत्त वर्तमान के अर्थ को सूचित करने वाला 'आहुः' इस लट् लकार का सार्थक प्रयोग किया है। १. 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ—यहाँ 'भक्ति' शब्द से आलंकारिकों की 'लक्षणा' (शुद्धा और गौणी) दोनों ग्राह्य हैं। जिस 'लक्षणा' को आलंकारिकों ने सादृश्येतर सम्बन्ध से शुद्धा और सादृश्य सम्बन्ध से गौणी माना है उसमें मीमांसकों ने केवल 'गौणी' को लक्षणा से भिन्न वृत्ति स्वीकार किया है। मीमांसक लोग 'गौणी' को एक अलग वृत्ति ही मानते हैं जो 'लक्षणा' से अतिरिक्त है। इस लिए 'भक्ति' शब्द से दोनों लक्षणा और गौणी (अर्थात् शुद्धा लक्षणा और गौणी) दोनों अभिहित होते हैं। लक्षणा या गौणी के लिए एक दूसरा शास्त्रीय शब्द 'उपचार' भी प्रसिद्ध है। जब कि उपचार 'लक्षणा' के ये तीन बीज-मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन—जहाँ होंगे वहीं लक्षणा होगी, और प्रस्तुत 'भक्ति' भी चूंकि 'लक्षणा' ही है तो सामान्यतः 'भक्ति' शब्द भी 'लक्षणा' के उक्त बीजों में संगत होना चाहिए, इस अभिप्राय से लोचनकार ने 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ लक्षणा-बीज के अनुकूल की हैं। (क) 'निमित्त' परक व्युत्पत्ति—भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति भक्तिः । (ख) 'प्रयोजन' परक व्युत्पत्ति—भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः ।
३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मित्युक्तं भवति । काव्यात्मानं गुणवृत्तिरिति । सामानाधिकरण्यस्यायं भावः— यद्यप्यविवक्षितवाच्ये ध्वनिभेदे 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादावुपचारोऽस्ति, कही गई। काव्यात्मा (ध्वनि) को 'गुणवृत्ति' (कहते हैं) - । सामानाधिकरण्य¹ का भाव यह है—यद्यपि 'अविवक्षितवाच्य' नामक ध्वनि के एक भेद 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' (ग) 'मुख्यार्थबाध' परक व्युत्पत्ति—मुख्यार्थस्य भङ्गो भक्तिः। इन तीनों की हिन्दी 'लोचन' के प्रस्तुत हिन्दी-अनुवाद में अक्षरशः कर दी गई है। साथ ही लोचनकार ने मीमांसकों के अनुसार अलग से 'गौणी' के लिए भी 'भक्ति' की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है— गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः । इस प्रकार 'भक्ति' शब्द से 'लक्षणा' और 'गौणी' दोनों वृत्तियाँ ग्राह्य हैं। और, 'तत आगतः' इस पाणिनीय नियम के अनुसार इस प्रकार की लक्षणारूप या गौणीरूप 'भक्ति' से प्रतीत होने वाला लाक्षणिक या गौण अर्थ प्रस्तुत में 'भाक्त' कहा गया है। यही है 'भाक्तमाहुस्तमन्ये', अर्थात् अन्य लोग उस ध्वनि को भाक्त अर्थात् लाक्षणिक या गौण अर्थ कहते हैं। शुद्ध लक्षणा का प्रचलित उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है तथा 'गौणी' का प्रसिद्ध उदाहरण है 'अग्निर्मााणवकः'। कहा जा चुका है 'उपचार' वहीं होता है जहाँ उपर्युक्त 'बीज' हों। गङ्गा में घोष इसलिए सम्भव नहीं कि गङ्गा एक जल का प्रवाह है, नदी है, इसलिए प्रवाह में घोष (गाँव या बथान) नहीं रह सकता, यह मुख्यार्थ की बाधा है। चूंकि गङ्गा के समीप गङ्गा का तट है और उस पर घोष रह सकता है इसलिए 'गङ्गा' का सामीप्यरूप निमित्त से तट अर्थ ग्रहण किया गया इस 'तट' रूप अर्थ के ग्रहण से वक्ता के 'प्रयोजन' रूप शैत्य और पावनत्व की सिद्धि होती है अर्थात् 'गङ्गायां घोषः' इसके वक्ता का प्रयोजन यह प्रतीत होता है कि गङ्गा के बिलकुल किनारे घोष है जिससे गङ्गा के सभी शैत्य, पावनत्व आदि गुण 'तट' में ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यहाँ लाक्षणिक या लक्ष्य अर्थ 'तट' माना गया। यही स्थिति 'गौणी' में भी होती है। उदाहरण है—'अग्निर्मााणवकः' अर्थात् बालक अग्नि है। यहाँ मुख्यार्थबाध होता है कि बालक अग्नि कैसे है ? तब 'गौणी' द्वारा 'तीक्ष्णतारूप गुण' 'अग्नि' के अर्थभाग के रूप में माना गया (यहाँ यह स्वीकार करना पड़ता है कि अग्नि का गुणरूप अर्थ 'आक्षेप' से नहीं बल्कि 'गौणी' शक्ति से प्रतीत होता है। यहाँ 'तैक्ष्ण्य' रूप गुण 'प्रयोजन' है, जिसकी सिद्धि के लिए 'अग्नि' यह प्रयोग किया गया है। साहित्य-शास्त्र में प्रसिद्ध 'मुखं चन्द्रः' यह रूपक अलङ्कार का उदाहरण भी इस 'गौणी' का ही विषय है। ऊपर कहा जा चुका है कि यह मीमांसकों के अनुसार ही भिन्न वृत्ति है, अन्यथा इसे 'लक्षणा' का ही एक भेद साहित्य में माना गया है। [ ] इस चिह्न से अङ्कित 'सामीप्य' शब्द 'लोचन' के विचारकों के अनुसार 'प्रामाणिक' पाठ है। यह लेखक-प्रमाद के कारण सर्वत्र मुद्रित मिलता है। पण्डितों का कहना है कि 'सामीप्य' लक्षणा के प्रसिद्ध स्थल 'गङ्गायां घोषः' में किसी प्रकार 'प्रतिपाद्य' या प्रयोजन नहीं हो सकता। क्योंकि उपर्युक्त कारिका को उद्धृत करते हुए लोचनकार ने स्वयं 'सामीप्य' आदि को 'निमित्त' ही माना है। कुछ लोगों ने इस 'सामीप्य' को भी 'पावनत्व' के अर्थ में घसीटने का प्रयत्न किया है जो अस्वाभाविक लगता है। इसके साथ का दूसरा प्रयोग 'तैक्ष्ण्य' गौणी के उदाहरण 'अग्निर्मााणवकः' का प्रयोजन बन जाता है, अतः ठीक है। १. 'भाक्तमाहुस्तमन्ये' इस मूल ग्रन्थ का व्याख्यान वृत्तिग्रन्थ में 'अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्या-
: प्रथम उद्योतः ३३ लोचनम् तथापि न तदात्मैव ध्वनिः, तद्व्यतिरेकेणापि भावात्, विवक्षितान्यपरवाच्य- प्रभेदादौ । अविवक्षितवाच्येऽप्युपचार एव न ध्वनिरिति वक्ष्यामः । तथा च वक्ष्यति— भक्त्या बिभर्ति नैकत्वं रूपभेदादयं ध्वनिः । अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तथा ॥ इति ॥ कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । इति च । गुणाः सामीप्यादयो धर्मास्तैक्ष्ण्यादयश्च । तैरुपायैर्वृत्तिरर्थान्तरे यस्य; तैरुपायैर्वृत्तिर्वा शब्दस्य यत्र स गुणवृत्तिः शब्दोऽर्थो वा । गुणद्वारेण वा वर्तनं गुणवृत्तिरमुख्योऽभिधाव्यापारः । एतदुक्तं भवति—ध्वनतीति वा, ध्वन्यत इति वा, ध्वननमिति वा यदि ध्वनिः, तथाप्युपचरितशब्दार्थव्यापा- इत्यादि स्थल में 'उपचार' है, तथापि ध्वनि उपचारात्मा ही नहीं है, क्योंकि उपचार के अभाव में भी ( ध्वनि ) होता है । और विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि के प्रभेद आदि में । अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी उपचार ही होता है ध्वनि नहीं, यह हम कहेंगे । और उस प्रकार ( मूलकार ) कहेंगे— 'यह ध्वनि रूपभेद के कारण भक्ति के साथ एकत्व प्राप्त नहीं करता । अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण उस प्रकार यह लक्षित नहीं होता । हां, ध्वनि के किसी भेद का वह ( भक्ति ) उपलक्षण हो सकती है ।' सामीप्यादि धर्म और तैक्ष्ण्यादि धर्म गुण हैं । उन निमित्त रूप उपायों द्वारा अर्थान्तर में जिसकी वृत्ति हो, अथवा उन उपायों द्वारा वृत्ति हो, शब्द की जहाँ, वह 'गुणवृत्ति' शब्द