ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सींगवाले दो देवता अश्वत्थके छोटेसे गाछकी रक्षा करते हैं। कहते हैं कि सिंधुजनकी श्रेष्ठ देवता महिष-मुंड अश्वत्थवासिनी है। अर्थात् वेद-पूर्वकालसे ही भारतमें अश्वत्थ श्रेष्ठ वृक्ष माना जाता था। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदनके साथ पितरोंका भी निवासस्थान माना है। बुद्धोंने भी अश्वत्थको बुद्धत्वका प्रतीक माना है। प्राचीन भारतीय समाजमें अश्वत्थ पूजन, अश्वत्थ प्रदक्षिणा, अश्वत्थोपनयन आदि प्रघात प्रचलित हैं। गीता अ० १०, श्लो० २६-देवर्षि मध्य नारद— ऋषियोंमें ब्रह्मऋषि, महर्षि, राजऋषि, देवऋषीं ऐसे प्रकार हैं। नारद देवर्षी हैं। देवर्षी भी दस हैं जैसे महर्षि दस हैं। इनके नाम हैं (१) नारद (२) अत्रि (३) मरीचि (४) भारद्वाज (५) पुलस्य (६) पुलह (७) ऋतु (८) वसिष्ठ (९) प्रचेता (१०) शिव। शिव देव और असुरोंको वर देनेवाला देवर्षी है। नारद—ब्रह्माका मानस-पुत्र। सर्वविद्यासंपन्न। प्रतिभासंपन्न राजनीतिज्ञ। उसके कुटिल तंत्रके कारण उसको कई बार "तू नाश होकर पुनर्ज़न्म प्राप्त कर" ऐसा शाप मिला। नारदने नाश होकर पुनर्ज़न्म लिया। कहीं इसको बृहस्पति का शिष्य कहा गया है। यह सोम-विद्यामें सोमफका गुरु था। सदैव इसने देव और ऋषियोंकी सेवा की। इसने सावर्ण मन्को पांचरात्रनामक उपदेश दिया। नारायणको आत्मतत्त्वका उपदेश दिया। शुक्राचार्यको इसीने ज्ञानोपदेश दिया। देवलको सृष्टि उत्पत्तिके विषयमें इसीने उपदेश दिया था। इसने व्यासको भी कई ज्ञानकी बातें कहीं हैं। वसुदेवको भागवत-धर्म इसीने कहा था। इसीने श्रीकृष्णको पूज्य कौन होता है इसका बोध दिया था। धर्मराजाको इसने राजनीतिका उपदेश दिया। प्रह्लादको इसीने भक्तिका उपदेश दिया था। याज्ञवल्क्य और पाराशरने प्राचीन धर्मशास्त्रज्ञ कहकर इसका उल्लेख किया है। कई प्राचीन पोथियोंमें अनेक विषयों पर इसके विचार श्लोक-रूपमें देखनेको मिलते हैं। महाभारतमें अनेक स्थानों पर अनेक विषयों पर नारदके मत देखनेको मिलते हैं। देव, दानव, मानव, ऋषि, सबमें इसका समान प्रवेश और समान सम्मान था। कोई भी, देव हो, दानव हो, ऋषि हो, कोई हो, किसी समय हो इसकी भेंट अस्वीकार करनेका साहस नहीं कर सकता था। नारदने कई बार अपने पूर्व-जन्मकी कथा कही है। इससे एक विचार आता है कि नारद एक व्यक्ति था या पीठ ? पुराणोंमें नारदकी जो कथाएँ आती हैं, उसके जो विचार आते हैं, उन सबका संग्रह किया जाय तो कई ग्रंथ हो सकते हैं नारद इतना सर्वव्यापक है ! गीता अ० १०, श्लो० २६-चित्ररथ गंधवोंमें— गंधर्व—'संगीत और वाद्यविद्याका आनंद जिसके पास है वह' यह गंधर्व शब्दका अर्थ । इसके अलावा भी अन्य अनेक अर्थ पुरानी पोथियोंमें है। गंधर्व मनुष्योंसे उच्च और देवोंसे निम्न ६१ परिशिष्ट ३