ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयाज्ञवल्क्य ऋषिने जिन धर्मशास्त्रकारोंके नाम लिये हैं उनमें यमका नाम है। वसिष्ठ धर्म- सूत्रमें यमके कुछ श्लोक हैं। प्राचीन पोथियोंमें स्थान स्थान नीति, धर्म, व्यवहार, अध्यात्म आदि विषय पर इसके श्लोक मिलते हैं। यह न्यायका देवता है। गीता अ० १०, श्लो० ३०-मैं हूं प्रल्हाद दैत्योंमें- दैत्य-कश्यपसे जो दितिमें उत्पन्न हुए वे। ये सदैव देवोंके शत्रु रहे हैं। उन्हें दैत्य कहा जाता है। देवोंसे इनका युद्ध होता रहा है। प्राचीन साहित्यमें स्थान स्थान पर दैत्योंका उल्लेख आया है। अमृत प्राप्तिके लिये देव और दैत्योंने समुद्र मंथन किया था। उस समुद्र मंथनमेंसे जो अप्सरा, वारुणी, सुरा उत्पन्न हुईं वह दैत्योंने ले लिया। दैत्य सदैव यज्ञ विध्वंसक रहे हैं। संभवतः दैत्य और दानव भिन्न हैं। आगे चल कर इनमें भेद नहीं रहा होगा। क्यों कि दनुको दानवकी माता कहा गया है। फिर भी विद्वानोंका मत है ये समानार्थी हैं। प्रल्हाद-हिरण्यकश्यपु और कयाधूका पुत्र । देवासुर युद्धके निमित्त वेदमें भी प्रल्हादका नाम आता है। यह महान विष्णुभक्त था और इनका पिता विष्णुद्वेष्टा । बापते पुत्रको बहुतेरा समझाया किंतु यह नहीं माना। इसको कठोर दंड दिया जाने लगा। इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह मरनेके लिये भी तैयार हुआ किंतु विष्णु भक्ति छोड़नेके लिये नहीं। एक बार हिरण्य- कश्यपूने पूछा तुम्हारा विष्णु कहां है ? सर्वत्र । इस खंभेमें भी ? हां इसमें भी। गदासे खंभा तोड़ दिया गया। नरसिंह प्रकट हुए। नरसिंहने हिरण्यकश्यपूका वध किया। तब प्रल्हादनेही सभी दैत्योंका सांत्वन किया। नरसिंहने वर मांगनेको कहा तब इसने "विष्णुभक्तिके बिना और कुछ भी नहीं चाहता।" कहते हुए भक्तिका ही वर मांगा। विष्णुने तब "प्रल्हादका यह अंतिम जन्म है। यह मोक्षके लिये तैयार हुआ है!" ऐसा कहा है। स्वयं विष्णुने इसको ज्ञान दिया। गीता अ० १०, श्लो० ३०-काल हूं गणितज्ञमें- गणक-गिननेवाला, शुभाशुभ बनानेवाला, जीवन गिननेवाला, यह गणना, अतीत वर्तमान व भविष्यके रूपमें की गयी है। यही-काल है। यह आयुष्य निगलता जाता है। गिन गिन कर निगलता है। हमारे प्राचीन ऋषियोंने इस गिननेको भी गिना। उन्होंने मनुष्य, पितर, देव, और ब्रह्म ऐसे चार प्रकारके दिन और रातकी कल्पना की और फिर एक सूची तैयार की। १५ स्वेदयान - १ लोमगतं १५ प्राण - १ इदम् : १५ लोमगतं - १ निमिष. १५ इदम् - १ एतर्हि : १५ निमिष - १ अन १५ एतर्हि - १ क्षिप्र : १५ अन - १ प्राण १५ क्षिप्र - १ मुहूर्त्त ३० मुहूर्त्त - १ अहोरात्र इसके बाद वार, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग, कल्प आदि। इसके अलावा और एक गणना है सो सूर्य पर आधारित है। ज्ञानेश्वरी ३६