अथवा अर्थ है । गुण के द्वारा वर्तन गुणवृत्ति, अमुख्य अभिधा व्यापार है । यह बात कही गई—यदि ध्वनन करता है ( ध्वनतीति ), अथवा ध्वनित होता है ( ध्वन्यत इति ), अथवा ध्वनन, यह ध्वनि है तथापि उपचरित शब्द, अर्थ और व्यापार के अतिरिक्त वह कुछ नहीं है । मुख्यार्थ में तो अभिधा ही होती है और अन्त में त्मानं गुणवृत्तिरित्याहुः' इन शब्दों में किया गया है । यहाँ प्रश्न उठता है कि 'ध्वनि' और गुण- वृत्ति दोनों का सामानाधिकरण्य बताया गया है । इसका यह तात्पर्य समझना चाहिए कि जहाँ गुणवृत्ति होती है वहाँ ध्वनि होता है, इसका यह तात्पर्य नहीं कि गुणवृत्ति रूप ही ध्वनि है अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति है वहाँ ध्वनि है । प्रस्तुत ग्रन्थ में आगे चल कर ध्वनि के दो भेद बताये गये हैं—अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य । अविवक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण दिया गया है—'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि । यहाँ तो उपचार या गुणवृत्ति है, अर्थात् यहाँ ध्वनि के साथ गुणवृत्ति का सामानाधिकरण्य ( एक ही अधिकरण में उपस्थिति ) बन जाता है किन्तु इस सामानाधिकरण्य का यह अर्थ नहीं कि ध्वनि को कोई उपचारात्मा ही कह डाले । कारण कि ध्वनि वहाँ भी होता है जहाँ उपचार बिलकुल नहीं होता, जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के प्रभेद आदि में । इस प्रकार ध्वनि का गुणवृत्ति के साथ सामानाधिकरण्य तो बन सकता है तादात्म्य या एकरूपता नहीं बन सकती । इसी बात को 'भक्त्या बिभर्ति०' इत्यादि कारिका ग्रन्थ से भी निर्देश किया है । यह विषय आगे और भी स्पष्ट होगा । ३ ध्व०
३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यपि च ध्वनिशब्दसंकीर्तनेन काव्यलक्षणविधायिभिर्गुणवृत्ति- रन्यो वा न कश्चित्प्रकारः प्रकाशितः, तथापि अमुख्यवृत्त्या काव्येषु व्यवहारं दर्शयता ध्वनिमार्गो मनाक्स्पृष्टोऽपि न लक्षित इति परि- कल्प्यैवमुक्तम्—'भाक्तमाहुस्तमन्ये' इति । यद्यपि 'ध्वनि' शब्द का उल्लेख करके काव्य के लक्षण बनाने वालों ने गुणवृत्ति अथवा दूसरे किसी अन्य प्रकार को प्रकाशित नहीं किया है, तथापि अमुख्य वृत्ति (व्यापार) के द्वारा काव्य से व्यवहार दिखाते हुए (प्राचीन ने) ध्वनि-मार्ग को थोड़ा स्पर्श करके भी लक्षित नहीं किया है, ऐसी परिकल्पना करके इस प्रकार कहा—'अन्य लोग उसे भाक्त कहते हैं।' लोचनम् रातिरिक्तो नासौ कश्चित्। मुख्यार्थे ह्यभिधैवेति पारिशेष्यादमुख्य एव ध्वनिः, तृतीयराश्यभावात् । ननु केनैतदुक्तं ध्वनिर्गुणवृत्तिरित्याशङ्क्याह—यद्यपि चेति । अन्यो वेति । गुणालङ्कारप्रकार इति यावत् । दर्शयतेति । भट्टोद्भटवामनादिना । भामहेनोक्तं— 'शब्दाश्छन्दोऽभिधानार्थाः' इति अभिधानस्य शब्दाद् भेदं व्याख्यातुं भट्टोद्भटो बभाषे—'शब्दानामभिधानमभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च' इति । वामनोऽपि 'सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः' इति । मनाक्स्पृष्ट इति । तैस्तावद् ध्वनिदिगुन्मीलिता, यथालिखितपाठकैस्तु स्वरूपविवेकं कर्तुमशक्नुवद्भिस्तत्स्वरूपविवेको न कृतः- प्रत्युतोपालभ्यते, अभ्रमन्नारिकेलवद् यथाश्रुततद्ग्रन्थोद्ग्रहणमात्रेणेति । अत एवाह—परिकल्प्यैवमुक्तमिति । यद्येवं न योज्यते तदा ध्वनिमार्गः स्पृष्ट इति पूर्वपक्षाभिधानं विरुध्यते । केवल बच जाने से (पारिशेष्यात्) अमुख्य ही ध्वनि है, क्योंकि (मुख्य और अमुख्य इन दोनों के अतिरिक्त) तीसरी राशि का सर्वथा अभाव¹ है । यह शङ्का करके कि किसने 'ध्वनि' को 'गुणवृत्ति' कहा है, कहते हैं—यद्यपि—। दूसरे किसी अन्य प्रकार—। गुण या अलङ्कार का कोई प्रकार । दर्शाते हुए—। भट्ट उद्भट और वामन आदि ने । भामह ने कहा है—'शब्दाश्छन्दोऽभिधानार्थाः० ।' यहाँ अभिधान का शब्द से भेद व्याख्यान करते हुए उद्भट ने कहा है—'शब्दों का अभिधान अभिधा व्यापार मुख्य और गुणवृत्ति है ।' वामन ने भी कहा है—'सादृश्य से जो लक्षणा होती है वह 'वक्रोक्ति' कहलाती है । थोड़ा स्पर्श करके—। उन काव्य- लक्षणकारों ने ध्वनि की दिशा का उन्मीलन किया है । जैसा जो लिख दिया गया है उसे ही पढ़ लेने वाले, अतः स्वरूप का विवेक करने में असमर्थ उन्होंने स्वरूप का विवेक १. 'भाक्त' शब्द का व्याख्यान वृत्ति ग्रन्थ में 'गुणवृत्ति' शब्द से किया गया है । 'गुणवृत्ति' शब्द भी 'ध्वनि' शब्द की भाँति शब्द, अर्थ एवं व्यापार इन तीनों में इस प्रकार सङ्गत हो
प्रथम उद्योतः ३५ ध्वन्यालोकः केचित्पुनर्लक्षणकरणशालीनबुद्धयो ध्वनेस्तत्त्वं गिरामगोचरं सहृदयहृदयसंवेद्यमेव समाख्यातवन्तः । तेनैवंविधासु विमतिषु स्थितासु सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपं ब्रूमः । फिर लक्षण बनाने में शालीनबुद्धि कुछ लोगों ने ध्वनि के तत्त्व को वाणी से परे, केवल सहृदय जनों के हृदय द्वारा संवेद्य, समाख्यान किया है। इस कारण, इस प्रकार की विमतियों के होने पर सहृदय जनों के मन की प्रसन्नता के लिए हम उस ( ध्वनि ) का स्वरूप कहते हैं। लोचनम् शालीनबुद्धय इति । अप्रगल्भमतय इत्यर्थः । एते च त्रय उत्तरोत्तरं भव्यबुद्धयः । प्राच्या हि विपर्यस्ता एव सर्वथा । मध्यमास्तु तद्रूपं जानाना अपि सन्देहेनापह्नुवते । अन्त्यास्त्वनपह्नुवाना अपि लक्षयितुं न जानत इति नहीं किया, प्रत्युत उपालम्भ ही करने लगे। नहीं भग्न हुए नारियल की भाँति जैसा सुना वैसा ही उस ग्रन्थ का उद्ग्रहण (धारण) मात्र कर लिया। अत एव कहते हैं— परिकल्पना १ करके इस प्रकार कहा है—। यदि इस प्रकार ग्रन्थार्थ की योजना नहीं करते हैं तो 'ध्वनि-मार्ग को स्पर्श करके' यह पूर्वपक्ष का कथन विरुद्ध हो जाता। शालीनबुद्धि—। अर्थात् अप्रगल्भमति । ये तीनों (विप्रतिपत्तिकार उत्तरोत्तर भव्यबुद्धि हैं। क्योंकि पहले वाले (अभाववादी) सर्वथा विपर्यय में पड़ गए हैं। मझले (भाक्तवादी) उस (ध्वनि) का स्वरूप जानते हुए भी सन्देह के कारण छिपा देते हैं। और अन्त वाले नहीं छिपाते हुए भी (ध्वनि को) लक्षित करना नहीं जानते हैं। इस क्रम से इन (विप्रतिपत्तिकारों) का विपर्यास, सन्देह और अज्ञान का प्राधान्य है। जाता है। 'गङ्गायां घोषः' आदि स्थल में सामीप्य आदि धर्म 'गुण' है, उन्हीं गुण रूप उपायों से जिस 'गङ्गा' आदि शब्द की अर्थान्तर 'तीर' आदि में वृत्ति हो, यह 'गुणवृत्ति' का शब्दपरक समास है। उन्हीं उपायों से तीरादि अर्थ में जिस शब्द की वृत्ति हो, यह उसका अर्थपरक समास है और 'गुण द्वारा वर्तन गुणवृत्ति है, यह अमुख्य अभिधा व्यापार-परक समास है। 'ध्वनति', 'ध्वन्यते', 'ध्वननम्' इस रूप में 'ध्वनि' शब्द भी शब्द, अर्थ और व्यापार इन तीनों में सङ्गत होता है। इस प्रकार भाक्तवादी के कहने का तात्पर्य है कि 'ध्वनि' तत्त्व उपचरित शब्द, अर्थ और व्यापार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। उनका दृढ़ पक्ष यह है कि किसी भी शब्द के दो ही अर्थ हो सकते हैं मुख्य या अमुख्य। जब मुख्य अर्थ में अभिधा को व्यापार स्वीकार किया गया, तब अमुख्य अर्थ ही शेष रहा, ऐसी स्थिति में ध्वनि 'भाक्त' ही सिद्ध होता है। क्योंकि अर्थ की कोई तृतीय राशि मुख्य और अमुख्य के अतिरिक्त सम्भव नहीं। १. जैसा कि वृत्तिग्रन्थ में आचार्य ने जो कहा है कि प्राचीन आचार्यों ने काव्यों में अमुख्य व्यवहार का संकेत किया है उसका स्पष्टीकरण 'लोचन' में आचार्य अभिनवगुप्त ने भामह, भट्टोद्भट एवं वामन की उक्तियों को उद्धृत करके किया है। भामह और भट्ट उद्भट ने मुख्य के अतिरिक्त गुणवृत्ति व्यापार को और वामन ने सादृश्य से लक्षणा को 'वक्रोक्ति' के रूप में स्वीकार किया है।
