ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसका भान किसीको नहीं; धर्म, तत्त्वज्ञान आदि सब विद्वन्मान्य संस्कृत भाषाके पिटारेमें बंद, सब कुछ गुह्य, गुप्त, बहुजन समाजको उसकी हवा भी नहीं लगती, वह सब समाज- विमुख, अपने अभिमानमें चूर, मुट्ठी भर लोगोंके हाथमें, ! धर्म, अध्यात्म, तत्त्वज्ञान आदिके नामसे कोईकुछ भी कहे, कुछ भी करें, और जन-सामान्यके अज्ञानका लाभ लेकर अपना पेट भरलें, ऐसी अराजकताके समय ज्ञानेश्वर महाराजका अवतार हुवा था; वैसे ही जिनपर समाजको धार्मिक तथा आध्यात्मिक संस्कारोंसे संपन्न करनेका दायित्व था वे धर्मपीठ अपना आसन और पीठ संभाल लेनेमें ही दत्त-चित्त रहते थे। ज्ञानेश्वरके जन्मके समय महाराष्ट्रकी परिस्थिति ऐसी थी। सारे भारतवर्षकी परिस्थिति इससे कुछ भिन्न नहीं थी। इस परिस्थितिका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं— मोहके बहुत बढनेसे। काल बहुत बीत जानेसे । लोप हुवा है योग इससे। इस लोकमें ॥ ४-२६ ॥ ज्ञानेश्वर समकालीन संत श्रीनामदेव कहते हैं- भ्रष्ट हुए जन राजा यवन । दोष बढे थे सर्वत्र महान । तब अवतार हुए महान । करने कलि दोष निवारण ॥ ज्ञानेश्वर महाराजने तब समाजका सूक्ष्म अवलोकन किया तथा अनुभव किया कि समाज सत्यज्ञानसे विमुख हुवा है। सबसे प्रथम समाजको ज्ञानाभिमुख करना चाहिये, उसके लिये जनसामान्यकी भाषाका ही स्वीकार करना होगा। समाजकी भाषामें, समाज उसको समझ सके, उसको सहज पचा सके, इस ढंगसे समाजको ज्ञानसंपन्न, संस्कारसंपन्न करना होगा; तब किंकर्तव्यमूढ समाज सत्यज्ञानका लाभ लेकर अपने जीवन का उत्कर्ष कर सकेगा ! इसके लिये ज्ञानेश्वर महाराजने भारतमें प्राचीन कालमें ऐसीही परिस्थितिमें कही गयी गीतको चुना। द्वापर- युगके अंतमें, अर्थात आजसे करीब साडेतीन हजार वर्ष पहले, युद्ध भूमिपर, कर्तव्याकर्तव्यके मोहमें डूबकर, किंकर्तव्यमूढ अर्जुनको, भगवान श्रीकृष्णने गीतोपदेश दिया था और अर्जुनका मोह निवारण हुवा था; इसी गीतासे समाजका मोहनिवारण होगा यह मानकर ज्ञानेश्वर महाराजने सर्वकालोपयुक्त गीताके ज्ञानखड्गको देश भाषाकी सान पर चढाकर समाजके हातमें दिया, इसी बातको ज्ञानेश्वर महाराजने जरा दूसरे ढंगसे ग्यारहवे अध्यायमें कहा है। संस्कृ- तका प्रवाह अत्यंत गहरा है। उसमें निर्मल नीर बहता है। लोक उस पानी तक नहीं जा सकते। इसलिये मैंने निवृत्तिनाथकी आज्ञासे देशी भाषाका घाट बांधा है। इसमें जो चाहे वह स्नान करें, यहां प्रयाग माधवका विश्वरूप देखें, तथा संसारको तिलोदक दें ! ज्ञानेश्वर महाराज अठारहवे अध्यायके अंतमें गीताको मैने मराठी भाषा अर्थात देशभाषाका विषय क्यों बनाया इसका समर्थन करते हुए ज्ञानेश्वरीके अंतमें कहते हैं- लाया मैं इसी कारण। गीतार्थ देशीमें जान । किया है इसको जन। दृष्टिका विषय ॥ १८-१७३५ ॥ किंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीतापद् मधुर । न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ १८-१७३६ ॥ और कहें यदि मूल गाकर । बनेगा वह मूलका अलंकार । वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ १८-१७३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४