भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गीता अ० १०. श्लो० २५-स्थावरोंमें हिमालय- पीछे नदियोंके परिचय देते समय भारतकी पर्वतश्रेणियोंका सामान्य परिचय तो हुआ है उसमें हिमालय पर्वत परमात्माका रूप है। एक विभूति है। हिमालय-पर्वत भारतके उत्तरमें है। यह भारतवर्षके उत्तरी प्रहरी माना जाता है। इसी पर्वतके शिखर आज पृथ्वी पर सर्वोच्च पर्वतशिखर हैं। प्राचीन कालके लोग इन शिखरोंको हिमास अथवा हिमोवास कहा करते थे। इसके वायव्यमें सिंधुनदी इसकी वायव्यसीमा तो पूर्वमें यह ब्रह्मदेशको छूता है। कालिदासने इसको "पृथ्वीका मान-दंड" कहा है। जम्मू काश्मीरका अधिकांश भाग इस पर्वत श्रेणीमें खो गया है वैसे ही नेपाल, भूटान और सिक्कम आदि राज्य तथा पंजाबका कांग्राजिला हिमाचल प्रदेश इसी पर्वतश्रेणियोंमें बसा है। उत्तर प्रदेशका कुमायूं और टिहिरी गढवाल विभाग हिमालयमें बसे हैं। कुमायूं विभागमें तीन और टिहिरी गढवालमें तीन ऐसे छ जिले हैं। यह पर्वत भारत और तिब्बतका विभाजन करता है। इनके पर्वत-शिखर ८०००-९००० फूटसे २८-२९ हजार फूट तक ऊंचे हैं। यह पर्वत श्रेणी इतने विशाल भूभागमें फैली है कि अब तक इसके एक तिहाई भागका पत्ता भी नहीं मिल सका। १५००० फूट ऊंचाईके बाद चिरकाल हिमरेखा दिखाई देती है। इसमेंसे जो नदियां बहती हैं उसी पर पंजाब, उत्तर भारत तथा बिहारका जीवन निर्भर है। पेशावरसे आसाम तक करीब १६०० मील फैले हुए इस महा पर्वत पर (१) नंगापर्वत (२६१८२ फूट) (२) नंदादेवी (२५६६१ फूट) (३) त्रिशूल (२३२८२ फूट) (४) पंचचुल्ली (२२६७३ फूट) (५) नंदाकोट (२२५६८ फूट) (६) गौरीशंकर (२९००२ फूट) (७) धवलगिरि (२६८२६ फूट) (८) गोसईस्थान (२६३०५ फूट) (९) कांचनगंगा (२८१४६ फूट) आदि महत्त्वपूर्ण शिखर हैं। इसमेंसे कई शिखर अब तक चढना बाकी है। हिमालयके ऊंचे प्रदेशमें बौद्ध धर्मका विशेष प्रचार दिखाई देता है। १४ वीं सदीमें सिकंदर नामके राजाने काश्मीर पर आक्रमण करके वहांके लोगोंको मुसलमान बनाया, इससे वहां मुस्लीम धर्मका प्रभाव सबसे अधिक है। हिमालयके अनेक भागमें विशाल वनश्री है। इन अरण्योंमें अनेक प्रकारकी वनस्पति और घर बांधने लायक लकडी मिलती है। यहां आने जानेका कोई विशेष साधन नहीं है। यद्यपि स्वातंत्र्यके बाद और विशेषतया चीनके आक्रमणके बाद अनेक रास्ते बनाये गये हैं।

गीता अ० १०. श्लो० २६-अश्वत्थ सब वृक्षोंमें- अश्वत्थ- [जिसकी] जड़ोंको सींचनेसे दूसरे दिन पानी नहीं रहता यह अश्वत्थ शब्दकी व्याख्या है। एक इसका नाम अश्वत्थ पड़नेके लिये यहभी एक कारण बताया जाता है कि एक बार अग्नि देवोंसे अलग होकर अश्वरूपसे एक वर्ष तक इस वृक्ष पर रहा इसलिये यह अश्वत्थ कहलाया। अश्वत्थके विषयमें और भी कई जनश्रुतियां हैं किंतु अश्वत्थ वेद कालमें भी पूज्य था। ब्राह्मणमें भी इसका उल्लेख है। यज्ञ कार्यके लिये अग्नि प्रज्वलित करनेवाली उत्तरारणि अश्वत्थकी होती है। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदन कहा गया है। सिंधु संस्कृतिमें भी अश्वत्थको पूज्य माना गया है ऐसे विद्वानोंका मत है। सिंधुसंस्कृतिके उत्खनन प्राप्त एक मुद्रामें अश्वत्थके दो डालियोंके बीच एक देवता खडी है। दूसरी एक मुद्रामें

ज्ञानेश्वरी ६०

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