३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् क्रमेण विपर्याससन्देहाज्ञानप्राधान्यमेतेषाम्। तेनेति। एकैकोऽप्ययं विप्रति- पत्तिरूपो वाक्यार्थो निरूपणे हेतुत्वं प्रतिपद्यत इत्येकवचनम्। एवंविधासु विमतिष्विति निर्धारणे सप्तमी। आसु मध्ये एकोऽपि यो विमतिप्रकारस्तेनैव हेतुना तत्स्वरूपं ब्रूम इति, ध्वनिस्वरूपमभिधेयम्, अभिधानाभिधेयलक्षणो इस कारण—१ विप्रतिपत्तिरूप एक भी वाक्यार्थ (ध्वनि के) निरूपण में हेतु बन जाता है इसलिए 'एकवचन'१ का प्रयोग है। 'इस प्रकार की विमतियों में' यहाँ 'निर्धारण' में२ सप्तमी है। इन (विमतियों के) बीच में एक भी जो विमति का प्रकार है उसी हेतु से 'उस (ध्वनि) का स्वरूप हम कहते हैं'; (इस ग्रन्थ का) ३ध्वनि-स्वरूप अभिधेयं
इस प्रकार उन्होंने ध्वनि की दिशा का उन्मीलन तो कर ही दिया, क्योंकि जब 'गङ्गायां घोषः' इस स्थल में आचार्य भामह को स्वीकार हो चुका कि 'गङ्गा' का अमुख्य अर्थ 'तीर' है तब वे प्रयोजन रूप शैत्य-पावनत्व तक, जो ध्वनि का अपना पक्ष है, पहुँच ही चुके थे, प्रायः स्पर्श तो उन्होंने कर ही लिया था। ऐसी अनुकूल स्थिति में भी, कुछ लोगों ने, जिन्हें स्वरूपविवेक का सामर्थ्य न था, इस प्राचीन 'ध्वनि' को 'भाक्त' कहा और ऊपर से उपालम्भ देना भी शुरू कर दिया। हम ध्वनिवादी 'भाक्त' पक्ष को अस्वीकार कहाँ करते हैं। बल्कि हमारा कहना है कि भाक्तवादियों ने तो 'ध्वनि' को स्वीकार ही कर लिया, क्योंकि ध्वनि का एक भेद, जो अविवक्षित- वाच्य है वहाँ 'भक्ति' या लक्षणा, जिसे उपचार और गुणवृत्ति भी कहा है, बिल्कुल प्राप्त होती है। किन्तु इन बीच के लोगों ने वही स्थिति अपनाई जो किसी नारियल के न फोड़े जाने पर उसके सम्बन्ध में होती है। जिस प्रकार नारियल के फल को ऊपर से छील देने के बाद दूसरी स्थिति तक रह जाने से कोई लाभ नहीं, उसके बाद उसे फोड़ने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार ध्वनि-पक्ष के अनुकूल भाक्त-वाद को स्वीकार करने पर भी एक कदम और आगे बढ़ने की आवश्यकता रह जाती है। वही न करके भाक्तवादियों ने 'ध्वनि' का उपालम्भ शुरू कर दिया, अतः उन्हें ध्वनि-पक्ष के प्रतिकूलवादियों में स्थान मिला। लोचनकार का कहना है कि प्रस्तुत वृत्ति ग्रन्थ को कुछ इसी प्रकार लगाना चाहिए। १. एकवचन—वृत्तिग्रन्थ में तीनों ध्वनि की विप्रतिपत्तियों को उद्धृत करके ध्वनि के स्वरूप के प्रतिपादन में तीनों एक-एक करके हेतु हैं इस बात को सूचित करने के लिए आचार्य ने 'तेन' ('इस कारण') इस एकवचन का प्रयोग किया है, वस्तुतः बहुवचन प्रासङ्गिक था। ध्वनि का निरूपण केवल अनेक विप्रतिपत्तियों के निराकरण के लिए नहीं किया जा रहा है बल्कि प्रत्येक विप्रतिपत्ति इसके द्वारा निराकरणीय है। २. 'निर्धारण' में सप्तमी वहाँ होती हैं जहाँ बहुतों में से किसी एक को निर्धारित करना होता है। प्रस्तुत में अनेक विमतियों में कोई एक भी ध्वनिस्वरूप के निरूपण का हेतु है। ऐसी स्थिति में यहाँ पाणिनीय सूत्र 'यतश्च निर्धारणम्' (२. ३. ४१) के अनुसार निर्धारण में सप्तमी का विषय है, न कि 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' (पा. सू. २. ३. ३७) के अनुसार भावलक्षण में सप्तमी का, क्योंकि यहाँ क्रिया से क्रियान्तर के लक्षित होने का कोई प्रसङ्ग नहीं, इससे एक-एक विप्रतिपत्ति का निरूपणहेतुत्व सिद्ध नहीं होता। ३. यहाँ लोचनकार ने प्रस्तूयमान ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' के 'अनुबन्धचतुष्टय' का उल्लेख किया है। किसी भी ग्रन्थ के अध्ययन में श्रोता की प्रवृत्ति तभी हो सकती है जब वह अनुभव करे कि इस ग्रन्थ के अध्ययन से उसका इष्टसिद्ध होगा, अर्थात् उसे पहले विदित करना चाहिये कि ग्रन्थ के
: प्रथम उद्योतः ३७ ध्वन्यालोकः तस्य हि ध्वनेः स्वरूपं सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूतमतिरमणी- यमणीयसीभिरपि चिरन्तनकाव्यलक्षणविधायिनां बुद्धिभिरनुन्मीलित- पूर्वम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये सर्वत्र प्रसिद्ध- व्यवहारं लक्षयतां सहृदयानामानन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकाश्यते ॥ १ ॥ उस ध्वनि का स्वरूप जो सकल सत्कवियों के काव्यों का उपनिषद्भूत, अति- रमणीय है, जो प्राचीन लक्षणकारों की अणुपरिमाण (सूक्ष्मतम) बुद्धि द्वारा भी उन्मीलित नहीं हुआ है, और, जिसका रामायण, महाभारत प्रभृति लक्ष्य (ग्रन्थों) में व्यवहार प्रसिद्ध है, लक्षित करते हुए सहृदय जनों के मन में आनन्द प्रतिष्ठित हो इस उद्देश्य से उसे प्रकाशित करते हैं । लोचनम् ध्वनिशास्त्रयोर्वक्तृश्रोतृव्युत्पाद्यव्युत्पादकभावः सम्बन्धः, विमतिनिवृत्त्या तत्स्व- रूपज्ञानं प्रयोजनम्, शास्त्रप्रयोजनयोः साध्यसाधनभावस्सम्बन्ध इत्युक्तम् । अथ श्रोतृगतप्रयोजनप्रयोजनप्रतिपादकं 'सहृदयमनःप्रीतये' इति भागं व्याख्यातुमाह-तस्य हीति । विमतिपदपतितस्येत्यर्थः । ध्वनेः स्वरूपं लक्षयतां सम्बन्धिनि मनसि आनन्दो निर्वृत्यात्मा चमत्कारपरपर्यायः, प्रतिष्ठां परैर्विप- र्यासाद्युपहतैरनुन्मूल्यमानत्वेन स्थेमानं, लभतामिति प्रयोजनं सम्पादयितुं (विषय) है, ध्वनि और शास्त्र में अभिधानाभिधेय रूप सम्बन्ध और वक्ता एवं श्रोता में व्युत्पाद्यव्युत्पादकभाव रूप सम्बन्ध है, विमतियों की निवृत्ति सहित उस (ध्वनि) का स्वरूपज्ञान प्रयोजन है, शास्त्र और प्रयोजन का सम्बन्ध साध्यसाधनभाव रूप है, यह बात कही गई । अब श्रोतृगत प्रयोजन के प्रयोजन¹ का प्रतिपादन करने वाले 'सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिए' इस भाग के व्याख्यान के लिए कहते हैं-उस ध्वनि का-। अर्थात् विमति के मार्ग में पड़े हुए ध्वनि का स्वरूप लक्षित करते हुए के मन में आनन्द, जो निर्वृति रूप और दूसरे शब्द में 'चमत्कार' है, प्रतिष्ठा को, अर्थात् विपर्यास आदि (कमजोरियों) से उपहत दूसरे (अभाववादी आदि) द्वारा अनुन्मूलित होने के कारण स्थिरता को, प्राप्त करे, इस प्रयोजन के सम्पादन के लिए उस (ध्वनि) का स्वरूप विषय, सम्बन्ध, अधिकारी और प्रयोजन क्या हैं ? इन्हीं चारों को शास्त्रीय परिभाषा में 'अनु- बन्धचतुष्टय' कहा गया है। इसका निर्देश ग्रन्थारम्भ में भी किया जा चुका है। १. आरम्भ में भी कहा जा चुका है कि प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रयोजन ध्वनिस্বরূপ का ज्ञान है, किन्तु इस प्रयोजन का भी प्रयोजन है सहृदयजनों की मनःप्रीति । क्योंकि 'काव्य' के तत्त्वज्ञान के लिए ध्वन्यालोक का निर्माण अभीष्ट है और 'काव्य' का चरम लक्ष्य सहृदयजनों की मनःप्रीति
