भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1003, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1003

छोटी बातोंका ब्यौरा उनकी सूक्ष्म-दृष्टिका तथा स्पष्ट विचारोंका परिचायक है। वहां दर्भोके टुकडे, हवन सामग्री, आहुति देनेवाले चम्मच, आचमनादिके उपकरण, कहां, कैसे, किस ओर, किस वस्तुके, कितनी दूर रखना चाहिए आदिका भी स्पष्ट संकेत है। वैसे ही किस यज्ञकी आहुतिके लिये कौनसा हवि चाहिए, ? वह, कहां, कैसे, किसके, किस आकार प्रकारके बर्तनमें, किस प्रकारकी अग्नि पर, किन मंत्रोंको कहते हुए पकाना चाहिए इसका भी विवेचन है। किस प्रकारके यज्ञमें कैसी समिधायें होनी चाहिए ? यज्ञमें घीकी आहुति देनेवाले चम्मच कैसे होने चाहिए ? वह किस धातुके अथवा किस लकडीके होने चाहिए ? आदि सविस्तर जानकारी वेदोत्तर कालमें लिखे गये ब्राह्मण-ग्रंथोंमें देखनेको मिलती है। आजकलके कुछ विद्वान विचारक ब्राह्मण ग्रंथोंके विषयमें "अलग अलग यज्ञोंके विधिविधानोंका विस्तार पूर्वक वर्णन करनेमें ब्राह्मण- कालीन बुद्धिमत्ताका दुरुपयोग" मानकर "उनके विषयमें जुगुप्सा भरी दया" दिखाकर भी इंग्लंडके राजा अथवा रानीके सिंहासनारोहणके निःसार विधि-विधान देखकर "वंडरफुल डिसिप्लीन" कहनेमें अपनेको धन्य मानते हैं। वस्तुतः यज्ञ संस्कृति निर्माणका साधन थे। वैदिक संस्कृति यजन-संस्कृति थी। बिना अनुशासनके कोई समाज, संस्था, सभ्यता या संस्कृति अधिक समय तक टिक नहीं सकती। अनुशासन ही सातत्य और स्थायित्वका प्राण है। जिस समाज अथवा सभ्यतामें, संस्था अथवा संगठनमें अनुशासन जितना सुव्यवस्थित है वह उतने ही अधिक काल टिकेगा। भारतीय जीवनमें अनुशासनका अत्यंत महत्व रहा है। यहां अनेक प्रकारका अनुशासन चला है। धर्म के विषयमें कहते समय 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' कहते ही धर्मानुशासनम् आया। राजनीतिकी बात आते ही दंडानुशासन आया। केवल अध्यात्म ज्ञान कहनेवाली गीता भी "आज्ञा मानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको"-कहती है। अर्थात् संस्कृतिके प्राणभूत प्रथाको अनुशासन बद्ध रखना अत्यंत स्वाभाविक था। साथ साथ यज्ञ वैदिक आर्योंकी अर्थ-वितरण व्यवस्था भी थी। ब्राह्मण नित्य-यज्ञ करते थे। उनके यज्ञ व्यक्तिगत थे। किंतु राजाओंके, वैश्योंके जो यज्ञ थे वे सामूहिक थे। उनके कोशमें इतना धनसंचय होते ही यह यज्ञ करना ऐसी अलिखित परंपरा-सी थी। इस यज्ञके द्वारा वह संचित-धन समाजके अनेक प्रकारके लोगोंके पास पहुंच जाता था। महाभारतमें राजसूय-यज्ञका वर्णन पढ़ते समय, तथा यज्ञ-व्यवस्थाको पढ़ते समय लगता है कि कथाकथनकला-पुराण अर्थात् आख्यान कहना, नृत्यकला, नाटककला, संगीतकला, वाद्यकला, चित्रकला, शिल्पकला, बढ़यी, कुम्हार, बर्तन बनानेकी कला, आदि अनेक कलायें यज्ञ द्वारा विकसित हुई हैं। साथ साथ कोई भी एक बड़ा यज्ञ करनेका अर्थ संचित धन अनेक प्रकारके कार्य करके उदर निर्वाह करनेवालोंमें बंट जाना था। धन वितरणकी इस व्यवस्थाकी दृष्टिसे भी कई प्रकारकी व्यवस्थाएँ-अनुशासन-आवश्यक था। साथ साथ केवल अग्नि-मुखमें आहुति देना ही यज्ञ नहीं रहा। आगे चल कर यज्ञके रूप बदले। अग्निके तीन रूप हैं। उसमें शरीरस्थ अग्नि वैश्वानर है। वाक् शक्ति भी अग्नितत्त्वसे संबंधित है। हम कोई भी श्रमका कार्य करते समय श्वास निरोध करते हैं। ऐसी स्थितिको उपनिषदोंमें आंतर-अग्निहोत्र कहा है। उपनिषदमें कहा है "मनुष्य जब बोलता है तब वह श्वासोच्छ्वास नहीं करता, "अपना प्राण-वायु वाचामें हवन" करता है। जब वह श्वासोच्छ्वास करता तब बोल नहीं सकता अर्थात् "वाणीका प्राणमें हवन" करता है। प्रातर्दन ऋषि इसको ५७ परिशिष्ट ३ (5)