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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 680 में से

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पृष्ठ 96

३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् क्रमेण विपर्याससन्देहाज्ञानप्राधान्यमेतेषाम्। तेनेति। एकैकोऽप्ययं विप्रति- पत्तिरूपो वाक्यार्थो निरूपणे हेतुत्वं प्रतिपद्यत इत्येकवचनम्। एवंविधासु विमतिष्विति निर्धारणे सप्तमी। आसु मध्ये एकोऽपि यो विमतिप्रकारस्तेनैव हेतुना तत्स्वरूपं ब्रूम इति, ध्वनिस्वरूपमभिधेयम्, अभिधानाभिधेयलक्षणो इस कारण—१ विप्रतिपत्तिरूप एक भी वाक्यार्थ (ध्वनि के) निरूपण में हेतु बन जाता है इसलिए 'एकवचन'१ का प्रयोग है। 'इस प्रकार की विमतियों में' यहाँ 'निर्धारण' में२ सप्तमी है। इन (विमतियों के) बीच में एक भी जो विमति का प्रकार है उसी हेतु से 'उस (ध्वनि) का स्वरूप हम कहते हैं'; (इस ग्रन्थ का) ३ध्वनि-स्वरूप अभिधेयं

इस प्रकार उन्होंने ध्वनि की दिशा का उन्मीलन तो कर ही दिया, क्योंकि जब 'गङ्गायां घोषः' इस स्थल में आचार्य भामह को स्वीकार हो चुका कि 'गङ्गा' का अमुख्य अर्थ 'तीर' है तब वे प्रयोजन रूप शैत्य-पावनत्व तक, जो ध्वनि का अपना पक्ष है, पहुँच ही चुके थे, प्रायः स्पर्श तो उन्होंने कर ही लिया था। ऐसी अनुकूल स्थिति में भी, कुछ लोगों ने, जिन्हें स्वरूपविवेक का सामर्थ्य न था, इस प्राचीन 'ध्वनि' को 'भाक्त' कहा और ऊपर से उपालम्भ देना भी शुरू कर दिया। हम ध्वनिवादी 'भाक्त' पक्ष को अस्वीकार कहाँ करते हैं। बल्कि हमारा कहना है कि भाक्तवादियों ने तो 'ध्वनि' को स्वीकार ही कर लिया, क्योंकि ध्वनि का एक भेद, जो अविवक्षित- वाच्य है वहाँ 'भक्ति' या लक्षणा, जिसे उपचार और गुणवृत्ति भी कहा है, बिल्कुल प्राप्त होती है। किन्तु इन बीच के लोगों ने वही स्थिति अपनाई जो किसी नारियल के न फोड़े जाने पर उसके सम्बन्ध में होती है। जिस प्रकार नारियल के फल को ऊपर से छील देने के बाद दूसरी स्थिति तक रह जाने से कोई लाभ नहीं, उसके बाद उसे फोड़ने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार ध्वनि-पक्ष के अनुकूल भाक्त-वाद को स्वीकार करने पर भी एक कदम और आगे बढ़ने की आवश्यकता रह जाती है। वही न करके भाक्तवादियों ने 'ध्वनि' का उपालम्भ शुरू कर दिया, अतः उन्हें ध्वनि-पक्ष के प्रतिकूलवादियों में स्थान मिला। लोचनकार का कहना है कि प्रस्तुत वृत्ति ग्रन्थ को कुछ इसी प्रकार लगाना चाहिए। १. एकवचन—वृत्तिग्रन्थ में तीनों ध्वनि की विप्रतिपत्तियों को उद्धृत करके ध्वनि के स्वरूप के प्रतिपादन में तीनों एक-एक करके हेतु हैं इस बात को सूचित करने के लिए आचार्य ने 'तेन' ('इस कारण') इस एकवचन का प्रयोग किया है, वस्तुतः बहुवचन प्रासङ्गिक था। ध्वनि का निरूपण केवल अनेक विप्रतिपत्तियों के निराकरण के लिए नहीं किया जा रहा है बल्कि प्रत्येक विप्रतिपत्ति इसके द्वारा निराकरणीय है। २. 'निर्धारण' में सप्तमी वहाँ होती हैं जहाँ बहुतों में से किसी एक को निर्धारित करना होता है। प्रस्तुत में अनेक विमतियों में कोई एक भी ध्वनिस्वरूप के निरूपण का हेतु है। ऐसी स्थिति में यहाँ पाणिनीय सूत्र 'यतश्च निर्धारणम्' (२. ३. ४१) के अनुसार निर्धारण में सप्तमी का विषय है, न कि 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' (पा. सू. २. ३. ३७) के अनुसार भावलक्षण में सप्तमी का, क्योंकि यहाँ क्रिया से क्रियान्तर के लक्षित होने का कोई प्रसङ्ग नहीं, इससे एक-एक विप्रतिपत्ति का निरूपणहेतुत्व सिद्ध नहीं होता। ३. यहाँ लोचनकार ने प्रस्तूयमान ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' के 'अनुबन्धचतुष्टय' का उल्लेख किया है। किसी भी ग्रन्थ के अध्ययन में श्रोता की प्रवृत्ति तभी हो सकती है जब वह अनुभव करे कि इस ग्रन्थ के अध्ययन से उसका इष्टसिद्ध होगा, अर्थात् उसे पहले विदित करना चाहिये कि ग्रन्थ के

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