३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तत्स्वरूपं प्रकाश्यत इति सङ्गतिः। प्रयोजनं च नाम तत्सम्पादकवस्तुप्रयोक्तृता- प्राणतयैव तथा भवतीत्याशयेन 'प्रीतये तत्स्वरूपं ब्रूम' इत्येकवाक्यतया प्रकाशित करते हैं, यह सङ्गति है। और प्रयोजन, जो उस (प्रयोजन) के सम्पादक वस्तु की जो प्रयोक्तृता या प्रयोजकता रूप प्राण है जिसका, इस प्रकार का होता है,१ इस आशय से 'प्रीति के लिए उस (ध्वनि) का स्वरूप हम कहते हैं' इस प्रकार एक वाक्य रूप से व्याख्या करनी चाहिए (अथवा यह व्याख्या है)। 'उसका स्वरूप'२ इसकी ही है। यश आदि साधारण कोटि के प्रयोजन हैं। इसीलिए ध्वन्यालोक का भी मुख्यभूत प्रयोजन अर्थात् प्रयोजन का प्रयोजन 'सहृदयमनःप्रीति' ही सूचित की गई। १. ध्वनिस्वरूप के प्रस्तुत निरूपण के दो ही प्रयोजन हैं। एक तो 'ध्वनि' के सम्बन्ध में विमतियों का निराकरण और दूसरा सहृदयजनों की प्रीति। यदि 'प्रयोजन' शब्द का व्युत्पत्ति- लभ्य' अर्थ देखा जाय तो प्रयोजन वही होता है जो प्रेरणा करता है (प्रेरयतीति प्रयोजनम्) इस आधार पर यहाँ वस्तुतः प्रयोजन 'प्रीति' ही है, क्योंकि ध्वनिस्वरूप का निरूपण सहृदयजनों को प्रसन्न करने के लिए ही आचार्य विमतियों के निराकरणपूर्वक करने जा रहे हैं। इसी लिए लोचनकार स्पष्टरूप से 'प्रयोजन' शब्द का प्रतिपादन करते हैं कि प्रयोजन अपने सम्पादक वस्तु की प्रयोजकता से प्रयोजन कहलाता है, प्रस्तुत में ध्वनिस्वरूप का निरूपण प्रीतिरूप प्रयोजन का सम्पादक है। इस प्रकार एक वाक्यरूप से कि प्रीति के लिए 'उसके स्वरूप को हम कहते हैं' व्याख्या करनी चाहिए--(अथवा यदि 'व्याख्येयम्' को 'व्याख्या इयम्' मानें तो यहाँ कहना होगा कि इस प्रकार एकवाक्य रूप से यह व्याख्या है)। २. मूल कारिकाग्रन्थ के 'तत्स्वरूपम्' की व्याख्या वृत्ति-ग्रन्थ में अनेक विशेषणों से करते हुए आचार्य ने पूर्वनिर्दिष्ट पांचों विकल्पों के एक प्रकार से निराकरण का अभिप्राय सूचित किया है यह आचार्य अभिनव की सूक्ष्मेक्षिका है। इसे स्पष्टरूप से क्रमशः इस प्रकार समझना चाहिये— वक्ष्यमाण ध्वनिस्वरूप 'सकल सत्कवियों के काव्यों का उपनिषद्भूत है' अर्थात् ध्वनि सभी सत्कवियों के काव्यों का परम रहस्यभूत तत्त्व है, काव्यतत्त्वज्ञान से वञ्चित लोग उसे नहीं समझ सकते हैं। जैसा कि पहले अभाववादी के मत में कहा गया था कि वाग्विकल्पों के अनन्त होने के कारण प्रसिद्ध आलंकारिकों द्वारा किसी अप्रदर्शित प्रकारलेश को ही लेकर 'ध्वनि' कह दिया गया है, यह बात प्रस्तुत विशेषण के 'सकल' और 'सत्कवि' के प्रयोग से निराकृत हो जाती है। यह कोई ऐसा वाग्विकल्प नहीं जो अप्रदर्शित हो बल्कि यह तो सभी कवियों के काव्य में पाया जाता है, किन्तु इतना अवश्य है कि वह उपनिषद्भूत या परम रहस्य है उसे साधारण प्रतिभावाले नहीं समझ सकते हैं। दूसरे, इसे 'उपनिषद्भूत' कहने से 'अपूर्व समाख्या' (नया नामकरण) वाला जो दोष दिया गया था उसका निराकरण हो जाता है, क्योंकि जब यह सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है ऐसी स्थिति में इसका अपूर्व समाख्यामात्र होना सम्भव नहीं। इसे 'अतिरमणीय' कह कर 'भाक्त' से इसकी विलक्षणता कही गई है। क्योंकि 'गङ्गायां घोषः' आदि में कोई रमणी- यता नहीं है। 'अणुपरिमाण बुद्धि' के कहने से इस बात को सूचित किया कि ध्वनिस्वरूप साधारणबुद्धि-संवेद्य गुण तथा अलङ्कारों में अन्तर्हित नहीं हो सकता, वह तो ऐसा है कि उसे सूक्ष्म परिमाण बुद्धि से भी समझ पाना कठिन है। जो कि शङ्का कर चुके हैं, कुछ विद्वानों (सहृदयों) का दल बनाकर 'ध्वनि' को मान्यता दी जा सकती है, उसे चिरवकाश इस प्रकार प्रस्तुत में आचार्य ने किया है कि सर्वत्र रामायण-महाभारत-प्रभृति लक्ष्य में ध्वनिस्वरूप प्रसिद्ध व्यवहार है तथा आदिकवि से लेकर सभी सूरियों ने उसका आदर किया है। 'लक्षित करते हुए'
प्रथम उद्योतः ३९
लोचनम्
व्याख्येयम् । तत्स्वरूपशब्दं व्याचक्षाणः संक्षेपेण तावत्पूर्वोदीरितविकल्पपञ्च- कोद्धरणं सूचयति-सकलेत्यादिना । सकलशब्देन सत्कविशब्देन च प्रकारलेशे कस्मिंश्चिदिति निराकरोति । अतिरमणीयमिति भाक्ताद्व्यतिरेकमाह । न हि ‘सिंहो वटुः’ ‘गङ्गायां घोषः’ इत्यत्र रम्यता काचित् उपनिषद्भूतशब्देन तु अपूर्वसमाख्यामात्रकरण इत्यादि निराकृतम् । अणीयसीभिरित्यादिना गुणाल- ङ्कारानन्तर्भूतत्वं सूचयति । अथ चेत्यादिना ‘तत्समयान्तःपातिन’ इत्यादिना यत्सामयिकत्वं शङ्कितं तन्निरवकाशीकरोति । रामायणमहाभारतशब्देनादिकवेः प्रभृति सर्वैरेव सूरिभिरस्यादरः कृत इति दर्शयति । लक्ष्यतामित्यनेन वाचां स्थितमविषय इति परास्यति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् । लक्षणेन निरू- पयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः । सहृदयानामिति । येषां व्याख्या करते हुए, संक्षेप से, जो पहले पाँच विकल्प कहे जा चुके हैं, उनका निराकरण सूचित करते हैं—सकल इत्यादि द्वारा । ‘सकल’ शब्द द्वारा और ‘सत्कवि’ शब्द द्वारा ‘किसी प्रकार लेश में’ इसका निराकरण करते हैं । ‘अतिरमणीय’ इस विशेषण द्वारा ‘भाक्त’ से व्यतिरेक ( वैलक्षण्य ) कहा । क्योंकि ‘सिंहो वटुः’ और ‘गङ्गायां घोषः’ इस स्थल में कोई रम्यता नहीं है । ‘उपनिषद्भूत’ इस विशेषण शब्द द्वारा ‘अपूर्व समाख्या ( ध्वनि यह नया नाम ) मात्र करना’ इत्यादि का निराकरण किया है । अणुतर ( अणीयसी ) इत्यादि इस ( बुद्धि के विशेषण ) द्वारा ( ध्वनि का ) गुण और अलङ्कार में अन्तर्भाव का न होना सूचित करते हैं । ‘और भी’ इत्यादि से ‘उस समय के होने वाले’ इत्यादि द्वारा जो सामयिक होने की शङ्का की थी उसे निरवकाश करते हैं । ‘रामायण-महाभारत’ शब्द से यह दिखाते हैं कि आदिकवि से लेकर समस्त सूरियों ( विद्वानों ) ने इस ध्वनि का आदर किया है । ‘लक्षित करते हुए’ इससे ‘वचनों के अविषय में स्थित’ इसे निराकरण करते हैं । ‘लक्षित करते हैं इससे, अतः ‘लक्ष’ लक्षण है । लक्ष के द्वारा निरूपण करते हैं, लक्षित करते हैं, उनका अर्थात् लक्षण द्वारा निरूपण करते हुए का । सहृदयों का—। काव्यों के अनुशीलन के अभ्यासवश जिनके विशदीभूत मन के दर्पण में वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मय हो जाने की
