भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसे समय इस विषयमें अनेक ग्रंथ लिखे जाय तो कोई आश्चर्य नहीं। इन पशुओंम ग्राम्य, आरण्य, तथा व्योम ऐसे तीन विभाग हैं। आकाशमें उड़नेवाले पक्षी। पशुओंमें पालतु और जंगली। अथर्ववेदमें जंगली पशुओंको भयंकर कहा है। पानीके प्राणियोंको शिशुमार कहा है। इस प्रकार वहां पांच विभाग हैं। मृगेंद्र-सिंह-पंडित हंसदेवने मृगपक्षी शास्त्र नामका एक ग्रंथ लिखा है। उसमें उन्होंने सिंहके मृगेंद्र, पंचाक्ष, हर्यक्ष, केसरी, हरी, और सिंह ऐसे छः प्रकार दिये हैं। साथ साथ इनके वैशिष्ट्य दिखाये हैं। इसमें सिंहकी दुम लंबी होती है। शरीर फूर्तिला होता है। भूखके समय ये क्रूर होते हैं। इसका रंग सोनेरी होता है। ये अत्यंत वेगसे चलता है। प्रसन्नतामें रहता है तब दुम हिलता रहता है! गीता अ० १०. श्लो० ३०-पक्षियोंमें खगेंद्र हूं— पक्षी—भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें पक्षियोंके विषयमें भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। दूर दूर संदेश पहुंचानेके लिये भी पक्षी पाले जाते थे । कोशल राजाके घर संदेश वाहक एक मैना थी । कौटिल्य अर्थशास्त्रमें संदेश वाहक कबूतरोंका उल्लेख है । पुराणोंमें भी ऐसे अनेक उल्लेख हैं कि पक्षियोंसे संदेश भेजनेका काम लिया गया । पालतू पक्षियोंमें शुक, मैना, मोर, चकवा, अधिक तर देखनेको मिलते हैं किंतु राज प्रासादोंमें मुरगा, क्रौंच, कपिंजल, वार्तिक, चकोर, चक्रवाक, हंस, कोयल, कादंब, आदि पक्षी पालते थे। इन पक्षि- योंके विषयमें संस्कृत साहित्यमें अनेक प्रकारके संकेत हैं। इनकी स्वतंत्र भाषा है। इनकी भाषा जाननेवाले विशिष्ट लोग भी हैं। प्राचीन भारतीय साहित्यमें पक्षियोंका संभाषण सुनकर, उनसे आवश्यक जानकारी पाकर किये गये महान कामके उल्लेख पर्याप्त हैं। इनका और देवोंका संपर्क भी है। कौवोंको अन्न डाला तो वह पितरोंको मिलता है। कौये प्राचीन ऋषि हैं। मोर सरस्वतीका वाहन है। हंस और लक्ष्मीका संबंध है। कहीं कहीं उलु लक्ष्मीका वाहन माना जाता है। गरुड—विष्णुका वाहन है। यह कश्यप-विनताका पुत्र, अरुणका छोटा भाई । वालखिल्य ऋषियोंके पुण्यसे गरुड पैदा हुआ था। पैदा होते ही वह उड़ने लगा। इसके उड़नेसे ही इसको पक्षियोंका इंद्र मान कर वालखिल्योंने इसका अभिषेक किया। उड़ते समय इसका इतना प्रखर ताप था कि सारा विश्व अकुला उठा। इससे इसको लोग अग्नि समझने लगे। तब इसने अपने तेजका संकोच किया। इसकी मां विनता सौतकी दासी थी। इससे वह दुःखी थी। इसके सवतेले भाई साप भी इसे दासी-पुत्र मानकर जो चाहे सो फर्माते थे। एक बार यह अपने सवतेले भाई सापोंको लेकर इतना ऊंचा उड़ा कि बेचारे सूर्य तापसे जल भुनकर नीचे पडे ! अपनी माताके दास्यका कारण और उससे मुक्तताका उपाय जानकर यह इंद्रसे लड़कर अमृत जीतकर ले आया और मां को दास मुक्त किया। संपूर्ण अमृतकुंभ पास रह कर भी इसने एक बूंद भी अमृत नहीं पिया। यह देखकर विष्णुने प्रसन्न होकर इससे वर मांगनेको कहा तब इसने "बिना अमृतके ही अमर" बननेका वर मांग कर विष्णुसे कहा "अब तुम भी कोई वर मांग लो !" तो विष्णुने "अपना वाहन बननेका वर मांगा !" ऐसे यह विष्णुका वाहन बना। ज्ञानेश्वरी ७०