भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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प्रस्तावना -ह. भ. प. धुंडामहाराज देगलूरकर- ज्ञानेश्वरी यह ग्रंथ मराठी भाषामें...देशी भाषामें... "सत्यं शिवं सुंदरं" का मूर्तिमंत आविष्कार है । वाङ्मयमें जो जो दिव्य भव्य ऐसा रहता है उन सबका इस महा- ग्रंथमें पूर्ण साक्षात्कार हुवा है । यह ग्रंथ वाङ्मयीनक्षेत्रका एक महान् आश्चर्य है । यदि कोई श्रद्धा, बुद्धिसंपन्न मनुष्य इस ग्रंथको सरसरी निगाहसे देखेगा तो भी उसको 'आश्चर्य- वत्पश्यति” का अनुभव होगा । जो लोग एलोरा अजंताकी पुरानी कलाकृतियोंको देखकर जैसे कोई कलाकार दिङ्मूढ-सा हो जाता है, जैसे पुनः पुनः उन कलाकृतियोंकी ओर उसकी आंखें खींचती हैं उसके सूक्ष्माति-सूक्ष्म कलागुणसे वह प्रभावित होजाता है, उन कलाकृतियोंमें कलाकारकी ओरसे आविष्कृत नवरसोंरका दर्शन करता है, उनमेंसे किस कलाकृतिको महत्त्व देना कौनसी कलाकृति श्रेष्ठ है इसका निर्णय करना असंभवसा हो जाता है किंतु उन कला- कृतियोंको देखते देखते दर्शक मानो सविकल्प-समाधिमें डूब-सा जाता, यही हालत ज्ञाने- श्वरीके सुज्ञ वाचककी होती है, कुछ विद्वानोंका यह मत है 'शास्त्र और काव्य एक स्थान पर नहीं रहते ! “कोलेरीजने” “जो शास्त्र नहीं वह काव्य” ऐसे काव्यकी व्याख्या की है । —Poetry is the anti thesis of Seinee— अर्थात् काव्य और शास्त्रके रूप परस्पर विरोधी है । किंतु सरसरी निगाहसे ज्ञानेश्वरीका अवलोकन करने पर भी उपरोक्त सिद्धांत तथ्यहीन होनेका अनुभव आएगा। ज्ञानेश्वर महाराजने जैसे ज्ञानेश्वरीमें काव्यकी अपनी कसौटी कही है— ज्ञानेश्वरीका साहित्यिक रूप :— वाचाका सौंदर्य कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व । रसिकत्वमें है पर तत्व । स्पर्श जैसे ॥ १८-३४७ ॥ उस कसौटी पर ज्ञानेश्वरी उतरी है। रोग-निवारक शक्ति औषधका महत्वपूर्ण आवश्यक गुण है । फिर वह औषध कटु भी हो तो भी उसमें कोई आपत्ति नहीं है अथवा कटुता, या तीतापन औषधीका दोष नहीं माना जा सकता। किंतु यदि कोई औषध संपूर्णरूपसे रोग-निवारक होकर भी मधुर और सुस्वादु है तो वह सबको अत्यंत प्रिय होगा । गीता तथा ज्ञानेश्वरी के विषयमै ज्ञानेश्वर, महाराज यही कहते हैं — रोगको है यदि जीतना । उसपर ओषध देना । किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ ३-१९ ॥ गीता तत्वज्ञानका ग्रंथ है। वह अध्यात्मशास्त्र है, योगशास्त्र है. वह ब्रह्मविद्या है उसमें सभी प्रकारके अध्यात्म विचार भरे हैं, वे मोह निवारक हैं अर्थात वह अन्य सभी शास्त्र तथा विद्याओंसे श्रेष्ठ प्रकारका शास्त्र या विद्या है। उपनिषद, गीता ब्रह्मसूत्र, उसके भाष्य, आदि ग्रंथोंमें इसका सांगोपांग विचार किया है किंतु साहित्य क्षेत्रमें उसका कोई स्थान नहीं है। केवल तत्व- विचारक ही इन ग्रंथोके अध्ययनमें प्रवृत्त हो सकता है। सर्वसामान्य मनुष्य इन ग्रंथोंकी ओर आकर्षित नहीं हो सकता। सामान्य वाचककी इसमें कोई रुचि नही हो सकती किंतु ज्ञानेश्वरी ग्रंथका ऐसा नहीं है। इस विषयमें १