कह कर आचार्य ने तीसरे अलक्षणीयतावादी के मत का निराकरण किया । इस प्रकार प्रायः सभी विप्रतिपत्तियाँ ‘ध्वनिस्वरूप’ के इन विशेषणों द्वारा निराकृत हो जाती हैं । १. ‘लक्ष्यताम्’ (‘लक्षित करते हुए’) इस शब्द का अर्थ करते हुए लोचनकार लिखते हैं— ‘लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् , लक्षणेन निरूपयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः ।’ यहाँ लोचनकार ने ‘करण’ में घञ् करके ‘लक्ष’ को ‘लक्षण’ के अर्थ में लिया है, किन्तु पाणिनीय शास्त्र के नियम के अनुसार ‘करण’ में ‘घञ्’ नहीं होता है क्योंकि ‘ल्युट्’ उसे बाध लेता है । फिर भी इसका साधारण समाधान यह है कि जब महाभाष्यकार ने स्वयं ‘करण’ में ‘घञ्’ बाहुलक के अनुसार मान लिया है । ऐसी स्थिति में यहाँ भी कोई विशेष त्रुटि नहीं कहीं जा सकती । किन्तु ‘दिव्याञ्जना’ में मेरे पूज्यपाद गुरु जी ( महादेव शास्त्री जी ) ने ‘लक्ष्यताम्’ इसका ही अर्थ ‘निरूप- यताम्’ करके अगतिकगति ‘बाहुलक’ पक्ष को सुधीजनों के विचारणीय बताया है ।
४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् काव्यानुशीलनाभ्यासवशाद्विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवनयोग्यता ते स्वहृदयसंवादभाजः सहृदयाः । यथोक्तम्— योऽर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भवः । शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना ॥ इति ॥ आनन्द इति । रसचर्वणात्मनः प्राधान्यं दर्शयन् रसध्वनेरेव सर्वत्र मुख्य- भूतमात्मत्वमिति दर्शयति । तेन यदुक्तम्— ध्वनिनीमापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः । तस्य सिद्धेऽपि भेदे स्यात्काव्येऽशत्वं न रूपता ॥ इति तदपहस्तितं भवति । तथा ह्यभिधाभावनारसचर्वणात्मकेऽपि त्र्यंशे काव्ये रसचर्वणा तावज्जीवितभूतेति भवतोऽप्यविवादोऽस्ति । यथोक्तं त्वयैव— काव्ये रसयिता सर्वो न बोद्धा न नियोगभाक् । इति । तद्वस्त्वलङ्कारध्वन्यभिप्रायेणांशमात्रत्वमिति सिद्धसाधनम् । रसध्वन्यभि- योग्यता हो वे, अपने हृदय के साथ संवाद¹ को भजन करने वाले जन 'सहृदय' हैं। जैसा कि कहा है— 'जो अर्थ (विभावादि रूप वस्तु) हृदय के साथ संवाद रखने वाला होता है उसका भाव (भावना) रस की अभिव्यक्ति का कारण होता है। वह (सहृदय के) शरीर को उस प्रकार व्याप्त कर लेता है जिस प्रकार सूखे काठ को अग्नि।' आनन्द—। रसचर्वणा रूप प्राधान्य को दिखाते हुए, 'रसध्वनि' का ही सर्वत्र मुख्य रूप से आत्मत्व है—यह दिखाते हैं। इसलिए जो कि कहा है— 'ध्वनि नाम का जो भी अन्य व्यञ्जनात्मक व्यापार है उसका (अभिधा और भावना से) भेद सिद्ध होने पर भी उसका काव्य में अंशत्व होगा, रूपता नहीं।' वह निराकृत हो जाता है, क्योंकि अभिधा, भावना और रसचर्वणा रूप तीन अंश वाले काव्य में रसचर्वणा प्राणभूत है, यह आपके मत में भी निर्विवाद है। जैसा कि तुमने ही कहा है— 'काव्य में रस लेने वाले सब हो जाते हैं, पर जानने वाला नहीं होता और आज्ञा- पालन करने वाला (नियोगभाक्) नहीं होता।' वस्तु-ध्वनि और अलङ्कार-ध्वनि के अभिप्राय से (उसका) अंशमात्रत्व² है तो -- १. काव्य को पढ़ते हुए वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मयता होने पर ही 'आनन्द' स्थिति आती ', यही 'हृदय का संवाद' है अर्थात् समान हृदय ही सहृदय होता है। २. आचार्य भट्टनायक ने काव्य के तीन अंश माने हैं--अभिधा, भावना और ध्वनि। उनका यह तात्पर्य है कि ध्वनि व्यञ्जनात्मक व्यापार है और अभिधा एवं भावना से भिन्न है तथापि उसे काव्य में 'अंशत्व' ही प्राप्त है 'रूपता' नहीं 'अंशत्व' से अभिप्राय शब्द के एक व्यापार का जो महत्त्व है वही है और 'रूपता' अर्थात् अंशित्व या आत्मत्व। कहने का तात्पर्य यह कि काव्य में 'ध्वनि' अंशी या आत्मा की स्थिति में आने के योग्य नहीं, बल्कि वह भी एक शब्द का व्यापार है जैसे अभिधा और भावना शब्द के व्यापार हैं। इस पर लोचनकार यह विचार करते हैं कि यदि
: प्रथम उद्योतः ४१
लोचनम् प्रायेण तु स्वाभ्युपगमप्रसिद्धिसंवेदनविरुद्धमिति । तत्र कवेस्तावत्कीर्त्यापि प्रीतिरेव सम्पाद्या । यदाह—‘कीर्तिं स्वर्गफलामाहुः’ इत्यादि । श्रोतॄणां च व्युत्पत्तिप्रीती यद्यपि स्तः, यथोक्तम्— धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च । करोति कीर्तिं प्रीतिं च साधुकाव्यनिषेवणम् ॥ इति ॥ तथापि तत्र प्रीतिरेव प्रधानम् । अन्यथा प्रभुसंमितेभ्यो वेदादिभ्यो मित्र- संमितेभ्यश्चेतिहासादिभ्यो व्युत्पत्तिहेतुभ्यः कोऽस्य काव्यरूपस्य व्युत्पत्तिहे- तोर्जायासंमितत्वलक्षणो विशेष इति प्राधान्येनानन्द एवोक्तः । चतुर्वर्गव्युत्पत्ते- रपि चानन्द एव पार्यन्तिकं मुख्यं फलम् । आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम । तेन स आनन्दवर्धनाचार्य एतच्छास्त्र- द्वारेण सहृदयहृदयेषु प्रतिष्ठां देवतायतनादिवदनश्वरीं स्थितिं गच्छत्विति भावः । यथोक्तम्— उपेयुषामपि दिवं सन्निबन्धविधायिनाम् । आस्त एव निरातङ्कं कान्तं काव्यमयं वपुः ॥ इति ॥ यह (कहना) सिद्धसाधन है। और यदि रसध्वनि के अभिप्राय से है तो अपने ही मानी हुई प्रसिद्धि रूप सहृदयानुभव संवेदन के विरुद्ध हो जाता है। कवि कीर्ति से भी प्रीति का ही सम्पादन करता है। जैसा कि कहा है—‘कीर्ति को स्वर्ग रूप फल वाली कहते हैं’ इत्यादि । और श्रोताओं को व्युत्पत्ति और प्रीति दोनों होती हैं, जैसा कि कहा है— ‘साधु काव्य के निषेवण से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और कलाओं में कुशलता तथा कीर्ति और प्रीति फल प्राप्त होते हैं।’ तथापि, वहां प्रीति ही प्रधान है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रभुसम्मित वेदादि और मित्रसम्मित इतिहासादि, जो व्युत्पत्ति के हेतु हैं, उनसे व्युत्पत्ति के हेतु काव्य रूप का जायासंमितत्व रूप विशेष क्या रहेगा ? अतः प्रधान रूप से आनन्द ही कहा है। धर्मादि चारों वर्गों की व्युत्पत्ति का भी आनन्द ही पार्यन्तिक मुख्य फल है। और, ‘आनन्द’ यह ग्रन्थकार का नाम है। इससे यह भाव है कि वह आनन्द- वर्धनाचार्य इस शास्त्र के द्वारा सहृदयों के हृदय में प्रतिष्ठा को, अर्थात् देवालय में देवता की भांति कभी नष्ट न होने वाली शाश्वत स्थिति को, प्राप्त करें। जैसा कि कहा है— ‘स्वर्ग में पहुँचे हुए भी सत्काव्य का निर्माण करने वाले कवियों का, बिना किसी आतङ्क का, सुन्दर काव्यमय शरीर (प्रतिष्ठित) ही रहता है।’ भट्टनायक ने वस्तुध्वनि और अलङ्कार ध्वनि के अभिप्राय से ‘ध्वनि’ को ‘अंश’ ही माना है अंशी नहीं, वह तो स्वीकार्य है क्योंकि यह बात पहले से सिद्ध हो चुकी है। किन्तु यदि रसचर्वणा रूप ध्वनि को मन में रखकर उसके अंशित्व या रूपता (आत्मत्व) का निराकरण करते हैं तो यह उनके ही स्वीकृत सिद्धान्त के विरुद्ध होता है।
