भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1009

कुछ विद्वानोंका कहना है कि ध्यान और चिंतनका आदि प्रर्वतक भी कपील है । इसके प्रथम, कर्म ही महत्वपूर्ण साधना अथवा उपासना थी। कपिलको निरीश्वरवादि माना गया है । इसको विष्णुका पांचवा अवतार भी कहा गया है । कपिलके नाम पर (१) सांख्यसूत्र (२) तत्वसमास (३) कपिलगीता (४) (५) कपिलपांचरात्र (६) कपिलसंहिता (७) कपिलस्मृति (८) कपिलस्तोत्र (९) व्यासप्रभाकर ऐसी कुछ पुस्तकें प्रचलित हैं । गीता अ० १०. श्लो० २७-उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं— देवासुरोंने जो समुद्रमंथन किया तब (१) लक्ष्मी (२) कौस्तुभ (३) पारिजातक (४) सुरा (५) धन्वंतरी (६) चंद्रमा (७) कामधेनु (८) ऐरावत (९) रंभा (१०) उच्चैश्रवा (११) कालकूट विष (१२) शाङ्गधनुष्य (१३) पांचजन्य (१४) अमृत ये चौदा वस्तु मिले। इनमें उच्चैश्रवा सात मुखोंका घोडा भी है। इसका रंग शुभ्र । इसका खाद्य अमृत । यह इंद्रका वाहन है । दशहरेके दिन जो अश्व-पूजा होती है वह वास्तवमें उच्चैश्रवाकी पूजा है । गीता अ० १०. श्लो० २७-ऐरावत गजेंद्रोंमें- भारतीय साहित्य और संस्कृतिमें हाथीको वैभव और संपन्नताका प्रतीक माना गया है । ऋग्वेदमें लक्ष्मीका वर्णन करते समय "हाथीके गर्जनसे जगनेवाली" ऐसे कहा गया है । हाथीको लक्ष्मीका भी प्रतीक माना गया है। प्राचीन शिल्पमें भी लक्ष्मीके साथ गज-अर्थात् हाथीके चित्र होते हैं। लक्ष्मीके साथ ऐरावत भी समुद्र मंथनसे प्राप्त रत्न हैं । ऐरावत-यह सफेद हाथी है। समुद्रमंथनमेंसे उत्पन्न हुवा। ब्रह्मांडके आधारभूत (१) ऐरावत (२) पुंडरीक (३) वामन (४) कुमुद (५) अंजन (६) पुष्पदंत (७) सार्वभौम (८) सुप्रतीक इन आठ दिग्गजोंमें इंद्रने इसको पूर्व दिशामें स्थापित कि। कृष्ण और इंद्रके युद्धमें यह हाथी गरुडसे पराजित हुवा था। कहीं कहीं इसकी सात सुंड होनेका उल्लेख है ! भीम अपनी मातके गजपर्वकी पूजामें इसे पृथ्वि पर लाया था ऐसी जनश्रुति है । गीता अ० १०. श्लो० २७-नरोंमें मैं नराधिप- नर शब्दका अर्थ है नेतृत्व करनेवाला । नेतृत्व करनेवालोंमें नराधिप - राजा - ईश्वरका रूप है । : वेदमें प्रत्येक शब्दके तीन अर्थ किये जाते हैं। उस प्रकार राजा-सामाजिक क्षेत्रमें इंद्र है। राजाको इंद्रका तथा विष्णुका प्रतिनिधि माना गया है। गीता अ० १०. श्लो० २८-शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा- शस्त्र-प्रहार करनेके साधनको आयुध शस्त्र कहते हैं। इसमें पत्थर और लोहेके डंडोंसे लेकर अणुबांब तक आ जाते हैं। युद्ध-साहित्य सब आयुध शब्दमें समा जाते हैं। संस्कृतिके विकासके साथ आयुधोंका भी विकास हुवा है। स्वसंरक्षण तथा दूसरोंपर आक्रमण करनेवाले सभी साधन आयुध कहाते हैं। इनमें सतत हाथमें ले लडनेवाले आयुध, जैसे तलवार, गदा, धनुष्य, बंदूक, तमंचा आदि, फेंकके मारनेवाले आयुध, भाले, त्रिशूळ, शक्ति, तोमर, आजकल हाथ-बॉब आदि, अस्त्र, युक्तिसे चलनेवाले-मंत्रपूरित आयुध-आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि, ६३ परिशिष्ट ३