ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमारा। उसके बाद सीता शोध हुवा। हनुमानने सीता-शोध किया। यह अशोक-वनमें सीतासे मिलकर उससे चूडामणि ले आया। राम लंका पर चढ़ायी करने आगे बढा। हनुमानके सीतासे मिलकर जानेके बाद रावण-सभामें बडी गडबड हुई। रावणके भाई बिभीषणने “सीताको रामके पास पहुंचा देनेकी मांग की!” यह रावणके विरुद्ध था। रावणने उसका धिःकार किया। इससे बिभीषण अपने चार प्रधान--अनल, पनस, संपाति और प्रमति--के साथ रामकी शरण आया। क्यों कि वालीवधसे बिभीषण समझ चुका था वीरतामें राम रावणसे श्रेष्ठ है और उसके साथ समग्र वानर-सेना है। रामने हनुमान सुग्रीवादिकी सलाहसे बिभीषणको अभय दिया। बिभीषणने भी रावण-वधमें सहायता करनेका आश्वासन दिया। वहां रावण सुग्रीवको रामसे अलग करनेका संधान कर असफल रहा। इसके बाद रामने नीलको समुद्र पर सेतु बांधनेकी आज्ञा दी। नीलने लाखो वानरोंकी सहायतासे चौदह, बीस, इकबीस, बाईस, तेईस इस क्रमसे पांच दिनमें सौ'योजनका सेतु बांधा। रामने अपनी सेनाके साथ लंकामें जा छावनी डाली। रामने सुवेल पर्वतसे लंकाका अवलोकन करके सैन्य रचना की। युद्धकी पूरी व्यूह-रचना होनेके बाद नियमानुसार रामने संघामके लिये अंगदको रावणके पास भेजा। अंगदने रावणको बहुतेरे समझाया। कोई उपयोग नहीं हुवा। रावणने अंगदको पकड़नेकी आज्ञा दी। अंगद राक्षसोंको गिराकर वहांसे चला आया। आते समय यह रावणके प्रासादका शिखर-कलश-गिराकर आया! रामने युद्धकी घोषणा की। माघ-शुद्ध द्वितीयाको इस युद्धका प्रारंभ हुवा और चैत्र शुद्ध १२ (या चै. व. १४) रावण वध हुवा। चै. व. ३० को रावणका प्रेत संस्कार हुवा। इस युद्धमें रावणके साथ उसके भाई कुंभकर्ण, पुत्र मेघनाद, अतिकाय, मामा प्रहस्त भतीजे कुंभ-निकुंभ, आदि सारा परिवार--बिभीषणको छोडकर--नष्ट हुवा। सीता ११ महीने १४ दिन रावणकी बंदी बनकर अशोकवनमें रही। विवाहके समय राम पंद्रह वर्षका था और सीता छ वर्षकी। जब रामका राज्याभिषेक हुवा तब राम ४२ वर्षका था। और सीता ३३ वर्षकी। स्कंदपुराणमें सारी रामकथा तिथि वारके साथ है किंतु विद्वानोंका कहना है यह वाल्मिकी रामायणसे मेल नहीं पाता। राम रावण युद्ध और रामके विषयमें अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग बातें कही गयी हैं! गीता अ० १०, श्लो० ३१- मत्स्योंमें मैं बना नक्र— इसके विषयमें कोई कहने जैसी जानकारी नहीं मिली। गीता अ० १०, श्लो० ३१--नदियोंमें गंगा नदी— प्राचीन पोथियोंमें पर्वतसे उगम होकर समुद्रसे मिलनेवाले ऐसे जल-प्रवाहको, -जिसकी लंबाई आठ हजार धनु सामान्यतया १६००० मीटरसे अधिक है-नदी कहा गया है। इससे कम लंबाईवाले जल-प्रवाह "गर्त” कहे गये हैं। भारतीय ग्रंथोंमें नदी-प्रवाहोंको पवित्र माना है। ऋग्वेदमें आपोदेवता-जलदेवता-हमारा कल्याण करें, हमें पवित्र करें ऐसी प्रार्थना है। ऋग्वेदमें नदी सूक्त भी है। इस नदी सूक्तमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, विपाशा, वरुणी, असिकीती, महदूधा, वितस्ता, आर्जोकिया, ज्ञानेश्वरी ७२