४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यथा मनसि प्रतिष्ठा एवंविधमस्य मनः, सहृदयचक्रवर्ती खल्वयं ग्रन्थकृ- दिति यावत् । यथा—'युद्धे प्रतिष्ठा परमार्जुनस्य' इति । स्वनामप्रकटीकरणं श्रोतृणां प्रवृत्त्यङ्गमेव सम्भावनाप्रत्ययोत्पादनमुखेनेति ग्रन्थान्ते वक्ष्यामः । एवं ग्रन्थकृतः कवेः श्रोतुश्च मुख्यं प्रयोजनमुक्तम् ॥ १ ॥ ननु 'ध्वनिरूपं ब्रूम' इति प्रतिज्ञाय वाच्यप्रतीयमानाख्यौ द्वौ भेदावर्थस्येति वाच्याभिधाने का सङ्गतिः कारिकाया इत्याशङ्क्य सङ्गतिं कर्तुमवतरणिकां जैसे 'मन में प्रतिष्ठा' उसी प्रकार इसका मन है, मतलब यह कि ग्रंथकार तो सहृदयचक्रवर्ती है । जैसे—'युद्ध में अर्जुन की परम प्रतिष्ठा है'। अपने नाम का प्रकटीकरण श्रोताओं की प्रवृत्ति का अङ्ग सम्भावना-प्रत्यय उत्पन्न करने के द्वारा है, यह हम ग्रन्थ के अन्त में कहेंगे । इस प्रकार ग्रन्थकार, कवि और श्रोता का मुख्य प्रयोजन' कहा गया ॥ १ ॥ 'ध्वनि का स्वरूप कहेंगे' यह प्रतिज्ञा करके 'वाच्य और प्रतीयमान ये अर्थ के दो भेद हैं' इस प्रकार 'वाच्य' के कहने में कारिका की क्या सङ्गति है ? यह आशङ्का १. यहाँ कवि, श्रोता और ग्रन्थकार तीनों का पार्यन्तिक उद्देश्य या फल प्रीति या आनन्द को ही आचार्य ने सिद्ध किया है । कारिका में 'प्रीति' शब्द और वृत्ति में 'आनन्द' शब्द का प्रयोग है । यद्यपि कवि के लिए कीर्ति आदि अनेक फलों का निर्देश किया गया है किन्तु कीर्ति से भी प्रीति ही कवि के द्वारा सम्पाद्य होती है। वचन भी है—'कीर्ति को स्वर्गरूप फल वाली कहते हैं' 'स्वर्ग' क्या है ? निरतिशय आनन्द, जिस आनन्द से बढ़ कर कोई आनन्द की स्थिति नहीं रह जाती हो । जो कि श्रोताओं की बात है, उन्हें व्युत्पत्ति (निपुणता) और प्रीति ये दोनों फल प्राप्त होते हैं, उनमें भी प्रधानता प्रीति को ही है । क्योंकि व्युत्पत्ति तो इतिहास आदि के पढ़ने से भी प्राप्त हो जाती है । उपदेश तीन प्रकार के माने गये हैं—प्रभुसम्मित, मित्रसम्मित और जाया- सम्मित । वेद प्रभुसम्मित उपदेश करता है, अर्थात् वेद जो आज्ञा कर दे उसमें तर्क करने का अवसर ही नहीं रहता जैसे कि स्वामी की आज्ञा में । इतिहास आदि मित्रसम्मित उपदेश करते हैं, अर्थात् मित्र की भाँति अच्छे बुरे को स्पष्टरूप से निर्देश कर देते हैं और स्वयं निर्णय कर लेने के लिए छोड़ देते हैं । किन्तु इन सब में विलक्षण काव्य जायासम्मित उपदेशक है, उसकी विशेषता यह है कि उसके उपदेश में व्युत्पत्ति के साथ प्राधान्य रूप से आनन्द भी रहता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति का भी पार्यन्तिक फल प्रीति या आनन्द ही है । साथ ही आचार्य ने ग्रन्थकार का उद्देश्य भी 'आनन्द' इस नाम के प्रकटीकरण से प्रकट कर दिया । यहाँ ग्रन्थकार का उद्देश्य है कि वह सहृदयजनों के हृदयों में उस प्रकार प्रतिष्ठा या बहुमान लाभ करे जो किसी देवता के मन्दिर में देवता को प्राप्त होती है । मन्दिर में प्रतिष्ठा तो शाश्वत नहीं होती किन्तु मन में प्रतिष्ठा निश्चय ही शाश्वत होती है। इस प्रकार जब वह (ग्रन्थकार) सहृदयजनों के मन में प्रतिष्ठित रहेगा तो उसके इस सम्भावनाप्रत्यय अर्थात् बहुमान के प्रति विश्वास करके श्रोतृवर्ग अवश्य उसके नाम से प्रवृत्त होगा । इसी उद्देश्य से आचार्य ने प्रस्तुत ग्रंथ के अन्त में भी अपना नाम स्थापित किया है। प्रायः ऐसा होता है कि लोग परम्परा से जिस आचार्य के गौरव सुने होते हैं उसी के प्रति उसके नाम से आकृष्ट होकर उसके ग्रन्थ का श्रवण
प्रथम उद्योतः ४३ ध्वन्यालोकः तत्र ध्वनेरेव लक्षयितुमारब्धस्य भूमिकां रचयितुमिदमुच्यते— योऽर्थः सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मेति व्यवस्थितः । वाच्यप्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ॥ २ ॥ अब लक्षित करने के लिए आरम्भ किए गए ध्वनि की ही भूमिका रचने के लिए यह कहते हैं— 'सहृदय जनों के द्वारा प्रशंसनीय जो अर्थ 'काव्य की आत्मा' के रूप में व्यवस्थित है उसके वाच्य और प्रतीयमान नाम के दो भेद माने गए हैं ॥ २ ॥ लोचनम् करोति-तत्रेति । एवंविधेऽभिधेये प्रयोजने च स्थित इत्यर्थः । भूमिरिव भूमिका । यथा अपूर्वनिर्माणे चिकीर्षिते पूर्वं भूमिर्विरच्यते, तथा ध्वनिवरूपे प्रतीयमानाख्ये निरूपयितव्ये निर्विवादसिद्धवाच्याभिधानं भूमिः । तत्पृष्ठेऽधि- कप्रतीयमानांशोल्लिखनात् । वाच्येन समशीर्षिकया गणनं तस्याप्यनपह्नव- नीयत्वं प्रतिपादयितुम् । स्मूतावित्यनेन 'यः समाम्नातपूर्व' इति द्रढयति । 'शब्दार्थशरीरं काव्यम्'ति यदुक्तं, तत्र शरीरग्रहणादेव केनचिदात्मना तद- नुप्राणकेन भाव्यमेव । तत्र शब्दस्तावच्छरीरभाग एव सन्निविशते सर्वजन- संवेद्यधर्मत्वात्स्थूलकृशादिवत् । अर्थः पुनः सकलजनसंवेद्यो न भवति । न ह्यर्थमात्रेण काव्यव्यपदेशः, लौकिकवैदिकवाक्येषु तदभावात् । तदाह-सहृदय- करके सङ्गति करने के लिए अवतरणिका देते हैं—अब—। अर्थात् इस प्रकार के अभिधेय और प्रयोजन के स्थित होने पर । भूमि के समान = भूमिका । जैसे अपूर्व (वस्तु) का निर्माण करना चाहें तो पहले भूमि बना ली जाती है, वैसे प्रतीयमान नायक ध्वनि-स्वरूप का निरूपण करिष्यमाण होने पर, उसके लिए निर्विवाद सिद्ध वाच्य का कथन यहां भूमि है, क्योंकि उस ( वाच्य ) की पीठ पर अधिक प्रतीयमान का उल्लेखन होगा । वाच्य के साथ बराबरी के सिरे से गणन का उद्देश्य है उसके अनपह्नवनीयत्व का प्रतिपादन । ( कारिका में ) 'स्मृतौ' इससे 'पहले कहे गए हैं' (यः समाम्नात-पूर्वः) इसे दृढ़ करते हैं। जैसा कि कहा है 'शब्द और अर्थ काव्य के शरीर हैं'; उसके अनुसार शरीर ग्रहण से ही उसे अनुप्राणित करने वाले किसी आत्मा को होना ही चाहिए । ऐसी स्थिति में, शब्द तो शरीर के भाग में ही सन्निवेश प्राप्त करता है क्योंकि ( वह ) स्थूल और कृश आदि ( शरीर ) की भाँति सभी लोगों द्वारा संवेद्य है । अर्थ सभी लोगों द्वारा संवेद्य नहीं होता । न कि अर्थ मात्र से काव्य का व्यपदेश ( व्यवहार ) होता है, क्योंकि लौकिक और वैदिक वाक्यों में वह ( काव्य का व्यपदेश ) नही होता । इस लिए कहते हैं—सहृदय जनों द्वारा प्रशंसनीय— । वह एक ही अर्थ करते हैं । इसीलिए ग्रन्थकार अपना नाम दिया करते हैं । इस प्रकार ग्रन्थकार, कवि और श्रोता का मुख्य प्रयोजन आनन्द कहा गया ।
