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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गीता अ० १०, श्लो० ३१-वायु मैं वेगवानों में- सारा विश्व गतिशील है। विश्वकी प्रत्येक वस्तु ग्रह नक्षत्रादि सभी गतिशील है। इसकी गति भी तीव्र है। मनुष्य इसकी कल्पना नहीं कर सकता। जैसे शब्दकी गति, प्रकाशकी गति आदि, किंतु इन सबमें वायुकी गति अत्यंत तीव्र मानी गयी है। मरुद्गणोंका विचार करते समय अवकाशमें जो वायुकी गति है उसका उल्लेख होता है। तब कहा जाता है कि इससे विश्व हिलता है। अब तक इस गतिका अंकन नहीं किया गया है। गीता अ० १०, श्लो० ३१-राम मैं शस्त्र वीरोंमें- राम—पिताका नाम दशरथ। माता कौसल्या। भाई लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबसे बडा लड़का। यह धनुर्वेदका पंडित था। विश्वामित्र इसका शस्त्र-गुरु। रामने बचपनमें ही ताटकाका वध किया। सुबाहुको मारा और मारीचको अपने बाणाग्रसे उडा दिया। जनक नंदिनी सीता इसकी पत्नी। सीताको रामने स्वयंवरमें जीता। शिवधनुपर प्रत्यंचा चढाना सीता स्वयंवरका दांव था और रामने हजारों राजाओंके सम्मुख प्रत्यंचा चढानेके लिये जब शिव-धनुष्य झुकाया तब धनुष्य टूट गया !! राजा दशरथने अपना बुढापा जानकर रामको युवराज्याभिषेक करना निश्चय किया। किंतु दशरथकी सबसे छोटी रानी कैकयीको यह अच्छा नहीं लगा। उसने दशरथको अपने पूर्व वचनका स्मरण दिलाकर भरतको योवराज्य और रामको चौदह वर्ष वनवास भेजनेकी मांग की। इससे पित्राज्ञासे राम, सीता और बंधु लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षके लिये वनवास गया। दशरथ, रामके वनवास जानेका दुःख नहीं सह सका। वह राम राम कहता स्वर्ग सिधास। वनवासके लिये राम दक्षिणकी ओर चला। रामके साथ ही रहनेका लक्ष्मणका दृढ निश्चय था। वह भी रामके साथ रहा, एक आज्ञाधारक सेवककी भांति। किंतु वहां भरतने राज्य लेनेसे अस्वीकार कर दिया। भरत अयोध्याके कुछ प्रमुख लोगोंको साथ लेकर रामको अयोध्या लौटा ले आनेके लिये आया। तब राम चित्रकूटमें था। चित्रकूटमें सब मिले। भरतने अपनी मांग सामने रखी। राम दृढ था। चौदह वर्ष वनवासका उसका निश्चय दृढ था। भरतने रामकी पादुकाएँ लीं। रामके प्रतिनिधिके रूपमें चौदह वर्ष तक अयोध्याका राज्य देखनेका स्वीकार करके भरत अयोध्या आया। राम दक्षिणकी ओर चला। चलते चलते वह ऋषि-मुनियोंसे मिलता। उनसे ज्ञान लेता। उनका सुख दुःख सुनता और आगे बढ़ता। ऐसे चलते चलते दस वर्ष बीते। यह पंचवटी आया। वहां जटायू पक्षी मिला। कुछ दिन राम पंचवटीमें रहा। लक्ष्मणने वहां शूर्पनखाके नाक कान काटे। शूर्पनखासे सब बात सुनकर रावणने मारीचकी सहायतासे सीता हरण किया। बीचमें जटायूने रावणको रोका। जटायूका वध करके रावण सीताको लेकर चला। जटायूसे सीता हरणकी बात जानकर राम लक्ष्मण दक्षिणकी ओर चले। किष्किंधामें हनुमान और सुग्रीवका संपर्क हुआ। अग्नि साक्षीसे राम सुग्रीवकी मित्रता हुई। अपने बडे भाईके डरसे सुग्रीव राज्य छोड़कर ऋष्यमूक पर्वत पर रहता था। रामने वालीवधकी प्रतिज्ञा कर वालीको ७१ परिशिष्ट ३