भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

वैसा सत्य और कोमल । हित मित किंतु सरल । मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके ॥ १३-२६९ ॥ पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृतकल्लोल । वैसे कोमल तथा सरल । बोलें शब्द ॥ ८-५७ ॥ सूज्ञ पाठक-वर्गको ज्ञानेश्वरीका अध्ययन करते समय बार बार इसका अनुभव आएगा ही । ज्ञानेश्वरीके पंद्रहवे अध्यायके प्रारंभमें ज्ञानेश्वर महाराज कहते है :- असंख्य पूर्ण सुधाकर । करें जिसपे निछावर । होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ १५-११ ॥ सूर्य उदित पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश । करती दीवाली ज्ञानदशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १५-१२ ॥ जैसे ज्ञानेश्वर महाराजने अपने बारहवे अध्यायके प्रारंभमें कहा है। इस ग्रंथमें नवरसके सागर भरे हैं, भावार्थके बडे बडे गिरिवर खडे हुए हैं, साहित्यकी सुवर्ण खाने खुली हैं, विवेक वल्लीके उद्यान लगे मिलेंगे, संवादफलोंसे भरे प्रमेयोंके उपवन मिलेंगे किंतु यहां पाखंडकी खाइयां नहीं होंगी, वाग्वादके टेडे मेडे कांटेले रास्ते नहीं होंगे, कुतर्कके दुष्ट श्वान भी नहीं मिलेंगे । ऐसा यह सुरतरुओंका उपवन है । अपनी शब्द शक्तिके विषयमें ज्ञानेश्वर महाराज छठे अध्यायके प्रारंभमें कहते है कि इन शब्दोंकी व्याप्ति असाधारण है । भावज्ञ पुरुषोंको इसमें चिंतामणिके गुण मिलेंगे, मैने शब्द पक्वान्नकी जो ये थाली परोस रखी है इसके शब्द कैवल्यरससे सने है । यह शब्द भोजन निष्काम साधक बंधुओंके लिये मैंने परोस रखा है । यह ज्ञानेश्वरी ग्रंथ इस प्रकार सर्वांगपूर्ण बना है। इसमें तत्वज्ञानकेसाथ ही साथ रस, रूपक, उपमादि अलंकार, आदिसे शब्दोंके पूर्णभाव प्रकट हुए हैं और यह वेदांत-ग्रंथ उत्कृष्ट, सर्वांगपूर्ण साहित्य-ग्रंथ बना हुवा है। यह महान ग्रंथ मानो सरस्वतीका-सारस्वतका-लावण्य रत्न भांडार ही बन पडा है । ज्ञानेश्वरीका स्थायी भाव :- इस ग्रंथमें साहित्यके सभी गुण उत्कटतासे प्रकट हुए हैं किंतु यही इस ग्रंथका स्थायीभाव नहीं है। एक सर्वोत्कृष्ट साहित्य ग्रंथ लिखना ज्ञानेश्वर महाराजका जीवन-उद्देश्य नहीं है। ज्ञानेश्वर महाराजका अवतार-कार्य उत्कृष्ट साहित्य निर्माण नहीं जगदुद्धार है। जब ज्ञानेश्वर महाराजका जन्म हुवा उस समय भारतके उत्तरमें मुसलमानी सत्ता स्थिर हो गयी थी और दक्षिण पर उसके आक्रमण भी होने लगे थे । उस समय महाराष्ट्रमें यद्यपि स्वराज्य था उसपर परचक्रके बादल मंडारा रहे थे। राज्योंमें परस्पर द्वेष और संघर्ष चल रहे थे । समाज भोग-वादी बना था । इसका वर्णन भी ज्ञानेश्वरीमें देखनेको मिलता है। इसका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं :- जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर । जिससे विस्मृति अपार । आत्मबोधकी ॥ ४-२० ॥ देहको ही सर्वस्व माननेवाला, "जीवन भोगके लिये है" ऐसा समझनेवाला भोगप्रधान समाज, समाजके सभी क्षेत्रोंमें मतमतांतरोंका गलबला, एकका संबंध दुसरेको नहीं, परस्पर सहयोगका नाम नहीं, पंडित, शास्त्री, सब विद्वत्ताके अपने अभिमानमें चूर, समाजमें परंपरा- गत ज्ञानका प्रसार करना, समाजको विचार प्रणव बनाना, समाज-शक्तिका संघटन करना, ३ —प्रस्तावना