४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् श्लाघ्य इति। स एक एवार्थो द्विशाखतया विवेकिभिर्विभागबुद्ध्या विभज्यते । तथाहि-तुल्येऽर्थरूपत्वे किमिति कस्मैचिदेव सहृदयाः श्लाघन्ते। तद्भवित- तव्यं तत्र केनचिद्विशेषेण। यो विशेषः, स प्रतीयमानभागो विवेकिभिर्विशेष- हेतुत्वादात्मेति व्यवस्थाप्यते । वाच्यसंवलनाविमोहितहृदयैस्तु तत्पृथग्भावे विप्रतिपद्यते, चार्वाकैरिवात्मपृथग्भावे। अत एव अर्थ इत्येकतयोपक्रम्य सहृद- यश्लाघ्य इति विशेषणद्वारा हेतुमभिधायापोद्धारदृशा तस्य द्वौ भेदावंशावित्यु- क्तम्, न तु द्वावप्यात्मानौ काव्यस्येति । दो शाखाओं (अंशों) वाला होने के कारण विवेचनशील लोगों द्वारा विभाग-बुद्धि से विभाजित किया जाता १ है। जैसा कि—दोनों का अर्थरूप होना समान है तब क्यों किसी एक के लिए सहृदय जन प्रशंसा करते हैं? अतः, वहाँ किसी विशेष को होना चाहिए। जो विशेष है वह प्रतीयमान भाग, विशेष होने के कारण विवेकी लोगों द्वारा आत्मा के रूप में व्यवस्थापित किया जाता है। वाच्य अर्थ की संवलना (वासना) से विमोहित हृदय वाले लोग उस (प्रतीयमान) के अलग होने में विप्रतिपत्ति करते हैं, जिस प्रकार चार्वाक लोग आत्मा को (शरीर से) अलग मानने में। अत एव 'अर्थः' इस एकवचन के रूप से उपक्रम करके 'सहृदयश्लाघ्य' (सहृदय जनों द्वारा प्रशंसनीय) इस विशेषण द्वारा हेतु कहकर विभाग (अपोद्धार) की दृष्टि से उसके दो भेद अर्थात् अंश हैं, यह कहा है; न कि काव्य के दोनों ही अर्थ आत्मा हैं। १. प्रस्तुत 'कारिका' साधारण विचार वालों को भ्रम में डाल देने वाली है। कुछ लोग भ्रम में पड़ कर समझ जाते हैं कि आचार्य ने यहाँ 'ध्वनि' का ही भेद करना आरम्भ कर दिया है, फिर यह सोच कर और भी परेशानी होती है कि ध्वनि का भेद है तो 'वाच्य' अर्थ ध्वनि के भेद के अन्तर्गत कैसे आ सकता है? इस भ्रम का निवारण 'लोचन' में बड़ी योग्यता से किया गया है। लोचनकार का कहना है कि यहाँ ग्रन्थकार अपने साध्य प्रतीयमान अर्थ को निर्विवाद सिद्ध वाच्य अर्थ की सामान्य कोटि में लाकर प्रतीयमान का भी वाच्य अर्थ की भाँति 'अनपह्नवनीयत्व' (प्रतिषेधनीयत्व) प्रतिपादन करना चाहते हैं। शब्द और अर्थ को काव्य का शरीर माना गया है, ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि उस काव्य-शरीर का कोई आत्मा भी हो। शब्द और अर्थ में अर्थ की अपेक्षा शब्द अधिक स्थूल होता है, इसलिए साधारण लोग भी उसे जान लेते हैं किन्तु अर्थ को साधारण लोग नहीं समझ पाते। किन्तु केवल अर्थ के आधार पर कभी किसी रचना को 'काव्य' नहीं कहा गया है इसलिए अपेक्षित है कि वह अर्थ 'सहृदयजनों के द्वारा प्रशंसा के योग्य' हो--सहृदयश्लाघ्य हो। इस प्रकार सामान्य अर्थ और सहृदयश्लाघ्य अर्थ का भेद हर विचारशील व्यक्ति समझ सकता है। इसीलिए आचार्य ने एक ही अर्थ को दो भागों में विभक्त किया। किन्तु अर्थ की दृष्टि से वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक होने पर भी जहाँ तक सहृदयश्लाघ्यत्व की बात है उसके अनुसार काव्य की आत्मा प्रतीयमान अर्थ ही होगा, वाच्य अर्थ नहीं। कुछ लोग अवश्य यह विप्रतिपत्ति खड़ी कर सकते हैं कि प्रतीयमान अर्थ ही क्यों, वाच्य अर्थ भी सहृदयश्लाघ्य हो सकता है ? जिस प्रकार चार्वाकों ने शरीर को लेकर ही पृथक् आत्मा स्वीकार करने का वाद
प्रथम उद्योतः ४५ ध्वन्यालोकः काव्यस्य हि ललितोचितसन्निवेशचारुणः शरीरस्येवात्मा सार- रूपतया स्थितः सहृदयश्लाघ्यो योऽर्थस्तस्य वाच्यः प्रतीयमानश्चेति द्वौ भेदौ। ललित और उचित सन्निवेश के कारण चारु काव्य का, शरीर की आत्मा की भाँति, सार रूप में स्थित होकर सहृदय जनों द्वारा प्रशंसा के योग्य जो अर्थ है, उसके वाच्य और प्रतीयमान, ये दो भेद हैं। लोचनम् कारिकाभागगतं काव्यशब्दं व्याकर्तुमाह—काव्यस्य हीति। ललितशब्देन गुणालङ्कारानुग्रहमाह। उचितशब्देन रसविषयमेवौचित्यं भवतीति दर्शयन् रसध्वनेर्जीवितत्वं सूचयति। तदभावे हि किमपेक्षयेदमौचित्यं नाम सर्वत्रोद्घो- ष्यत इति भावः। योऽर्थ इति यदानुवदन् परेणाप्येतत्तावदभ्युपगतमिति दर्श- यति। तस्येत्यादिना तदभ्युपगम एव द्वयंशत्वे सत्युपपद्यत इति दर्शयति। तेन यदुक्तम्-‘चारुत्वहेतुत्वाद् गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो न ध्वनिः' इति, तत्र ध्वनेरात्मस्वरूपत्वाद्वेतुरसिद्ध इति दर्शितम्। न ह्यात्मा चारुत्वहेतुर्देहस्येति कारिका-भाग में आए हुए 'काव्य' शब्द को व्याकृत करने के लिए कहते हैं— काव्य का—। 'ललित' शब्द से गुण और अलङ्कार का अनुग्रह (सहायकत्व) कहा है। 'उचित' शब्द से रसविषयक ही औचित्य होता है यह दिखाते हुए रसध्वनि का जीवितत्व सूचित करते हैं। भाव यह कि उस (रस) के अभाव में किस अपेक्षा से इस औचित्य को सब जगह उद्घोषित करते हैं? 'योऽर्थः' यह 'यत्' शब्द द्वारा अनुवाद करते हुए यह दिखाते हैं कि दूसरे ने भी इसे माना है। 'तस्य' इत्यादि द्वारा उसका स्वीकार (अभ्युपगम) ही दो अंशों के होने पर उपपन्न हो सकता है, यह दिखाते हैं। उस कारण जो कि कहा है—'चारुत्व के हेतु होने के कारण ध्वनि, गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त (पृथक्) नहीं है'; वहाँ यह दिखा दिया कि 'ध्वनि' के आत्मस्वरूप होने के कारण हेतु असिद्ध है। आत्मा शरीर के चारुत्व का खड़ा किया था। इस प्रकार प्रस्तुत कारिका में आचार्य ने 'अर्थ' के रूप में उपक्रम करके 'सहृदय- श्लाघ्य' इस विशेषण 'विभाग' की दृष्टि से उस अर्थ के दो भेद बताये हैं न कि यह कहा है कि काव्य के दो आत्मा हैं। १. यह 'काव्यलक्ष्मविधायिभिः' इस वृत्तिभाग का अनुवाद है। कुछ संस्करणों में इसे कारिका- भाग ही मानकर छापा है किन्तु 'लोचन' के अनुसार यह वृत्तिभाग है और 'ततो नेह प्रतन्यते' यह कारिका भाग। ललित और उचित सन्निवेश से चारु काव्य—काव्य में ललित सन्निवेश की सिद्धि गुण और अलङ्कार के अनुग्रह से सम्भव होती है और उचित सन्निवेश तब बनता है जब 'रस' की स्थिति अनुकूल होती है। इसी से प्रकट होता है कि रसध्वनि आत्मा है, क्योंकि रस का औचित्य रस के
४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वाच्यः प्रसिद्धो यः प्रकारैरुपमादिभिः । बहुधा व्याकृतः सोऽन्यैः— काव्यलक्ष्मविधायिभिः । —ततो नेह प्रतन्यते ॥ ३ ॥ केवलमनूद्यते पुनर्यथोपयोगमिति ॥ ३ ॥ अब जो वाच्य अर्थ उपमा आदि के प्रकारों से प्रसिद्ध है उसे अन्य लोगों ने बहुधा व्याख्यान किया है। काव्य के लक्षणकारों ने । उसकारण से यहाँ विस्तार नहीं करते हैं ॥ ३ ॥ केवल फिर उपयोग के अनुसार अनूदित करेंगे ॥ ३ ॥ लोचनम् भवति । अथाप्येवं स्यात्तथापि वाच्येऽनैकान्तिको हेतुः । न ह्यलङ्कार्य एवाल- ङ्कारः, गुणी एव गुणः । एतदर्थमपि वाच्यांशोपक्षेपः । अत एव वक्ष्यति— ‘वाच्यः प्रसिद्धः’ इति ॥ २ १॥ तत्रेति । द्व्यंशत्वे सत्यपीत्यर्थः । प्रसिद्ध इति । वनितावदनोद्यानेन्दूदया- दिलौकिक एवेत्यर्थः । ‘उपमादिभिः प्रकारैः स व्याकृतो बहुधे’ति सङ्गतिः । अन्यैरिति कारिकाभागं काव्येत्यादिना व्याचष्टे । ‘ततो नेह प्रतन्यत’ इति विशेषप्रतिषेधेन शेषाभ्यनुज्ञेति दर्शयति—केवलमित्यादिना ॥ ३ ॥ हेतु नहीं होता है । अगर ऐसा हो भी जाता है तथापि वाच्य में हेतु १व्यभिचारी (अनैकान्तिक) है, क्योंकि अलङ्कार्य ही अलङ्कार नहीं होता । गुणी ही गुण नहीं होता । इस लिए भी वाच्य-अंश का त्याग है । अत एव कहेंगे—, वाच्य अर्थ प्रसिद्ध है’ ॥ २ ॥ अब— । अर्थात् दो अंशों वाला होने पर भी । प्रसिद्ध— । अर्थात् वनिता का मुख, उद्यान, चन्द्रोदय आदि लौकिक ही । ‘उपमादि प्रकारों से वह बहुत प्रकार व्याकृत है’ यह सङ्गति है । ‘अन्य’ इस कारिका-भाग की ‘काव्य०’ इत्यादि द्वारा व्याख्या करते हैं । ‘उस कारण उसका यहाँ विस्तार नहीं करते हैं’ इस प्रकार विशेष के प्रतिषेध द्वारा शेष की अभ्यनुज्ञा (अनुवाद) है, यह दिखाते हैं—केवल० इत्यादि ॥ ३ ॥ प्राधान्य में ही बन सकता है, अन्यथा जो ध्वनि नहीं स्वीकार करते हैं किसकी अपेक्षा करके औचित्य का उद्घोष करेंगे ? उनके यहाँ तो रस ही नहीं है । १. यहाँ भी वही प्रश्न है कि जब कारिका में वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक अर्थ के भेद हैं फिर यह क्या कि वाच्य को काव्य की आत्मा की सीमा से बाहर कर देते हैं ? इसका समाधान पहले दिया जा चुका है, यहाँ केवल यह कहना है कि जो पहले अभाववाद के प्रसंग में चारुत्व का हेतु
