भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पौराणिक जन-श्रुतिके अनुसार कश्यप इनका पिता और कद्रू इनकी माता है । (१) अनंत (२) वासुकी (३) तक्षक (४) कर्कोटक (५) पद्म (६) महापद्म (७) शंख (८) कुलिक नागोंकी ये आठ जातियां हैं । इनके साथ (९) कालिय भी गिनते हैं । पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार ये जब प्रजाको बहुत सताने लगे तब ब्रह्माने शाप दिया- “प्रथम तुम्हारा ससौतेला भाई तुम्हारा संहार करेगा फिर जनमेजय राजा ।” पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार कुछ नाग, देव और मानवोंके अनुकूल और कुछ प्रतिकूल हैं । इनमें तक्षक, कर्कोटक, कालिया ये सदैव प्रतिकूल ही रहे हैं । विश्वमें सर्वत्र नाग हैं, नागपूजा भी है । किंतु भारतमें वह जिस प्रमाणमें प्रचलित है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है । क्यों कि भारतमें इनकी संख्या और जातियां भी बहुत हैं । ऋग्वेदमें नाग और सर्पका उल्लेख है । किंतु नाग-पूजाका नहीं । यजुर्वेद और अथर्वण वेदमें नागपूजाका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उल्लेख है । पौराणिक कालके शिव और विष्णु दोनों महान देवताओंके साथ सर्प या नाग जुड़ गया है । काली भी नाग-भूषण है । बौद्ध या जैनोंने भी नागका महत्व गाया है । भारतीय लोक साहित्य-सभी भाषाओंका-नाग-कथाओंसे भरा पड़ा है । इन कथाओंमें अनेक प्रकारके श्रद्धा-संकेत हैं । इसमें एक महान संकेत “पूर्वजोंके आत्मा नाग रूपसे अपने परिवारमें आते हैं और गर्भधारण होनेपर उसमें प्रवेश करते हैं !” इसलिये घरमें आया हुआ साप नहीं मारा जाता ! नागोंकी कथाओंसे-भली और बुरी-पुराण साहित्य भरा पड़ा है । इनमें वासुकी और अनंत— वासुकी—सर्पोंका अधिपति । इसकी पत्नी शतशीर्षा । जनमेजयके यज्ञमें इसके पंद्रह पुत्र नष्ट हो गये हैं । यह शंकरके गलेमें भूषण बना रहता है । यह मणिधर है । अनंत—इसको आदि-नाग भी कहते हैं । आदि शेष भी कहते हैं । यह विष्णुकी शैय्या है । विष्णुको अनंतशयन भी कहा गया है जो शेषशायी है । लक्ष्मण, बलराम, तथा संकर्षणको इसका अवतार माना है । गीता अ० १०. श्लो २९-मैं हूं वरुण पानीमें— जलके कारण मनुष्य पर होनेवाले अनुकूल प्रतिकूल परिणामोंके कारण जलदेवताकी कल्पना की गयी है । साथ ही साथ जल पंच महाभूतोंमें पृथ्वी पर रहनेवाला भूत है । मनुष्यके लिये जीवन है । बिना इसके जीना असंभव है । अर्थात् जल-पूजन एक कृतज्ञता है । बृहदारण्यक उपनिषदमें “जल सभी वस्तु मात्रका मूल उत्पत्ति साधन” होनेकी बात कही है । इसलिये जलमें भी देवताओंका वास माना जाना स्वाभाविक है । जल रूपी ये देवता भिन्न भिन्न हैं । इनमें अप्सरा निम्नश्रेणी देवता है । ये सदैव जलक्रीडा करती रहती हैं । ये सात प्रकारकी हैं । इनको सप्त मातृका भी कहा गया है । गुजरातमें ये सप्तमाता मानी जाती हैं तो दक्षिणमें सप्त भगिनी मानी जाती हैं । अर्थात् जलचरमें जलमें रहनेवाले जीव जंतु मत्स्यी कूर्मी कर्कटी दुर्दुरी, जतुपी, मकरी आदि नामोंसे अप्सराओंके नाम बने हैं । अर्थात् इन देवता ओंमें— ६५ परिशिष्ट ३