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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सके प्रत्येक शासकका कर्तव्य है । साथ ही साथ "सबल दुर्बल पर अन्याय नहीं कर सके" तथा "समाजका दुर्बलतम मनुष्य भी अन्याय करनेवाले सबलसे सबल व्यक्तिका 'हाथ पकड़ कर' अन्यायका कारण पूछ सके" ऐसी व्यवस्था कायम करना शासनका एकमेव पवित्र कर्तव्य है । इसी एक उद्देशसे प्राचीन कालमें अनेक प्रकारके शासन प्रणालियोंकी स्थापना होकर "अपने उद्देशमें असफल होनेसे" ऐसी शासन प्रणालियोंको समाप्त किया गया है । महाभारत और बृहदारण्यकमें "धर्मानुशासन" का इतिहास कहते हुए लिखा गया है- सबसे प्रथम समाजमें ब्रह्म विद्यमान था । विद्वानोंने इसका अर्थ करते समय लिखा है कि तब एकाकार समाज था यहां "राजा या प्रजा," अथवा "शासक या शासित" ऐसा द्वैत नहीं था सब समान थे । श्रेष्ठ कनिष्ठ भाव नहीं था । उस समाजमें स्तवन तथा यशकी महिमा थी । तब ब्रह्मके सामर्थ्यकी कमीके कारण-एकताकी कमीके कारण-समाज विकास रुक गया । तब उच्च स्वरूपके समाज की कल्पना करके "श्रेयोरूप क्षात्र" का निर्माण किया गया । श्रेयोरूप क्षात्रतंत्र राजशासन था जो सेना-प्रधान था । तब ब्राह्मण भी यज्ञमें क्षत्रियोंके नीचे बैठ कर उपासना करते थे । क्षत्रिय ही ब्राह्मणोंका यश स्थापन करते थे । क्षत्रियकी सहायतासे ब्राह्मण अपने कार्य यशस्वी करते थे । किंतु इससे समाज वैभव-संपन्न नहीं हो पाया । इससे वैश्य-शासनतंत्र निर्माण किया गया । यह वैश्यतंत्र संभवतः पूंजीशाही तंत्र रहा हो । इससे भी समाज सुखी और वैभव-संपन्न नहीं हुआ तब सबका पोषक शूद्र निर्माण किया । क्या यह शूद्र-तंत्र श्रमिक-शासन-तंत्र था ? इससे भी समाज वैभवसंपन्न नहीं हो पाया । तब सर्व मंगलकारक धर्मानुशासनका निर्माण किया जिससे "दुर्बलसे दुर्बल व्यक्ति भी अपनेपर होनेवाले अन्यायके विरुद्ध सबलसे सबल व्यक्तिका हाथ पकड़कर पूछ सके ।" इन अनेक प्रकारके शासन तंत्रमें इंद्र, सोम, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, रुद्र, पूषा, यम आदिका नाम आया है । इनका अर्थ करते समय उपनिषदके चिंतनशील विद्वानोंने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि गणोंका द्योतक होनेकी बात कही है । और धर्म-शासनमें यम सब प्रकारके न्याय अन्यायका विचारक है । यम—विवस्वानका पुत्र । माताका नाम संज्ञा । ऋग्वेदमें अपनी जुड़वी बहन यमीसे इसकी नीति विषयक चर्चा हुई है । इसको पहला मानव कहा गया है । इसको राजा भी कहा गया है । यमको देवता भी कहा गया है । अष्ट दिक्पालोंमें यह दक्षिण दिशाका स्वामी है । इसका स्थान, तीन द्युलोकोंमें सर्वोच्च है । इसको ब्रह्माने पितरोंका स्वामित्व और विश्वके पाप-पुण्य पर देख-भाल रखनेका काम दिया । मांडव्यके शापसे इसने शूद्रयोनीमें-विदुरके रूपमें-जन्म लिया था । युधिष्ठिर यमका मानसपुत्र माना जाता है । इसने नचिकेताको ज्ञान दिया । गौतमको माता पिताके ऋणसे मुक्त होनेका मार्ग बताया । यम और इसके दूतोंमें जो संवाद हुआ उसको यमगीता कहते हैं । यमके नामसे ( १ ) यम संहिता ( २ ) यमस्मृति ये दो ग्रंथ उपलब्ध हैं जो शासन ग्रंथ हैं । यमने अर्जुनको अस्त्र दिया । सावित्रीको उसका पति सत्यवान लौटा दिया । ३७ परिशिष्ट ३