भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1005, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1005

सूक्ष्मतममें प्रवेश करते करते अव्यक्त आकाश तत्त्वमें विलीन होना है। जिह्वा स्थानकी वैखरी वाणीको पकड़कर, शब्दको कंठकी मध्यमामें सूक्ष्मकर वाचिक जपको उपांशु कर-हृत्कमलमें मानस जप सतत स्मरण रूपमें-अभ्यस्त होने पर वह उसीमें सूक्ष्म होकर स्थूलसे सूक्ष्म होते होते मौनमें लीन हो कर "सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप" बन जाता है। "जो इंद्रिय बिन भोगना है।" शब्दका यह सूक्ष्मसे सूक्ष्म जो अचिंत्य रूप है वह जिस शक्तिसे श्वास प्रश्वास चलते हैं, जिस शक्तिसे हृदयका स्पंदन चलता है, जिस शक्तिसे शरीरकी हजारो नाड़ियोंसे रक्त संचार होता है, जिस शक्तिसे मन और बुद्धि कार्य करती है, जिस पर श्रद्धा आश्रित है उससे समरस होकर शरीरमें गूंजने लगता है। यह वाणीका अंतिम रूप है जो अनिर्वचनीय है। शब्दके इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म अचिंत्य रूपके गूंजनकी जो तरंगें उठती हैं उन तरंगोंके सतत स्पंदनसे जीवके संस्कार गत सारे मल जल जाते हैं अर्थात् शरीरके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनंदमय कोश, स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर, लिंगशरीर, कारणशरीरके सभी मल जलकर वह निर्मल होते होते देह-सिद्धि भी हो जाती है और जीवनमें सतत गूंजनेवाले वह तरंग विश्वाकाशमें भी प्रविष्ट कर विश्वके आकाश तत्त्वमें लीन हो जाते हैं। वहाँ तरंगित होने लगते हैं। उन तरंगोंका वायुमंडल बनता है। इससे न केवल जप करनेवाले-यह शब्द प्रयोग भी गलत है, जहाँ मैं जप करता हूं इस भावके बिना सहजभावसे अभ्यासके कारण जप होने लगता है-शरीरका ही नहीं किंतु सामूहिक जन जीवनमें होनेवाली क्षति भी भरने लगती है। जप अथवा जप-योग स्थूलमेंसे सूक्ष्म और सूक्ष्मसे अति सूक्ष्मकी ओर जानेकी प्रक्रिया है। शब्द-जन्य विशिष्ट प्रकारका स्पंदन सूक्ष्म और अति-सूक्ष्म हो कर शरी- रमें प्रवेश करते जाता है। तब उन स्पंदनोंसे शरीरके अणु अणु (पेशियां) हिलकर साफ होते जाते हैं। जपके सातत्यसे, प्राणको सतत विशिष्ट दिशामें गति मिलती है इससे प्राण विशिष्ट गति और विशिष्ट दिशामें शरीरके अणु अणुमेंसे-सूक्ष्म और गति शील होनेसे-प्रवेश करते जाता है। वस्तुतः शरीर १०००००००००००००००००००० सजीव और स्वतंत्र पेशियोंका अखंड संघटन है। इनमेंसे बहुत ही कम पेशियां काम करती हैं। इन पेशियोंके बीच अनेक प्रकारके सूक्ष्मातिसूक्ष्म मल होते हैं। इसलिये ये सब चिपककर, कार्य रात न होकर, आलसी निर्जीवसी पड़ी रहती हैं। यह मल भी मन, वचन, विचार, भावादिके किये गये असत्कर्मोंसे, अनृत चिंतनसे, द्वेषादिसे, कुटिल विचारोंसे, अनेक विध वासनाओंके चिंतनसे, आचारसे, तथा भाषणसे भी,-अनृत आचार, अनृत विचार, अनृत भाषण, अनृत चिंतनसे-मानवी शरीरकी सूक्ष्म नाड़ियां, सैकड़ोंकी संख्यामें, सिकुड़ जाती हैं, टूट जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं, व्यक्ति और समाजकी इस सूक्ष्म घिसाईको क्षतिको भरना है। जब ऐसे सूक्ष्म तरंगोंसे, जप कर्ताके शरीरस्थ सभी आकाश-क्षेत्र भरकर वे विश्वाकाशमें प्रसारित होती हैं तो मनुष्य विश्वतरंगोंके प्रभावसे विश्व-शक्तिसे समरसैक्यका अनुभव करने लगता है। तब मानो उसका प्रत्येक श्वास एक नया काव्य ही बनता है। यह संत-जीवनका सार है जिससे वे अनजाने ही अपने समयमें ही नहीं युगों तक जन मन पर अपना स्वामित्व रखते रहे हैं क्यों कि उनकी वे तरंगे युगों तक विश्वाकाशमें रहती हैं। इसीलिये जप योग सभी योगमें श्रेष्ठ मान कर जप-यज्ञ-सतत क्षति पूर्तिकी साधना-सतत अपने सर्वस्वका हवन-सब यज्ञमें श्रेष्ठ मान कर परमात्म रूप माना है। ५९ परिशिष्ट ३

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 1005, कुल 1172 में से · BharatKosha