भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ज्ञानेश्वर महाराज स्वयं अत्यंत आत्मविश्वासके साथ कहते हैं "इस ग्रंथमें अंतरंगके अधिकारी सब-कुछ पाएंगे ही किंतु सर्वसामान्य भी वाक्चातुर्य पाकर सुखी होंगे। वस्तुतः गीताग्रंथ शांत रस प्रधान ग्रंथ है। ज्ञानेश्वर महाराजने यह जगह जगह कहा है जैसे वे चौथे अध्यायमें कहते हैं — इसकी उत्तमता पर। आठो रस है न्योच्छावर। वह है सज्जनोंका घर। आसरेका॥ ४-२१३॥ प्रकट करेगा शांतिरस निर्मल। है वह महासागरसे भी खोल। मेरी देशभाषाका अनमोल बोल। अर्थपूर्ण॥ ४-२१४॥ ऐसेही ज्ञानेश्वर महाराजने अनेक स्थान पर कहा है। ज्ञानेश्वर महाराज अपने इस ग्रंथके विषयमें कहते हैं- यहां साहित्य तथा शांति। वैसे रेखा शब्द पद्धति। जैसे लावण्यगुण कुलवति। तथा पतिव्रता॥ ४-२१५॥ जैसे किसी स्त्रीमें पातिव्रत्य एक महान गुण होता है। वह श्रेष्ठतम महान गुण तो हैं ही, साथही साथ जो लावण्यमें सर्वांगपूर्ण हैं गुणोंकी खान भी है तथा कुलवती भी है ऐसा यह मेरा ग्रंथ है। उसमे मोह-निवार, शक्ति तो हैं हीं साथही साथ साहित्य गुण भी हैं। यहां जो शांत रस है वह साहित्यगुणके साथ हैं। वैसे काव्यशास्त्र शृंगारको रसराज कहता है। शृंगाररस तो सबकी चित्तवृत्तिको लुभाता है, उसमें गुदगुदी पैदा करके उस पर अपना प्रभाव डालनेवाला सार्वजनिक रस है किंतु ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं मैं अपनी देशभाषाके सौंदर्य को इतना ऊंचा उठाऊंगा कि जिससे वह सौंदर्य शृंगाररसको जीतकर उसके सिरपर पैर रखता हुवा आगे बढेगा और मेरी ये ओवियां देशभाषाका अलंकार बनेंगी, भूषण बनेंगी। इतनी इसमें साहित्यिक परिपूर्णता प्रकट होगी। ज्ञानेश्वर महाराज तेरहवे अध्यायमेः- केवल यह शांतिकथा। चलेगी शब्दोंका सत्पथ। पग रख शृंगार माथा। पर अविरत॥ १३-११५५॥ देशीके बोल सुंदर। समझायेंगे अलंकार। लजायेंगे जो मधुर। अमृतको यहां॥ १३-११५६॥ यह कहते हुए अपनी भाषाके कलात्मक सौंदर्यका असामान्य प्रभाव दिखाते हैं। वे ज्ञानेश्वरीके दसवे अध्यायमें कहते हैं:— यहां देशीका नागरपन। जीतेगा शांत रसको जान॥ ओवियां ये होंगी महा-भूषण। साहित्यका॥ १०-४२॥ ऐसी काव्य रचनामेंसे साहित्यिक कलासौंदर्यका अथवा साहित्यिक कला प्रकर्ष artistie perf ection निर्माण होता है। अत्यंत लावण्यपूर्ण काव्य रचना करके जिसमें केवल शांत रसकी प्रधानता है उस तत्त्वज्ञानको काव्यका रूप देकर शांतरस शृंगार-रससे केवल स्पर्धा ही नहीं कर सकता अपितु शृंगारको जीत सकता है, शृंगार पर अपना सिक्का जमा सकता है इतना सामर्थ्य मेरे शांत रसमें है ऐसी लोकविलक्षण प्रतिज्ञा ज्ञानेश्वर महाराजने की है। इस प्रकारके काव्यकी शब्दरचना कैसी होगी या होनी चाहिये इसका विवेचन करते हुए ज्ञानेश्वर महाराज कहते है:— ज्ञानेश्वरी २