प्रथम उद्योतः ४७ ध्वन्यालोकः प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥४॥ प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वाच्याद्वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्सहृदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धेभ्योऽलङ्कृतेभ्यः प्रतीतेभ्यो वाऽवयवेभ्यो व्यतिरिक्तत्वेन प्रकाशते लावण्यमिवाङ्गनासु । यथा ह्यङ्गनासु लावण्यं पृथङ्निर्वर्ण्यमानं निखिलावयवव्यतिरिक्तं किमप्यन्यदेव सहृदयलोचना- मृतं तत्त्वान्तरं तद्वदेव सोऽर्थः । महाकवियों के वचनों में प्रतीयमान कुछ और ही वस्तु है, जो वह प्रसिद्ध अवयवों से अतिरिक्त रूप में स्त्रियों में लावण्य की भाँति विशेष भासित होता है ॥४॥ प्रतीयमान ( अर्थ ) महाकवियों के वचनों में पुनः कोई अन्य ही वस्तु है । सहृदय जनों में सुप्रसिद्ध जो वह प्रसिद्ध अर्थात् अलङ्कृत अथवा प्रतीत अवयवों से सर्वथा अतिरिक्त रूप में स्त्रियों में लावण्य की भाँति प्रकाशित है । जैसे स्त्रियों में लावण्य पृथक् होकर दिखाई देता हुआ, सारे अङ्गों से व्यतिरेक ( पार्थक्य ) रखने वाला, कोई दूसरा ही सहृदय जनों की आँखों का अमृत, एक तत्त्व है उसी प्रकार वह ( प्रतीयमान ) अर्थ है । लोचनम् अन्यदेव वस्त्विति । पुनःशब्दो वाच्याद्विशेषद्योतकः । तद्व्यतिरिक्तं सारभूतं चेत्यर्थः । महाकवीनामिति बहुवचनमशेषविषयव्यापकत्वमाह । एतदभिधास्य- दूसरी ही वस्तु— । 'पुनः' शब्द वाच्य से विशेष का द्योतक है, अर्थात् ( प्रतीयमान अर्थ ) उस ( वाच्य ) से व्यतिरिक्त और सारभूत है । 'महाकवियों की' यहाँ बहुवचन सारे विषयों में ( प्रतीयमान का ) व्यापकत्व बताता है । भाव यह कि जिसकी चर्चा होने के कारण ध्वनि गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त नहीं है । यह बात तो ध्वनि के आत्मा सिद्ध होते ही स्वयं खण्डित हो गई, क्योंकि आत्मा कभी शरीर का चारुत्वहेतु नहीं हो सकता । यदि किसी प्रकार मान भी लिया जाय तो भी यहाँ वाच्य अंश को तो छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि शरीरभूत वाच्य अर्थ अलङ्कार्य एवं गुणी होने से स्वयं किसी प्रकार अलंकार और गुण की कोटि में नहीं लाया जा सकता, अर्थात् वाच्य के अंश में चारुत्वहेतु रूप हेतु अनैकान्तिक (अर्थात् व्यभिचारी) हो जाता है, कहने का मतलब यह कि वाच्य को चारुत्व का हेतु बना कर गुण अथवा अलङ्कार के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अलङ्कार्य एवं गुणी है । न्याय शास्त्र के अनुसार हेतु व्यभिचारी तभी होता है जब वह वहाँ भी चला जाय जहाँ साध्य का अभाव है, प्रस्तुत में वाच्य गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है, किन्तु हेतु चारुत्वहेतुत्व प्रतीयमान के साथ सम्बद्ध होने के कारण वाच्य में भी प्राप्त है । कहने का तात्पर्य यह कि किसी प्रकार वाच्य को प्रतीयमान के सम- कोटिक नहीं बनाया जा सकता ।
४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् मानप्रतीयमानानुप्राणितकाव्यनिर्माणनिपुणप्रतिभाभाजनत्वेनैव महाकवि- व्यपदेशो भवतीति भावः । यदेवंविधमस्ति तद्भाति । न ह्यत्यन्तासतो भानमुप- पन्नम्; रजताद्यपि नात्यन्तमसद्भाति । अनेन सत्त्वप्रयुक्तं तावद्भानमिति भानात्सत्त्वमवगम्यते । तेन यद्भाति तदस्ति तथेत्युक्तं भवति । तेनायं प्रयोगार्थः—प्रसिद्धं वाच्यं धर्मि, प्रतीयमानेन व्यतिरिक्तेन तद्वत्, तथा भासमानत्वात् लावण्योपेताङ्गनाङ्गवत् । प्रसिद्धशब्दस्य सर्वप्रतीतत्वमलङ्कृ- आगे की जायगी उस प्रतीयमान अर्थ से अनुप्राणित काव्य के निर्माण में निपुण प्रतिभा का भाजन होने के कारण ही 'महाकवि' यह व्यपदेश (नाम) होता है। जिस कारण वह (प्रतीयमान) अर्थ इस प्रकार का (व्यतिरिक्त एवं सारभूत) है उस कारण प्रकाशित होता है। क्योंकि जो बिलकुल असत् है उसका भान उपपन्न नहीं, रजत आदि भी अत्यन्त असत् होकर भासित नहीं होता। इस कारण भान वस्तु के अस्तित्व से प्रयुक्त होता है। इस प्रकार भान से (प्रतीयमान) का सत्त्व (अस्तित्व) अवगत होता है। इससे यह कहा गया कि जो प्रकाशित होता है वह उस प्रकार है। इसलिए यह प्रयोग रूप अर्थ हुआ—प्रसिद्ध जो वाच्य धर्मी है वह अपने से व्यतिरिक्त प्रतीयमान से युक्त है, क्योंकि वह उस प्रकार भासित होता है, जैसे लावण्य से युक्त अङ्गना का अङ्ग। 'प्रसिद्ध' शब्द का अर्थ 'सबको प्रतीत होना' तथा 'अलंकृत होना' है। जो' वह— । यह दो
१. प्रस्तुत में आचार्य के सामने प्रतीयमान को 'सत्' सिद्ध करना है। जब कि आचार्य ने उसे 'सत्' सिद्ध करने के लिए उसका 'भान' होना ही प्रमाण बताया तब उनके सामने यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि वह प्रतीयमान, जिसका 'भान' हो रहा है, क्या कोई अपने अस्तित्व की पुष्टि में कोई अपना दृष्टान्त भी रखता है ? इस प्रश्न के समाधान में आचार्य ने कामिनियों के अङ्ग के लावण्य को प्रतीयमान का दृष्टान्त बनाया उनका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार लावण्य कामिनी के अङ्ग से अपृथग्भूत रहते हुए भी उससे भिन्न और कुछ विशेष चमत्कार की वस्तु सा प्रतीत होता है वही स्थिति यहाँ प्रतीयमान अर्थ की है, जो महाकवियों की वाणियों में वाच्य से कुछ अतिरिक्त ही भासित होता है। 'लावण्य' को केवल देख कर समझा जा सकता है, उसे व्यक्त करने के लिए किसी शब्द में सामर्थ्य नहीं, इसी लिए आचार्य ने उसके लिए दो सर्वनाम 'यत्-तत्' ('जो-वह') का प्रयोग किया और वृत्ति ग्रन्थ में 'किमपि' ('कुछ') के द्वारा उसकी व्याख्या की। इससे आचार्य को दो बातें लोचनकार के अनुसार अभिप्रेत है। एक तो यह कि जिस प्रकार लावण्य शब्द के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता, अर्थात् उसका व्यपदेश नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार प्रतीयमान भी वस्तुतः अव्यपदेश्य तत्त्व है (यह ध्यान रखना चाहिए कि यह बात 'रसध्वनि' के अभिप्राय से कही गयी है)। दूसरे, आचार्य यह निर्देश करना चाहते हैं कि जिस प्रकार अङ्गना के अङ्ग और लावण्य में लोगों को सामान्यतः अव्यतिरेक या अभेद का भ्रम हो जाता है उसी प्रकार वाच्य और प्रतीयमान में भी लोग भेदबुद्धि खो बैठते हैं और दोनों को एक ही समझने लगते हैं। इन दोनों बातों में प्रतीयमान को 'अव्यपदेश्य' निर्दिष्ट करने का लाभ यह है कि प्रतीयमान अर्थ लावण्य की भाँति ही एक चमत्कार सार तत्त्व है, बस उसे अनुभव ही किया जा सकता है।