ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1004, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ें“मानवको अमर अग्निहोत्र” कहता है “वाणीमें प्राण और प्राणमें वाणीका यह यज्ञ मानवका महान यज्ञ है। अन्य हवन कर्ममय है इसलिये वह नाशवंत है। अपने अंतर्याममें चलनेवाले इस अग्निहोत्रकी जानकारी रखनेवालेके लिये बाह्य अग्निहोत्रकी आवश्यकता नहीं।” यह इस ऋषिका मंतव्य है। तैत्तरीय उपनिषदमें वाग्यज्ञका विवेचन है। विकार रहित मन वाग्यज्ञका चम्मच है। साकार अंतःकरण घी है। वाणी यज्ञ-वेदिका है। शब्द दर्भ है। केवल ज्ञान हवनीय अग्नि है। उद्देश्य मिश्रित ज्ञान गार्हपत्य अग्नि है। वाक्-शक्ति प्राप्त वक्ता होतृ है। मन उपवक्ता है। प्राण ही आहुति है। और गान पुरोहित। गीतामें भी (१) ब्रह्मयज्ञ, (२) द्रव्ययज्ञ (३) देवयज्ञ (४) ज्ञानेंद्रिययज्ञ (५) विषययज्ञ (६) स्वाध्याययज्ञ (७) प्राणयज्ञ (८) अपानयज्ञ (९) प्राणापानयज्ञ (१०) आंतरपानयज्ञ (११) योगयज्ञ (१२) तपोयज्ञ (१३) जपयज्ञ (१४) इंद्रियप्राणयज्ञ ऐसे चौदह प्रकारके यज्ञ कहे हैं। धर्मकी भांति यज्ञका विचार भी अनेक शाखा प्रशाखाओंसे फैला है। वेदकालसे लेकर वर्तमान तक अनेक मनीषियोंने यज्ञकी अनेक व्याख्यायें करके यज्ञके अनेक प्रकार बताये हैं और अंतमें कहा है तप, भोग और यज्ञ ये तीन विश्वव्यवस्थाके आधार हैं। किसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये “सतत” परिश्रम करना तप है। तपसे प्राप्त फलको भोगना, उसको ग्रहण करके उससे आनंद लेना भोग है और तप और भोगसे जो घिसाई होती है क्षति होती है उसकी पूर्ति करना यज्ञ है। व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवनके जिन जिन क्षेत्रोंमें तप और भोगके कारण जो जो क्षति होती है, “जिन जिन तत्त्वोंकी घिसाई होती है उनकी पूर्ति करना” यज्ञ है। इसी बातको लेकर महात्मा गांधीजीने “नियमित सूत कातनेकी क्रियाको सूत्र-यज्ञ” कहा था। तथा जब किसी देशकी प्रजा पराक्रम शून्य हो जाती है उस समय प्रजामें पराक्रम वृत्ति जगानेके लिये प्रेरणाप्रद सामूहिक रचनात्मक कार्य चलता है वह राष्ट्रीय यज्ञ है। जीवनके विविध अंगोंकी क्षति-पूर्तिके इस विविध प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ सर्व श्रेष्ठ माना गया है। जप— जप तीन प्रकारका होता है। (१) वाचिक जप, (२) उपांशु जप, (३) मानसिक जप। जप करनेवाला जो उच्चार करता है वह जब सब सुन सकते हैं तब वह वाचिक जप कहता है। यह उच्चार केवल जप करनेवाला ही सुन सकता है तब उपांशु जप। और जो मन ही मन किया जाता है वह मानसिक जप। वाणी के-वाक्शक्तिके-चार प्रकार हैं। वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा। ये वाक्शक्तिके स्थूलसे सूक्ष्म-रूप हैं। वाणीका रूप जैसे जैसे सूक्ष्म होता जाता है वैसे वैसे शब्द भाव-रूप बनता जाता है। शब्द-जब भाव-रूप बन जाता है तब शब्द शक्ति प्रकट होती है। जो गुप्त रूपसे जीवनको उजला देती है। मंत्रका कितना जप किया इसका उतना महत्व नहीं किंतु वह कैसा किया इसका महत्व है। शब्द भावमें परिणत नहीं हुआ शब्द ही रहा तो उसका करोडों जप होने पर भी विशेष कुछ लाभ नहीं है। जप भले ही नामजप हो अथवा सबीज मंत्र जप, वह, वाणीसे कंठ, कंठसे हृदय, हृदयसे नाभीमें जा कर मूलाधारसे सहस्रार तक सारे शरीरमें गूंजना चाहिए। शब्द आकाशतत्त्वका गुण है। आकाश तत्व अत्यंत सूक्ष्म और अविनाशी तत्व है। जप शब्दका कौर निगल कर धीरे धीरे सूक्ष्मतम भाव तत्वसे परे अव्यक्त आकाशतत्त्वसे समरस होनेकी प्रक्रिया है। शब्दका कौर निगलनेका अर्थ शरीरके जिस स्थानसे अव्यक्त आकाश तत्व उदित होकर जहां जहां आघात करते करते शब्दका रूप धारण करता है वह जानकर व्यक्त शब्दको लेकर उसको वहां वहां आघात करते करते सूक्ष्मसे ज्ञानेश्वरी ५८