भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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२ परमाणु - १ अणु १५ काष्ठा - १ लघु ३ ऋतु - १ अयन ३ अणु - १ त्रसरेणु १५ लघु - १ नाडिका २ अयन - १ वर्ष ५ - वर्ष - १ युग. ३ त्रसरेणु - १ त्रुटि २ नाडिका- १ मुहूर्त ब्रह्माका १ दिन - १४ मनुका काल खंड. १०० त्रुटि - १ वेधस् ७ नाडिका- १ प्रहर या याम ब्रह्माकी १ एकरात-प्रलयका कालखंड. ३ वेधस् - १ लव ४ याम - १ दिवस या रात्र. ३ लव - १ निमिष १५ दिवस और रात्र - १ पक्ष ३ निमिष-१ क्षण २ पक्ष - १ मास--या पितरोंका एक दिवस. ५ क्षण - १ काष्ठा २ मास- १ ऋतु. हमारे दर्शन कारोंने इस कालके विषयमें खूब विचार कर भी यह समस्या ही रहा है। विश्वकी अनेक गूढ समस्याओंमें काल एक गूढ तम समस्या है । इसलिये इसको साक्षात् परमेश्वर भी कहा गया है । विश्वके परमाणुसे ब्रह्मांड तक सब कुछ उसी पर आश्रित है। अमूर्त होकर भी वह सर्वव्यापी है। उसके पार किसी वस्तुके अस्तित्त्वकी कल्पना नहीं की जा सकती । प्राणिमात्र पर उसकी जो कृपा होती है वही आयुष्य है । पतंलीने इसको नित्य और विश्वका आधार माना है यद्यपि बौद्धोंने कालका अस्तित्व ही नहीं माना ! इसलिये इस पर लिखते आना कालापहरण है ! गीता अ० १०, श्लो० ३०-मृगोंमें मैं मृगराज- मृगोंको पशु भी कहा जाता है। विशेषतः न जानते हुए या आकलन न करते हुए देखते रहना यह पशु शब्दका अर्थ है । अति प्राचीन कालमें भी इन पशुओंके स्वभाव इनके शुभाशुभ लक्षण, स्वभावानुसार इनका विभाजन, इनका उपयोग, इनके रोग, उसकी चिकित्सा आदि पर अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं। उनमेंसे कुछ आज भी उपलब्ध हैं। इनमेंसे कुछ संस्कृत ग्रंथोंका फारसीमें अनुवाद भी हुवा है। ऋग्वेद पूर्वकालसे भारतमें पशुपालन चलता आया है। सिंधुसंस्कृतिमें भी गाय, भैंस, कुत्ता, बकरे, मेड, हाथी, सूवर, गधा, ऊंट ये पालतू जानवर थे ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। इन सबमें गाय पर विशेष भक्ति थी । उसको खूब खिलाते थे, तीन तीन बार दुहते थे, ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है । ऋग्वेद कालमें भी खेतीके साथ गोपालन चलता था। गाय, बैल, घोडे, बकरा, मेड, कुत्ता, ये सब आश्रमवासी भी थे । उपनिषत्कालमें आश्रमके शिष्य गायोंको चराने ले जाते थे। इस समय प्रत्येक घरके साथ कुछ पशु होते थे। कौटिल्य कालमें इन सब जानवरोंको अलग अलग पाळा जाता था और उन पर देखभाल करनेवाले प्रमुख अधिकारीको अश्वाध्यक्ष गजाध्यक्ष, गो-अध्यक्ष आदि कहा जाता था । राजकुमार भी इस विभागके अध्यक्ष होते थे। पांचवा पांडव सहदेव गो-विद्याका पंडित था तो नकुल अश्व विद्याका । बिराटके घर इन्हें यही काम मिला था! कौटिल्यके समयमें यह लाभकारी व्यवसाय भी था। इसके चमडा, चरबी, स्नायू, सींग, दांत, हड्डी, आदिका उपयोग होता था । ६९ परिशिष्ट ३