ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिव्या भृगुकी दूसरी पत्नी । दिव्यासे १२ देव बने । इनके नाम पर भृगुस्मृति, भृगुगीता, भृगुसंहिता, भृगुसिद्धांत, भृगुसूत्र आदि ग्रंथोंका उल्लेख है। यह गोत्रकार ऋषि है ! भृगुकुलोत्पन्न सब भार्गव कहलाते हैं । गीता अ० १०, श्लो० २५-मै एकाक्षर वाणीमें— उपनिषदोंमें ब्रह्मको प्रणव अर्थात् ओं अथवा ॐ कहा है । गीता अ० १०, श्लो० २५-जप हूं सब यज्ञोंमें— यज्ञ—अपनी इच्छानुसार अग्नि-प्रज्वलित करनेका शोध मानवी इतिहासमें अत्यंत महत्त्वका शोध है । संभव है कि यही मानवी-बुद्धिका सर्व-प्रथम सफल प्रयोग हो । इसलिये विश्व- संस्कृतिके इतिहासमें, विश्वकी प्रत्येक संस्कृतिके साहित्यमें अग्निकी उत्पत्तिकी कहानियां देखनेको मिलती हैं । अग्निके विषयमें कृतज्ञता प्रकाशन है । अग्नि-स्तवनसे ही भारतीय साहित्यका उगम है “ अग्निमीळे पुरोहितं ” भारतीय साहित्यका आद्य-चरण है। ऋग्वेदमें अग्निके करीब २०० सूक्त हैं। इन सूक्तोंको देखनेसे लगता है “ देवोंमें अग्नि मृदुहृदय ” है । वह अन्य सभी देवोंका प्रतिनिधि है । वह देवोंके पास मानवोंका प्रतिनिधि है । ऋषि अग्निद्वारा अन्य देवोंको आवाहन करते हैं । अग्निद्वारा अन्य देवोंका यजन करते हैं । वहां “ अग्निर्वै सर्वे देवताः ” है । इसलिये “ सभी देवताओंके संतोषके लिये अग्निमें आहुति देना यज्ञ ” माना जाने लगा । ऋग्वेदमें अनेक जगह पर ऐसे विचार मिलते हैं । “ अग्निकी सहायताके बिना मनुष्यको किसी भी प्रकारका सुख नहीं मिल सकता !” इसलिये “ यज्ञ-मानव- कुलके सभी सुखका साधन ” बन गया । यज्ञ जब मानव-कुलके सभी सुखका साधन बन गया तब यज्ञ-संस्थाका विकास और विस्तार होना स्वाभाविक था । पुराने ग्रंथोंको देखनेसे ऐसे लगता है कि “ यज्ञको केंद्र बनाकरही वैदिक संस्कृतिका विकास और विस्तार किया गया !” इन यज्ञोंमें नित्य, दिनमें दो बार करनेके अग्नि-कार्यसे लेकर साल साल चलनेवाले यज्ञ-सत्र तक अनेक कारणोंसे, अनेक प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं । जैसे—प्रजाकी वृद्धिके लिये, प्रजाके सुखके लिये, युद्धमें जीतनेके लिये, एकछत्र सम्राट होनेके लिये, सामर्थ्य-वृद्धिके लिये, आयुष्य-वृद्धिके लिये, शक्ति-प्राप्तिके लिये, समाजमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनेके लिये, किसी भी महान्-सिद्धांतकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रायश्चित्तके लिये, शत्रु-नाशके लिये, शांतिके लिये, रोगोंसे बचनेके लिये, दीर्घायुष्यके लिये, सभी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये, संतान प्राप्तिके लिये, ऐश्वर्य प्राप्तिके लिये, ग्रह- शांत्यर्थ, वर्षाके लिये, अन्न प्राप्तिके लिये, षोडश संस्कारों में, ऐसे अनेकानेक कारणोंसे अग्निष्टोम, सोमयाग, पंचमहायज्ञ, अश्वमेध, राजसूय, साकं प्रस्थाइयज्ञ, दाक्षायणयज्ञ, अनेक प्रकारके कामेष्टि- काम्ययज्ञ-पुत्र कामेष्टि-धन कामेष्टि, यश कामेष्टि, आदि-वाजपेययज्ञ, आप्तोर्याम यज्ञ, पंचशारदेय यज्ञ, विद्यापराधयज्ञ, ऐसे कुछ ४०-४१ प्रकारके यज्ञ हैं । यह यज्ञ-प्रक्रिया वेद-कालसे लेकर अर्थात् ई. पू० चार छ हजार वर्ष से लेकर आज तक अखंड चली आ रही है। इन यज्ञोंमें, विधि विधानोंमें की जानेवाली व्यवस्थामें, यज्ञ-संस्थाके “ अनुशासनका परमोच्च आदर्श ” का दर्शन होता है । यज्ञके कर्म-कांडके विधि-विधानोंमें पाये जानेवाले छोटी ज्ञानेश्वरी ५६