भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

प्रथम उद्योतः ३९

लोचनम्

व्याख्येयम् । तत्स्वरूपशब्दं व्याचक्षाणः संक्षेपेण तावत्पूर्वोदीरितविकल्पपञ्च- कोद्धरणं सूचयति-सकलेत्यादिना । सकलशब्देन सत्कविशब्देन च प्रकारलेशे कस्मिंश्चिदिति निराकरोति । अतिरमणीयमिति भाक्ताद्व्यतिरेकमाह । न हि ‘सिंहो वटुः’ ‘गङ्गायां घोषः’ इत्यत्र रम्यता काचित् उपनिषद्भूतशब्देन तु अपूर्वसमाख्यामात्रकरण इत्यादि निराकृतम् । अणीयसीभिरित्यादिना गुणाल- ङ्कारानन्तर्भूतत्वं सूचयति । अथ चेत्यादिना ‘तत्समयान्तःपातिन’ इत्यादिना यत्सामयिकत्वं शङ्कितं तन्निरवकाशीकरोति । रामायणमहाभारतशब्देनादिकवेः प्रभृति सर्वैरेव सूरिभिरस्यादरः कृत इति दर्शयति । लक्ष्यतामित्यनेन वाचां स्थितमविषय इति परास्यति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् । लक्षणेन निरू- पयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः । सहृदयानामिति । येषां व्याख्या करते हुए, संक्षेप से, जो पहले पाँच विकल्प कहे जा चुके हैं, उनका निराकरण सूचित करते हैं—सकल इत्यादि द्वारा । ‘सकल’ शब्द द्वारा और ‘सत्कवि’ शब्द द्वारा ‘किसी प्रकार लेश में’ इसका निराकरण करते हैं । ‘अतिरमणीय’ इस विशेषण द्वारा ‘भाक्त’ से व्यतिरेक ( वैलक्षण्य ) कहा । क्योंकि ‘सिंहो वटुः’ और ‘गङ्गायां घोषः’ इस स्थल में कोई रम्यता नहीं है । ‘उपनिषद्भूत’ इस विशेषण शब्द द्वारा ‘अपूर्व समाख्या ( ध्वनि यह नया नाम ) मात्र करना’ इत्यादि का निराकरण किया है । अणुतर ( अणीयसी ) इत्यादि इस ( बुद्धि के विशेषण ) द्वारा ( ध्वनि का ) गुण और अलङ्कार में अन्तर्भाव का न होना सूचित करते हैं । ‘और भी’ इत्यादि से ‘उस समय के होने वाले’ इत्यादि द्वारा जो सामयिक होने की शङ्का की थी उसे निरवकाश करते हैं । ‘रामायण-महाभारत’ शब्द से यह दिखाते हैं कि आदिकवि से लेकर समस्त सूरियों ( विद्वानों ) ने इस ध्वनि का आदर किया है । ‘लक्षित करते हुए’ इससे ‘वचनों के अविषय में स्थित’ इसे निराकरण करते हैं । ‘लक्षित करते हैं इससे, अतः ‘लक्ष’ लक्षण है । लक्ष के द्वारा निरूपण करते हैं, लक्षित करते हैं, उनका अर्थात् लक्षण द्वारा निरूपण करते हुए का । सहृदयों का—। काव्यों के अनुशीलन के अभ्यासवश जिनके विशदीभूत मन के दर्पण में वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मय हो जाने की


कह कर आचार्य ने तीसरे अलक्षणीयतावादी के मत का निराकरण किया । इस प्रकार प्रायः सभी विप्रतिपत्तियाँ ‘ध्वनिस्वरूप’ के इन विशेषणों द्वारा निराकृत हो जाती हैं । १. ‘लक्ष्यताम्’ (‘लक्षित करते हुए’) इस शब्द का अर्थ करते हुए लोचनकार लिखते हैं— ‘लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् , लक्षणेन निरूपयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः ।’ यहाँ लोचनकार ने ‘करण’ में घञ् करके ‘लक्ष’ को ‘लक्षण’ के अर्थ में लिया है, किन्तु पाणिनीय शास्त्र के नियम के अनुसार ‘करण’ में ‘घञ्’ नहीं होता है क्योंकि ‘ल्युट्’ उसे बाध लेता है । फिर भी इसका साधारण समाधान यह है कि जब महाभाष्यकार ने स्वयं ‘करण’ में ‘घञ्’ बाहुलक के अनुसार मान लिया है । ऐसी स्थिति में यहाँ भी कोई विशेष त्रुटि नहीं कहीं जा सकती । किन्तु ‘दिव्याञ्जना’ में मेरे पूज्यपाद गुरु जी ( महादेव शास्त्री जी ) ने ‘लक्ष्यताम्’ इसका ही अर्थ ‘निरूप- यताम्’ करके अगतिकगति ‘बाहुलक’ पक्ष को सुधीजनों के विचारणीय बताया है ।