ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही शतघ्नि, तोप आदि। किंतु इससे भी भिन्न प्रकारके कुछ आयुध दीखते हैं जो फेंक कर मारनेके बाद अपना काम करके वे पुनः लौटकर आते हैं। जैसे विष्णुका सुदर्शनचक्र, इंद्रका वज्र। चक्रके विषयमें जो जानकारी मिलती है वह अत्यंत अद्भुत है। वह कई मील तक पीछा करके शत्रु का संहार करता है और अपना काम होते ही वह लौट पडता है! हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें, शंकरका त्रिशूल, विष्णुका सुदर्शन, भार्गवरामका परशु, इंद्रका वज्र, वरुणका पाश, गणपतिका अंकुश-मत्रोंको छोडकर-अत्यंत प्रसिद्ध और आश्चर्यजनक आयुध रहे हैं। वज्र—यह इंद्रका अत्यंत भयंकर आयुध है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस आयुधकी निर्मिती दधीचि ऋषिके अस्थियोंसे हुई थी। दधीचि ऋषि महा-तपस्वी सामर्थ्यवान लोकहितव्रती थे वृत्रासुरको मारनेके लिये इंद्रको ऐसे एक महान आयुधकी आवश्यकता थी। दधीचि मृत्युंजय था। इंद्रने दधीचिसे उसकी अस्थियोंकी प्रार्थना की। विश्व-हितके लिये अपनी अस्थियोंकी आवश्यकता है यह सुनते ही दधीचि ऋषिने योग-बलसे शरीर त्याग दिया। इसके बाद उसकी अस्थियां लेकर षट्कोण आयुध बनाया गया जिससे वृत्रका संहार हुवा। गीता अ० १०. श्लो० २८-मैं कामधेनु गायोंमें— कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय ! यह भी समुद्रमंथनमेंसे निकली थी। कामधेनुके सभी अवयव सिर, माज, जांघ, स्तन, पुच्छ, तथा गलेका झोल, ये छ अवयव पुष्ट और ऊंचे थे। उसकी आँखें मेंडककी भांति थीं। स्तन पुष्ट थे। वह सर्वांगसुंदर थी। शिवजीका नंदी इसका बछडा। यह गाय वसिष्ठऋषिके आश्रममें थी। सूर्यवंशके दिलीप राजाने इसकी सेवा की और प्रसन्न कामधेनूकी कृपासे रघु राजाका जन्म हुवा। इस परसे सूर्यवंशको रघुकुल कहते हैं। गी. अ० १०. श्लो० २८-उत्पत्ति हेतु मैं काम— काम-ब्रह्माका मानस पुत्र। इसकी स्त्री रति। जन्मता यह अत्यंत रूपवान था। इसके शरीरमें सुवास था। जन्म होते ही इसने ब्रह्मदेवसे पूछा "मेरा जीवित-कार्य क्या है !" "तू स्त्री पुरुषोंको मोहित कर। ब्रह्मा विष्णु शंकर सहित सभी देव तेरे वश होंगे।" परिणाम स्वरूप इसने ब्रह्मा परही अपना प्रथम प्रयोग किया। एक बार शिवने इसको दग्ध किया था। फिर यह कृष्णमें प्रद्युम्नके रूपमें आया। वसंत ऋतु इसका मित्र है। (१) इसके स्पर्शसे स्त्री पुरुषोंमें मद आता है इसलिये मदन (२) ऋषियोंका भी मंथन करता है इसीलिये मन्मथ (३) शिवके उःशापसे बिना शरीरके मानवोंमें रहा इसलिये अनंग ऐसे इसके तीन नाम हैं। भाई बहनोंमें विकार निर्माण करनेसे शंकर इसको जलायेगा। शंकरको पुत्रेच्छा होगी तब कामेच्छा होगी ऐसा शाप और वर मिले हैं। गीता अ० १०. २८-१० श्लो० २९-मैं सर्पोत्तम वासुकी-नागोंमें शेष नाग मैं। नाग और सर्प--फनावाला सांप। भारतीय संस्कृतिमें अत्यंत प्राचीन कालसे नागपूजा प्रचलित है। ये नाग गेहुंआ, हरी आभा लिये पीले, पूरा पीलो, तथा काले होते हैं। इनके मुखमें विषका दांत होता है। प्राचीन भारतीयोंने उनको देवत्व दिया है। भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नाग-पूजा प्रचलित है। ज्ञानेश्वरी ६७