ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तत्स्वरूपं प्रकाश्यत इति सङ्गतिः। प्रयोजनं च नाम तत्सम्पादकवस्तुप्रयोक्तृता- प्राणतयैव तथा भवतीत्याशयेन 'प्रीतये तत्स्वरूपं ब्रूम' इत्येकवाक्यतया प्रकाशित करते हैं, यह सङ्गति है। और प्रयोजन, जो उस (प्रयोजन) के सम्पादक वस्तु की जो प्रयोक्तृता या प्रयोजकता रूप प्राण है जिसका, इस प्रकार का होता है,१ इस आशय से 'प्रीति के लिए उस (ध्वनि) का स्वरूप हम कहते हैं' इस प्रकार एक वाक्य रूप से व्याख्या करनी चाहिए (अथवा यह व्याख्या है)। 'उसका स्वरूप'२ इसकी ही है। यश आदि साधारण कोटि के प्रयोजन हैं। इसीलिए ध्वन्यालोक का भी मुख्यभूत प्रयोजन अर्थात् प्रयोजन का प्रयोजन 'सहृदयमनःप्रीति' ही सूचित की गई। १. ध्वनिस्वरूप के प्रस्तुत निरूपण के दो ही प्रयोजन हैं। एक तो 'ध्वनि' के सम्बन्ध में विमतियों का निराकरण और दूसरा सहृदयजनों की प्रीति। यदि 'प्रयोजन' शब्द का व्युत्पत्ति- लभ्य' अर्थ देखा जाय तो प्रयोजन वही होता है जो प्रेरणा करता है (प्रेरयतीति प्रयोजनम्) इस आधार पर यहाँ वस्तुतः प्रयोजन 'प्रीति' ही है, क्योंकि ध्वनिस्वरूप का निरूपण सहृदयजनों को प्रसन्न करने के लिए ही आचार्य विमतियों के निराकरणपूर्वक करने जा रहे हैं। इसी लिए लोचनकार स्पष्टरूप से 'प्रयोजन' शब्द का प्रतिपादन करते हैं कि प्रयोजन अपने सम्पादक वस्तु की प्रयोजकता से प्रयोजन कहलाता है, प्रस्तुत में ध्वनिस्वरूप का निरूपण प्रीतिरूप प्रयोजन का सम्पादक है। इस प्रकार एक वाक्यरूप से कि प्रीति के लिए 'उसके स्वरूप को हम कहते हैं' व्याख्या करनी चाहिए--(अथवा यदि 'व्याख्येयम्' को 'व्याख्या इयम्' मानें तो यहाँ कहना होगा कि इस प्रकार एकवाक्य रूप से यह व्याख्या है)। २. मूल कारिकाग्रन्थ के 'तत्स्वरूपम्' की व्याख्या वृत्ति-ग्रन्थ में अनेक विशेषणों से करते हुए आचार्य ने पूर्वनिर्दिष्ट पांचों विकल्पों के एक प्रकार से निराकरण का अभिप्राय सूचित किया है यह आचार्य अभिनव की सूक्ष्मेक्षिका है। इसे स्पष्टरूप से क्रमशः इस प्रकार समझना चाहिये— वक्ष्यमाण ध्वनिस्वरूप 'सकल सत्कवियों के काव्यों का उपनिषद्भूत है' अर्थात् ध्वनि सभी सत्कवियों के काव्यों का परम रहस्यभूत तत्त्व है, काव्यतत्त्वज्ञान से वञ्चित लोग उसे नहीं समझ सकते हैं। जैसा कि पहले अभाववादी के मत में कहा गया था कि वाग्विकल्पों के अनन्त होने के कारण प्रसिद्ध आलंकारिकों द्वारा किसी अप्रदर्शित प्रकारलेश को ही लेकर 'ध्वनि' कह दिया गया है, यह बात प्रस्तुत विशेषण के 'सकल' और 'सत्कवि' के प्रयोग से निराकृत हो जाती है। यह कोई ऐसा वाग्विकल्प नहीं जो अप्रदर्शित हो बल्कि यह तो सभी कवियों के काव्य में पाया जाता है, किन्तु इतना अवश्य है कि वह उपनिषद्भूत या परम रहस्य है उसे साधारण प्रतिभावाले नहीं समझ सकते हैं। दूसरे, इसे 'उपनिषद्भूत' कहने से 'अपूर्व समाख्या' (नया नामकरण) वाला जो दोष दिया गया था उसका निराकरण हो जाता है, क्योंकि जब यह सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है ऐसी स्थिति में इसका अपूर्व समाख्यामात्र होना सम्भव नहीं। इसे 'अतिरमणीय' कह कर 'भाक्त' से इसकी विलक्षणता कही गई है। क्योंकि 'गङ्गायां घोषः' आदि में कोई रमणी- यता नहीं है। 'अणुपरिमाण बुद्धि' के कहने से इस बात को सूचित किया कि ध्वनिस्वरूप साधारणबुद्धि-संवेद्य गुण तथा अलङ्कारों में अन्तर्हित नहीं हो सकता, वह तो ऐसा है कि उसे सूक्ष्म परिमाण बुद्धि से भी समझ पाना कठिन है। जो कि शङ्का कर चुके हैं, कुछ विद्वानों (सहृदयों) का दल बनाकर 'ध्वनि' को मान्यता दी जा सकती है, उसे चिरवकाश इस प्रकार प्रस्तुत में आचार्य ने किया है कि सर्वत्र रामायण-महाभारत-प्रभृति लक्ष्य में ध्वनिस्वरूप प्रसिद्ध व्यवहार है तथा आदिकवि से लेकर सभी सूरियों ने उसका आदर किया है। 'लक्षित करते हुए'