भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 680 में से

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पृष्ठ 97

: प्रथम उद्योतः ३७ ध्वन्यालोकः तस्य हि ध्वनेः स्वरूपं सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूतमतिरमणी- यमणीयसीभिरपि चिरन्तनकाव्यलक्षणविधायिनां बुद्धिभिरनुन्मीलित- पूर्वम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये सर्वत्र प्रसिद्ध- व्यवहारं लक्षयतां सहृदयानामानन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकाश्यते ॥ १ ॥ उस ध्वनि का स्वरूप जो सकल सत्कवियों के काव्यों का उपनिषद्भूत, अति- रमणीय है, जो प्राचीन लक्षणकारों की अणुपरिमाण (सूक्ष्मतम) बुद्धि द्वारा भी उन्मीलित नहीं हुआ है, और, जिसका रामायण, महाभारत प्रभृति लक्ष्य (ग्रन्थों) में व्यवहार प्रसिद्ध है, लक्षित करते हुए सहृदय जनों के मन में आनन्द प्रतिष्ठित हो इस उद्देश्य से उसे प्रकाशित करते हैं । लोचनम् ध्वनिशास्त्रयोर्वक्तृश्रोतृव्युत्पाद्यव्युत्पादकभावः सम्बन्धः, विमतिनिवृत्त्या तत्स्व- रूपज्ञानं प्रयोजनम्, शास्त्रप्रयोजनयोः साध्यसाधनभावस्सम्बन्ध इत्युक्तम् । अथ श्रोतृगतप्रयोजनप्रयोजनप्रतिपादकं 'सहृदयमनःप्रीतये' इति भागं व्याख्यातुमाह-तस्य हीति । विमतिपदपतितस्येत्यर्थः । ध्वनेः स्वरूपं लक्षयतां सम्बन्धिनि मनसि आनन्दो निर्वृत्यात्मा चमत्कारपरपर्यायः, प्रतिष्ठां परैर्विप- र्यासाद्युपहतैरनुन्मूल्यमानत्वेन स्थेमानं, लभतामिति प्रयोजनं सम्पादयितुं (विषय) है, ध्वनि और शास्त्र में अभिधानाभिधेय रूप सम्बन्ध और वक्ता एवं श्रोता में व्युत्पाद्यव्युत्पादकभाव रूप सम्बन्ध है, विमतियों की निवृत्ति सहित उस (ध्वनि) का स्वरूपज्ञान प्रयोजन है, शास्त्र और प्रयोजन का सम्बन्ध साध्यसाधनभाव रूप है, यह बात कही गई । अब श्रोतृगत प्रयोजन के प्रयोजन¹ का प्रतिपादन करने वाले 'सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिए' इस भाग के व्याख्यान के लिए कहते हैं-उस ध्वनि का-। अर्थात् विमति के मार्ग में पड़े हुए ध्वनि का स्वरूप लक्षित करते हुए के मन में आनन्द, जो निर्वृति रूप और दूसरे शब्द में 'चमत्कार' है, प्रतिष्ठा को, अर्थात् विपर्यास आदि (कमजोरियों) से उपहत दूसरे (अभाववादी आदि) द्वारा अनुन्मूलित होने के कारण स्थिरता को, प्राप्त करे, इस प्रयोजन के सम्पादन के लिए उस (ध्वनि) का स्वरूप विषय, सम्बन्ध, अधिकारी और प्रयोजन क्या हैं ? इन्हीं चारों को शास्त्रीय परिभाषा में 'अनु- बन्धचतुष्टय' कहा गया है। इसका निर्देश ग्रन्थारम्भ में भी किया जा चुका है। १. आरम्भ में भी कहा जा चुका है कि प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रयोजन ध्वनिस্বরূপ का ज्ञान है, किन्तु इस प्रयोजन का भी प्रयोजन है सहृदयजनों की मनःप्रीति । क्योंकि 'काव्य' के तत्त्वज्ञान के लिए ध्वन्यालोक का निर्माण अभीष्ट है और 'काव्य' का चरम लक्ष्य सहृदयजनों की मनःप्रीति